नये शोध ने साबित किया, आर्य बाहर से आए थे

बदलाव , , रविवार , 02-07-2017


arya-visthapan-research-centralasia-europe

टोनी जोसेफ

नये डीएनए साक्ष्य भारतीय इतिहास के सबसे विवादित प्रश्न का समाधान कर रहे हैं। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जवाब कितना प्रामाणिक है। लिख रहे हैं टोनी जोसेफ :

एक पेचींदा मामला, जिस पर भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा बहस हुई है, अपना जवाब धीरे-धीरे लेकिन प्रामाणिक रूप से हासिल कर रहा है। क्या भारतीय-यूरोपीय भाषा बोलने वाले, जिन्होंने खुद को आर्य कहा, भारत में लगभग 2000 ई.पू.-1500 ई.पू. आये थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता समाप्त हो गयी थी, और अपने साथ संस्कृत भाषा तथा एक खास तरह की सांस्कृतिक परम्परा लेकर आये थे? आनुवंशिक अनुसंधान के आधार पर नये डीएनए साक्ष्य दुनिया भर के वैज्ञानिकों को स्पष्ट रूप से एक जवाब की ओर इशारा कर रहे हैं: हां, उन्होंने ऐसा किया।

बहुतों के लिए यह एक आश्चर्य हो सकता है, कुछ के लिए यह एक सदमा हो सकता है, क्योंकि हाल के वर्षों में प्रमुख आख्यान यह रहा है कि आनुवंशिकीय अनुसंधान ने आर्यों के देशांतर गमन के सिद्धांत को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है। यह व्याख्या एक अतिरंजना की कोशिश थी क्योंकि जो भी इन वैज्ञानिक शोध पत्रों को मूल में पढ़ा है, वह जानता है। लेकिन वाई-गुणसूत्रों (या ऐसे गुण सूत्र जो कि पुरुष पैतृक वंश, पिता से पुत्र, के माध्यम से हस्तांतरित होते हैं) पर आई नये आंकड़ों की बाढ़ ने इस अवधारणा को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है।

आर्यों के विस्थापन पर ग्राफिक्स।

वंश अवरोहण का क्रम

अभी हाल तक, केवल एमटी डीएनए (या मातृ वंश डीएनए, जो कि मां से पुत्री की ओर हस्तांतरित होता है) पर आंकड़े उपलब्ध थे जो कि इस तरफ इशारा करते थे कि पिछले 12,500 वर्षों से या लगभग इसी प्रकार के समय से भारतीय जीन पूल में बहुत ही कम बाहरी सम्मिश्रण हुआ है। नये वाई-गुणसूत्र के आंकड़े ने इस बात के पक्के सबूत दिये हैं कि विवादित अवधि के दौरान भारतीय पुरुष वंशावली में बाहरी जीन का सम्मिश्रण हुआ है, जिससे पहले का निष्कर्ष उलट गया है।

यदि हम पीछे मुड़कर एक नजर डालें तो हम पायेंगे कि एमटी डीएनए तथा वाई-डीएनए में यह अंतर एकदम वाजिब है। कांस्य युग के विस्थापन में लिंग पक्षपात मजबूती के साथ मौजूद था। दूसरे शब्दों में यदि हम कहें कि जिन्होंने विस्थापन किया वे प्रमुख रूप से पुरुष थे और इसलिए जो जीन हस्तांतरित हुए, वे एमटी डीएनए में दिखाई नहीं पड़ते हैं। इसके विपरीत, ये वाई-डीएनए के आंकड़ों में दिखाई पड़ते हैं: विशेष रूप से, लगभग 17.5% भारतीय पुरुष वंशावली को हैप्लो ग्रुप आर 1 ए ( हैपलो ग्रुप्स वंश अवरोहण के एकरेखीय क्रम को बताते हैं) से संबंधित पाये गये हैं जो कि आज मध्य एशिया, यूरोप तथा दक्षिण एशिया में फैले हुए हैं। पोंटिक-कैस्पियाई स्टेपी एक ऐसा क्षेत्र था जहां से आर 1ए पश्चिम एवं पूर्व दोनों ओर फैला जिसमें कि बाद में दो उप शाखाएं बनीं।

