कॉपीराइट को लेकर एक बार फिर छिड़ी बहस

वाद-विवाद , , बुधवार , 19-07-2017


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गिरीश मालवीय

कुमार विश्वास और अमिताभ बच्चन के विवाद ने फिर एक बार कॉपीराइट को लेकर बहस छेड़ दी है, चूंकि हरिवंशराय बच्चन एक लेखक थे इसलिए उनकी रचनाओं को आसानी से इस कानून में प्रोटेक्शन हासिल है इसलिए इस विवाद में वैधानिक रूप से अमिताभ बच्चन सही हैं। 

1957 में कॉपीराइट अधिनियम बनाकर, कॉपीराइट की रक्षा के लिए इस कानून को देशभर में लागू किया गया। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य कॉपीराइट रखने, नए निर्माण से रक्षा करने, लोगों द्वारा अवैध लाभ प्राप्त करने की मंशा को विराम देना हैं। 

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

लेकिन बहुत से विषयों में यह कानून उतना प्रभावी नहीं है जितना इस विवाद में दिखा है, दरअसल इस कानून का दुरुपयोग करना भी कतिपय संस्थाओं ने शुरू कर दिया था जिसके कारण बहुत से अनावश्यक विवाद हुए और वास्तव में उन कलाकारों का, जिनके अधिकारों की रक्षा के लिए यह कानून बनाया गया था बहुत नुकसान हुआ। 

फिल्मी गानों पर किसका हक़?

लेखन को तो इस कानून में आसानी से प्रोटेक्ट किया जाता है लेकिन एक गाने पर बहुत से लोगो का अधिकार माना जा सकता है, गीतकार, गायक, संगीतकार, फ़िल्म प्रोड्यूसर आदि बहुत से लोग हैं जो उस पर अधिकार का दावा करते हैंलेकिन कॉपीराइट एक्ट के सेक्शन 38 (ए) के अनुसार गायकों को अधिकार है कि जितनी बार उनके गाए गाने व्यवसाय के तौर पर बजाए जाएं उसके लिए गायकों को उचित रॉयल्टी मिले (उस फिल्म को छोड़कर जिसमें गाना है, उसे दिखाया जा रहा है।)

यह रॉयल्टी उसे कैसे प्राप्त हो सारी बात यही आकर उलझ जाती है।

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

कॉपीराइट सोसायटी

कॉपीराइट कानून 1957 के सेक्शन 33 में बताया गया है कि कॉपीराइट के स्वामी चाहें तो कॉपीराइट सोसायटी बना सकते हैं। इसमें कम से कम सात सदस्य होने चाहिए। ये सदस्य सामूहिक रूप से कॉपीराइट के प्रबंधन का कार्य देखेंगे। ये सदस्य अधिकार संबंधी लाइसेंस दे सकते हैं। इसके बदले फीस लेते हैं। फीस कॉपीराइट स्वामियों के बीच बंटती है रजिस्ट्री करण की यह शक्तियां भारत सरकार को प्रदान की गई हैं।

इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी (आईपीआरएस) का लोगो। साभार : गूगल

आईपीआरएस का गठन

27 मार्च, 1996 को इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी (आईपीआरएस) रजिस्टर हुई थी। मुंबई से इसकी शुरुआत हुई। नौशाद साहब इसके पहले प्रेसिडेंट बने। फिर सबसे पहले रॉयल्टी, टीवी और रेडियो वालों से वसूल करनी शुरू की गई। यह सोसायटी देशभर में हो रहे म्यूजिकल आयोजनों से कॉपीराइट फीस लेती रही है और उन्हें परफॉर्म करने का लाइसेंस देती रही है। आईपीआरएस में लगभग 3,500 लेखक, गीतकार, संगीतकार, प्रकाशक एवं फिल्म निर्माता सदस्य हैं। 

इसी तरह से  एक है फोनोग्राफिक परफॉर्मेंस लिमिटेड, जो रिकॉर्डिड म्यूजिक यानी डीजे पर गाने प्ले करने वालों से फीस लेकर उन्हें लाइसेंस देती रही है। इसे PPL भी कहा जाता है।

