जब द्वापर के शत्रुघ्न की हुई कलियुग के भीष्म पितामह से मुलाकात

आड़ा-तिरछा , , बृहस्पतिवार , 16-05-2019


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भूपेश पंत

भीष्म पितामह बाणों की शैया पर पड़े अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं। ये यादें ही फिलहाल उनके जीने का सहारा हैं। जिन कौरवों के राजधर्म के लिये उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया उन्होंने ही उन्हें अपमान के बाणों से बींध कर यहां मार्गदर्शक मंडल में लिटा दिया है। जिन्ना का बाण तो एकदम छाती के करीब लगा है। उनके जीवन की एक ही तो अभिलाषा थी जिसे दुर्योधन ने पूरा नहीं होने दिया। पांडवों के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने से पहले ही उन्हें इस तरह शरशैया पर अकेला छोड़ दिया। मुरली मनोहर को भी नहीं बख्शा।

अचानक पितामह का सेवक अपने साथ किसी ख़ामोश से व्यक्ति को लाता है और उनसे इशारा करते हुए कहता है,

'पितामह मैं आपके एकांत में खलल डालने के लिये क्षमा चाहता हूं। ये कोई शत्रुघ्न हैं जो आपसे मिलना चाहते हैं।'

पितामह अपनी नजरें उठाकर उस व्यक्ति को देखते हैं और पूछते हैं,

'अरे तुम प्रभु श्री राम के छोटे भाई हो ना, तुम मुझसे मिलने त्रेता युग से द्वापर युग में क्यों और कैसे चले आये ?'

शत्रुघ्न (हाथ जोड़ कर) - 'पितामह को मेरा प्रणाम। लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं। कलियुग में मैं आपके साथ ही कौरवों की सेना में था। आपने किस तरह रथ यात्राएं कर करके कौरवों का साम्राज्य बढ़ाया था। लेकिन अब प्रभु श्री राम और आपके नेपथ्य में चले जाने के बाद मेरा वहां मन नहीं लगता। दुर्योधन को कितना भी टोकूं लेकिन वो मेरी नहीं सुनता। इसीलिये मैंने पांडवों की सेना ज्वाइन करने का फैसला किया है। बस आपका आशीर्वाद लेने आया हूं।'

पितामह - 'लेकिन तुम यहां आये कैसे?'

शत्रुघ्न (मुस्कुरा कर)- 'दुर्योधन की उसी टाइम मशीन में बैठ कर जिसमें बिठा कर वो आपको यहां ले के आया था। उन्हें जब जहां मन करता है इसमें बैठ कर कहीं भी निकल जाते हैं। अफसोस लेकिन आपसे मिलने नहीं आते।'

पितामह (गहरी सांस छोड़ कर)- 'तो क्या कौरवों और पांडवों की लड़ाई कलियुग में भी चल रही है?'

शत्रुघ्न (हैरानी से) - जी पितामह, लगता है आपकी याददाश्त अब कमज़ोर हो गयी है। आपको याद नहीं कि कलियुग में हर पांच साल बाद धर्मयुद्ध होता है जिसे चुनाव कहते हैं। इस युद्ध में जो जीतता है वो खुद को पांडव घोषित कर इंद्रप्रस्थ का सिंहासन हासिल करता है और पूरे देश का सम्राट बन जाता है।'

पितामह (मुंह फिरते हुए) - 'कैसे भूल सकता हूं... मैं भी तो इस धर्मयुद्ध का मारा हूं जिसे किसी ने सम्राट नहीं बनने दिया।'

शत्रुघ्न - 'ये क्या आपकी आंखों में आंसू?'

पितामह (संयत होते हुए) - 'कभी खुशी कभी ग़म.. खुशी इस बात की कि तुम्हें कौरवों की सेना से जीतेजी छुटकारा मिल रहा है। दुःख इस बात का है कि किसी भी युग में भीष्म सत्य की राह चुनने का साहस नहीं कर पाया।'

शत्रुघ्न - 'मुझे याद आया कि त्रेता युग में अयोध्या में रावण वध के बाद श्री राम ने बताया था कि वो लंकेश के भाई और अपने परम भक्त विभीषण को लंका की सत्ता सौंप कर आये हैं। मुझे लगता है कि आप उस युग में विभीषण बन कर तर गये तभी इस युग में गंगापुत्र बन कर अवतरित हुए।'

पितामह (टोकते हुए) - 'मुझे गंगापुत्र कह कर घावों पर नमक मत छिड़को वत्स। ये तमगा तो कलियुग में दुर्योधन ने मुझसे छीन कर अपनी छप्पन इंची छाती पर चिपका लिया है। तुम ये बताओ कि कहीं तुम्हें यहां आते किसी ने देखा तो नहीं?'

शत्रुघ्न - आप चिंता न करें। मैं टाइम मशीन में अपने साथ बादल बनाने वाला यंत्र लेकर आया हूं। इससे मैं दुर्योधन की रडार पर नज़र नहीं आऊंगा।'

पितामह (दोनों हाथ मसलते हुए) - 'हां हां मैं जानता हूं... ये भी उसका ही कमाल होगा। उसे बचपन से बातें फेंकने और झूठ के बादल उड़ाने की आदत है। शकुनि की संगत ने उसे और बिगाड़ दिया है।'

शत्रुघ्न - 'पितामह चलिये मैं इसी हालत में आपको अपने साथ कलियुग लिये चलता हूं।'

पितामह - 'ठीक है... मैं भी चल कर देखता हूं कि कोई उम्मीद का दीपक जल जाए और दुर्योधन का कच्चा चिट्ठा ऑन स्क्रीन सबके सामने आ जाये।'

शत्रुघ्न - आपको पता नहीं है कि पिछले पांच सालों में कलियुग के भीतर किस तरह एक सतयुग भी पैदा हो चुका है जिसमें महाराज सत्यवादी हरिश्चंद्र की भूमिका भी द्वापर युग का दुर्योधन ही निभा रहा है। भक्त उसकी हर बात सच मान कर लहालोट हैं। आप तो कलियुग में एक बार फिर खुद अपने सामने पांडवों को सत्ता में आते देख लें।

पितामह (मुस्कुरा कर)- बेटा तूने तो पार्टी बदल ली लेकिन मैं तेरी बातों में नहीं आऊंगा। मैं अभी भी उसी के साथ हूं इसलिये मुझे कहना पड़ेगा कि आयेगा तो मोदी ही...

शत्रुघ्न - पितामह... खामोश।

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)










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