वह शोध पत्र जो कि अभी हाल के सारे खोजों को भारत में विस्थापन के एक सुव्यवस्थित तथा ठोस इतिहास के रूप में रखता है, का प्रकाशन एक अग्रणी जर्नल ‘बीएमसी इवोल्यूशन रीबायोलॉजी’ में महज तीन माह पूर्व हुआ था। उस शोध पत्र में, जिसका शीर्षक था ‘‘एजिनेटिक क्रोनोलॉजी फॉर द इंडियन सबकंटिनेंट प्वाइंट्स टू हेवी इलीसेक्स-बॉयस्ड डिस्पर्सल्स’’, प्रो. मार्टिन पी.रिचर्ड्स, हडर्स फील्ड विश्वविद्यालय, यूके के नेतृत्वमें 16 वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह निष्कर्ष निकाला कि ‘‘कांस्य-युग में मध्य एशिया से आनुवंशिकीय अंत: प्रवाह प्रमुख तौर पर पुरुष आधारित था, जो कि पितृ सत्तात्मक सामाजिक ढांचे के संगत था जैसा कि पहले का भारतीय-यूरोपीय समाज चरवाहे का काम प्रमुख तौर पर करता था। यह भारतीय-यूरोपीय विस्तार की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसका बुनियादी स्रोत पोंटिक-कैस्पियाई क्षेत्र था तथा जिसने वाई-गुणसूत्र वंशावली को सबसे निकट से यूरेशिया (यूरोप-एशिया) में 5000 तथा 3,500 वर्ष पूर्व आगे बढ़ाया’’।

एक ई-मेल के जवाब में, प्रो.रिचर्ड्स ने कहा कि भारत में आर 1ए की प्रमुखता ‘‘बहुत सुदृढ़ साक्ष्य हैं कि मध्य एशिया से पर्याप्त मात्रा में कांस्य-कालीन विस्थापन हुआ जो कि भारतीय-यूरोपीय भाषियों को भारत में लाया। प्रो.रिचर्ड्स तथा उनकी टीम का यह शक्तिशाली निष्कर्ष, पूरी दुनिया भर में आनुवंशिकी वैज्ञानिकों के कार्यों के माध्यम से अभी हाल के वर्षों में उपलब्ध नये आंकड़ों तथा निष्कर्षों के विस्तृत खजाने तथा उनके अपने स्वतंत्र अनुसंधान का नतीजा है।

पीटर अंडरहिल, स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में आनुवंशिकी विभाग में वैज्ञानिक, इस कार्य को करने वालों में से एक थे। तीन साल पहले, 32 वैज्ञानिकों की एक टीम का उन्होंने नेतृत्व किया तथा आर 1ए के वितरण तथा वंशावली के चित्रण का एक व्यापक अध्ययन प्रकाशित किया था। इसने पूरे यूरेशिया से 126 जनसमुदायों से 16,244 पुरुष व्यक्तियों के एक पैनल का उपयोग किया। डा. अंडरहिल के अनुसंधान ने यह पाया कि आर 1ए के दो सब-हैप्लोग्रुप्स हैं जिसमें कि एक प्रमुख तौर पर यूरोप में पाया जाता है तथा दूसरा मध्य तथा दक्षिण एशिया में परिसीमित था। यूरोप में आर 1ए नमूनों के छियानबे प्रतिशत नमूने सब-हैपलोग्रुप्स जेड 282 से संबंधित हैं जबकि मध्य तथा दक्षिण एशिया आर 1ए वंशावली का 98.4 प्रतिशत नमूने सब-हैपलोग्रुप्स जेड 93 से संबंधित है। ये दोनों ग्रुप्स सिर्फ 5,800 वर्ष पूर्व जाकर ही एक दूसरे से पृथक होकर अलग-अलग दिशाओं में गये। डा. अंडरहिल के अनुसंधान ने जेड 93 के अंदर यह दर्शाया है कि यह भारत में प्रमुख तौर पर था, आगे यह फिर कई शाखाओं में विभाजित हो गया। शोध पत्र में यह पाया गया है कि यह ‘‘तारों सदृश प्रशाखन’’ त्वरित विकास तथा छितराव का निर्देशन था। इसलिए, यदि आप वह अनुमानित समय जानना चाहते हैं जब भारतीय-यूरोपीय भाषा बोलने आये और भारत में तेजी से फैल गये, तो आपको उस तारीख की खोज करनी पड़ेगी जब जेड 93 अपने विभिन्न उप-समूहों या वंशावली में विभाजित हुआ। हम इसकी चर्चा बाद में करेंगे।