आईपीआरएस के खिलाफ भी शिकायतें

लेकिन बाद में इस आईपीआरएस में बहुत अधिक वित्तीय अनियमितता सामने आयी और जावेद अख्तर साहब ने इनके खिलाफ आवाज उठाई कि उन्हें आज तक रॉयल्टी का एक पैसा नहीं मिलालता मंगेशकर ने भी यही कहा कि हमें कोई रकम नहीं मिली जबकि समिति एक अरसे से हमारे हिस्से की रॉयल्टी बाकी कलाकारों से वसूल कर रही है।

और ऐसे ही अन्य बहुत से कलाकारों ने इनके खिलाफ शिकायत भी की और सार्वजनिक रूप से अपील भी की कि इन्हें कोई रॉयल्टी का पैसा न दिया जाए। 

इन सब बातों से यशराज वाले इतने परेशान हुए कि उन्होंने अपनी अलग संस्था नोवेक्स नाम से अलग पंजीकृत करा ली।

फोनोग्राफिक परफॉर्मेंस लिमिटेड से संबंधित फाइल फोटो। साभार : गूगल

कॉपीराइट कानून में संशोधन

साल 2012 में कॉपीराइट कानून में संशोधन किया गया और यह व्यवस्था की गयी कि अब कॉपीराइट सोसायटी को हर साल नए सिरे से रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा।

साल 2012-13 में आईपीआरएस ओर पीपीएल ने इन विवादो के कारण अपना रजिस्ट्रेशन, कॉपीराइट सोसायटी से वापस ले लिया और वह बतौर एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, सेक्शन 30 के नियमो के अंतर्गत कार्य करने लगे।

लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यहाँ पर यह खड़ा होता है कि क्या उन्हें अब भी वही अधिकार हासिल हैं जो कॉपीराइट सोसायटी को हासिल होते हैं। उत्तर है निश्चित तौर पर नहीं।

दिल्ली हाईकोर्ट की वसूली पर रोक

खासकर पीपीएल पर यह आरोप लगता है कि वह इवेंट मैनेजमेंट कम्पनियों से अवैध वसूली करती आयी है। इस संबंध में दिल्ली उच्च न्यायालय ने रिकॉर्डेड साउण्ड एवं लाइव परफॉर्मेन्स के लिए लाइसेन्स देने वाली कॉपीराइट समितियों को देश भर में होटल्स, रेस्टोरेन्ट्स एवं इवेन्ट कम्पनियों से अवैध वसूली करने पर रोक लगाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने फोनोग्राफिक परफॉर्मेन्स लिमिटेड (पीपीएल), द इण्डियन परफॉर्मिंग राइट सोसायटी लिमिटेड (आईपीआरएस) तथा नोवेक्स कम्यूनिकेशन्स प्रा. लि. को पाबन्द किया है, कि वे कॉपीराइट एक्ट के प्रावधानों की पालना किए बगैर भारत में स्थित किसी भी संस्थान या व्यक्ति विशेष से पीपीएल-आईपीआरएस लाइसेंस के नाम पर जबरन वसूली नहीं करे। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ये तीनों कम्पनियां कॉपीराइट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड नहीं है, इसलिए कॉपीराइट अधिनियम के प्रावधानों और नियमों का पालन किए बगैर लाईसेन्स के नाम पर फीस वसूली नहीं कर सकती। 

प्रावधानों एवं नियमों के अनुसार इन कम्पनियों को कॉपीराइट एक्ट 1957 (संशोधित 1994) के अन्तर्गत पंजीकृत होना तथा जिन म्यूजिक कम्पनियों ने इनसे एग्रीमेन्ट कर रखा है, उसकी जानकारी अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करना आवश्यक है। इसके अलावा म्यूजिक कम्पनियों के रजिस्टर्ड गीतों की सूची, लाइसेंस फीस की राशि को भी वेबसाइट पर दर्शाना जरूरी है। 31 दिसंबर, 2016 तक प्रतिवादी उनकी संबंधित वेबसाइटों पर गीतों की सूची और समझौता अपलोड करेंगे अदालत ने आदेश दिया है कि प्रतिवादी पक्ष और इइएमए और पीपीएल, आईपीआरएस, नॉवेक्स और अन्य के बीच समझौता का उल्लेख होना चाहिए। 

(लेखक इंदौर से हैं और समसामयिक विषयों पर लिखते रहे हैं।)










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