इसलिए, यदि हम संक्षेप में कहें तो आर 1ए पूरे यूरोप, मध्य एशिया तथा दक्षिण एशिया में फैला हुआ है, इसका उप-समूह जेड 282 केवल यूरोप में फैला है जबकि इसका दूसरा उप-समूह जेड 93 केवल मध्य एशिया तथा दक्षिण एशिया के हिस्सों में ही फैला है तथा जेड 93 के तीन प्रमुख उप-समूह केवल में भारत, पाकिस्तान तथा हिमालय के क्षेत्रों में प्रसारित हैं। आर 1ए के वितरण की इस स्पष्ट स्वीकार ने पहले की परिकल्पना पर पूर्णरूप से विराम लगा दिया है कि इस हैपलो ग्रुप का उद्गम स्थल भारत है तथा बाद में यह बाहर फैला। यह परिकल्पना एक गलत अनुमान पर आधारित थी कि भारत में आर1 वंशावली में अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी विविधता थी जो कि इस बात का संकेत हो सकती थी कि इसका उद्गम स्थल यहां है। जैसा कि प्रो. रिचर्ड्स कहते हैं कि ‘‘यह विचार कि आर1ए भारत में बहुत विविधतापूर्ण है, जो कि बड़े पैमाने पर अस्पष्ट माइक्रो सेटलाइट डेटा पर आधारित था, नये आनुवंशिक वाई गुण सूत्रों के आंकड़ों के बड़े पैमाने पर आने के बाद समाप्त हो गया है’’।

आर्यों के विस्थापन पर ग्राफिक्स।

जीन-विस्थापन की तारीख का निर्धारण:

अब हमें यह मालूम है कि कांस्य-युग में मध्य एशिया से भारत में पर्याप्त मात्रा में जीन का आगमन हुआ था, क्या हम समय को बेहतर तरीके से निर्धारित कर सकते हैं, विशेष रूप से जबकि जेड 93 का इसकी अपनी उप-वंशावलियों में विभाजन हुआ? हां, हम ऐसा कर सकते हैं। शोध पत्र यह दर्शाते हैं कि इस सवाल का जवाब अभी पिछले वर्ष अप्रैल 2016 में प्रकाशित हुआ था जिसका शीर्षक था ‘‘1,244 विश्वव्यापी वाई-गुण सूत्रों के अनुक्रम से निष्कर्षित मानव पुरूष जनसांख्यिकी में निर्धारक तथ्य (पंक्चुएटेड ब्रस्ट्स इन ह्युमन मेल डेमोग्राफी इनफर्ड फ्राम 1,244 वर्ल्ड वाइड वाई-क्रोमोजोम्स सीक्वेंसेज)’’। इस शोधपत्र, जो कि पांच महाद्वीप जनसंख्या के अंदर वाई-डीएनए हैप्लोग्रुप्स के प्रमुख विस्तार पर विचार करता है, को डा. अंडरहिल के साथ डेविड पोजनिक, स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी, जो कि 42 सह-लेखकों में से हैं, द्वारा प्रमुख रूप से लिखा गया है। इस अध्ययन में यह पाया गया है कि जेड 93 के अंदर सबसे महत्वपूर्ण विस्तार लगभग 4,000 से 4,500 वर्ष पूर्व हुआ। यह उल्लेखनीय है क्योंकि मोटे तौर पर लगभग 4,000 वर्ष वह समय था पहले सिंधु घाटी सभ्यता के पतन की शुरुआत हो गयी थी। (अभी तक पुरातत्वीय या किसी अन्य प्रकार से इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि एक के पतन से दूसरी सभ्यता की शुरुआत हुई, बहुत संभव है कि एक समय में ही हुई हो)।

बड़ी तादाद में आये नये आंकड़े इतने जबर्दस्त हैं कि कई वैज्ञानिकों, जो कि कांस्य युग के विस्थापन के बारे में संदेहास्पद या तटस्थ थे, ने अपने विचार बदल लिये हैं। डा. अंडरहिल स्वयं उसमें से एक है। उदाहरणार्थ, वर्ष 2010 के एक शोधपत्र में, उन्होंने लिखा है कि पूर्व में पिछली पांच या छह सहस्राब्दी में ‘‘पूर्वी यूरोप से एशिया-भारत सहित की ओर पर्याप्त पुरुष वंशावली के जीन के प्रवाह ’’के विरुद्ध साक्ष्य थे। लेकिन आज डा. अंडरहिल कहते हैं कि वर्ष 2010 के आंकड़ों तथा अब के उपलब्ध आंकड़ों में कोई तुलना ही नहीं है। ‘‘ उस समय के आंकड़े इस तरह से थे जैसे कि एक अंधेरे कमरे में हाथ में एक टार्च लेकर एक होल से देखा जाय, आप केवल एक कोना देख सकते हैं लेकिन पूरा कमरा आपको नहीं दिखायी पड़ सकता है, सम्पूर्ण जीन को हम एक अनुक्रम में बांध कर हम एक बेहतर प्रकाश में अब लगभग पूरा कमरा देखने में सक्षम हैं’’।

डा. अंडरहिल ही केवल ऐसे नहीं हैं जिनके पुराने काम को कांस्य-युग में भारतीय-यूरोपीय भाषा बोलने वालों के भारत में प्रव्रजन के विरूद्ध प्रयुक्त किया गया है। डेविड रिच, आनुवंशिकी वैज्ञानिक, जो कि हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में आनुवंशिकी विभाग में प्रोफेसर हैं, ऐसे दूसरे व्यक्ति हैं, हालांकि, अपने पुराने शोधपत्रों में उन्होंने बहुत सावधानी बरती है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण 2009 में प्रकाशित एक अध्ययन हैं जिसके प्रमुख लेखक डेविड रिच हैं, अध्ययन का शीर्षक है ‘‘रीकंस्ट्रक्टिंग इंडियन पॉपुलेशन हिस्ट्री’’ जो ‘नेचर’ में प्रकाशित हुआ। इस अध्ययन ने भारतीय जनसमुदाय के आनुवंशिकीय उप संरचना की खोज के लिए सैद्धांतिक रचना ‘एन्सेस्ट्रल नॉर्थ इंडियंस’(एएनआई) तथा ‘एनसेस्ट्रल साउथ इंडियन्स’ (एएसआई) का प्रयोग किया। अध्ययन ने प्रमाणित किया कि एएनआई आनुवंशिकीय रूप से मध्य-पूर्व, मध्य एशिया के लोगों तथा यूरोपियन से घनिष्ठ रूप से संबंधित है जबकि एएसआई केवल भारत में ही विशिष्ट रूप से पाये जाते थे। अध्ययन ने यह भी प्रमाणित किया है कि अनुमान लगाया जा सकता है कि आज भारत में कई समूह इन दो जन समुदायों का एक सम्मिश्रण हैं, जिसमें कि एएनआई वंशावली परम्परागत रूप से ऊंची जाति है तथा भारतीय-यूरोपीय भाषा बोलने वाले हैं। यह अध्ययन स्वयं में भारतीय-यूरोपीय भाषियों के यहां पहुंचने को अस्वीकार नहीं करता है, यदि कोई बात जो यह बताता है तो यह उसके विपरीत एएनआई का मध्य एशिया से आनुवंशिकीय श्रृंखलात्मक जुड़ाव है।

हालांकि, इस सैद्धांतिक ढांचें को तर्क से परे जाकर समझा गया और यह दलील दी गयी कि ये दोनों समूह भारत में सहस्राब्दियों पहले आये थे, उस समय से बहुत पूर्व जबकि भारतीय-यूरोपीय भाषियों का प्रव्रजन हुआ जो कि लगभग 4000 से 3500 वर्ष पूर्व हुआ। असल में, अध्ययन ने एक बड़ी चेतावनी शामिल किया है जो कि इसके विपरीत बात कहती है: ‘‘हम चेतावनी देते हैं कि जन समुदाय आनुवंशिकी में ‘मॉडल्स को चेतावनी के साथ लिया जाना चाहिए। जबकि वे ऐतिहासिक परिकल्पना के परीक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण ढांचा उपलब्ध कराते हैं, वे अतिसरलीकरण हैं। उदाहरणार्थ, वंशावली जन समुदाय (ऐनसेस्ट्रल पॉपुलेशन) वास्तविकता में संभवत: सजातीय नहीं थे जैसा कि हम अपने मॉडल में मानते हैं बल्कि इसके स्थान पर इस बात की संभावना है कि वे विभिन्न काल खंड में सम्मिश्रित होने वाले संबंधित समूहों के क्लसटर्स द्वारा सृजित हुये ’’। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि इस बात की संभावना है कि एएनआई बहु-विस्थापन का परिणाम है, संभवत: जिसमें  भारतीय-यूरोपीय भाषियों का विस्थापन शामिल है।

                                                                                           अनुवादः दयानंद द्विवेदी

(शोध पेपर को यहां पढ़ा जा सकता हैःhttps://bmcevolbiol.biomedcentral.com/articles/10.1186/s12862-017-0936-9)










Leave your comment











hari ram jayant :: - 12-21-2018

ss :: - 12-21-2018
सही ःहै लेकिन ये स्वीकार करने की बजाय शब्दों को तोड़ कर स्वदेशी बतायेन्गे

Devendra kumar :: - 12-20-2018
Jo desh ko and desh ke garibo ko siksha se vikash se dur rakha wah sabse Neech h Chhuya chhoot jaat paat insano me banaya wah sabse bada harami h badmas h dogla h Jo bharat desh me rahkar bharat ke logo ko gyan se door rakha Ho wah sabse Neech h Aj bhi Jo yahi kaam karte h wah neech h agar manav ko manav na samjhe wah jaanwar h Janvar bharat ka nahi Ho sakta Jo apne apko bada bataye kaam dhaam kuchh bhi nahi bheek magkar ya bhagwaan ke naam par dhan store kare ye duniya ka sabse bada chor h luter h dakait h aaj dusre prakar se loot rahe h prasasan ke seet ki gaddi me baith kar loot rahe h y Sabhi desh drohi h ab chaye bahri Ho ya deshi Devendra kumar Bhartya log sirname nahi likha karte ha unse jabarjasti likhaya jata h

Dheeresh :: - 12-17-2018
जबरदस्त

Amit tiwari :: - 12-17-2018
हद हो गाइ बेवकूफ़ी कि अरे मुर्ख आर्य एक गुनवाचक सब्द हे आर्य का अर्थ श्रेष्ठ होता हे।जो व्यक्ति अपने आचार-विचार से सम्पन्न हो उसे आर्य कहते हे। यदी आप को आर्यो के बारे मे सहि जानकारी चाहिऐ तो मेरा no लो 7778066490 एक दम तथ्यो के आधार पर मे यह सिद्ध कर दुङा कि आर्य वेदेशि नहि बल्कि इसि देश के मुल निवासी हे

????? ????? :: - 12-17-2018
मेरे लिए उतम जानकारी साबित हो रहा हैं।

Arun kp :: - 02-01-2018
मेरे जैसे इतिहास के विद्यार्थी के लिए सटीक जानकारी।आभार।

????? ????? :: - 09-13-2017
आप. मेरी Email id पर ईसके बारे में दासतावैजो को डालो Email gmail Sumilmourya312@gmail.com

????? ????? :: - 09-13-2017
कया आप मुझे. उस रिपोर्ट कि कापी भेज सकते हो

????? ????? :: - 09-13-2017

pratik :: - 08-03-2017
Above link is broken. Please provide proper link...

Nima Bantawa :: - 07-31-2017
Congratulation to team for the immense effort. The inscriptions, hundreds in number, unearthed in Amerna mound of Egypt too provide us ground to believe migration of Indo Aryan from Asia Minor to South Asia. The letters from Kings of Mith (comparable to Mithila of Hindu epic Ramayana) Tusharath (comparable to Dasharath of Ramayana) and his father Shutarna to Egyptian emperors Amenhotep III and IV provide archaeological base to take Egypt and Mith (Babylonia) as cradle land of The Epic. The Emperor Amenhotep III had expanded his empire throughout Africa to modern Jordan, Israel, Palestine, Iraq and Syria. The Mitanni king Shutarna had asked Amenhotep for gold and favour against neigbouring Kings. Shutarna had given his daughter, sister of King Dasharath, to his emperor too. Later his son Tusharath too gave his daughter to his Brother in Law and sent letters many times asking for gold and favour. The emperor Amenhotep III, unlikely in Ramayana, had married his own daughter Sita too. The marriage with own sisters and daughters was only way to keep royal blood pure in Egypt. The genetic tests of their Mummies too have rectified it. The emperor Amenhotep IV was succeeded by Ramses I of another dynasty. Being transferred from generation to generation for centuries, Amenhotep dissapeared and Ramses took the place of his predecessor in Indian oral tradition. In Ramayana, the epic Hero, God Ram is found black in complexion. The birth of Sita is mysterious, dramatical and unrealistic.

Naathuram Gondse :: - 07-15-2017
Bilkul bahar se aaye thei. Ab prashan hai modern aryan hai kon. Yeh jo trivedi chayurvedi srivastava shrma verma. Jitne b yeh upper caste wale hai yeh sab aryaan ke vanshj hai. Nikalo saalo yahan se. Ek baat aur hey moorknanadan yeh jo SARAL ya DIFFICULT hai na yeh b unme se ek hai. Niklo yaha se. Go to your mother land. Toh saral ji kab depart kr rhe hai.