हिंदू नौजवान के साथ पश्तून लड़की! ख़ुदा ख़ैर करे...!!

हरीरूद से गंगा तक , , शुक्रवार , 28-04-2017


india-afganistan-ganga-harirud-story-sondrya-naseem

सौन्दर्या नसीम

हरीरूद से गंगा तक...दूसरी किस्त

हेरात (अफ़ग़ानिस्तान) में हरीरूद दरिया का किनारा। हिंदू नौजवान के साथ एक पश्तून लड़की! क्या आप सोच सकते हैं कि ऐसे हाल में आगे क्या होगा! हिंदुस्तान जैसे मुल्क में ज़्यादा मुमकिन है कि इस तरह की मुहब्बत की दास्तानों का आख़िरी अंजाम लड़के-लड़की के भागकर शादी कर लेने में हो...या किन्हीं हालात में सुलह-समझौते की भी गुंजाइश यहाँ बन ही जाती है। नतीजे और भी हो सकते हैं, पर अफ़ग़ानिस्तान जैसे मुल्क में अगले हादसे का तख़य्युल एकदम आसान है और वह है इनकी मौत...ख़ासतौर से लड़की की।

मुहब्बत...

मुहब्बत...और वह भी अफ़ग़ानिस्तान में? क़रीब-क़रीब नामुमकिन। मुहब्बत के परिंदों की उड़ान यहाँ आसान नहीं। इस बात को ठीक से वही महसूस कर सकता है, जिसने अफ़ग़ानिस्तान की आबोहवा में साँसें ली हों। फ़िल्में तो मैं देखती नहीं, पर रिसालों वग़ैरह में सेंसरबोर्ड जैसी चीज़ के बारे में ज़रूर पढ़ा है। कह सकते हैं कि इश्क़ पर सेंसर का हामी रहा है हमारा मुल्क। इश्क़ की बात दूर, किसी ग़ैर रिश्तेदार के साथ बातें करती हुई कोई ख़ातून देख ली जाए तो उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ सकता है। जिसे आप ऑनर किलिंग कहते हैं, वहाँ आम बात है। शादियाँ आमतौर पर रिश्तेदारियों में ही तय की जाती है। इश्क़ के मुआमले बेहद कम सुनाई देते हैं, और अगर इस तरह की कोई बात हो तो बचकर पार निकल पाना मुश्किल है। इतनी कड़ी सज़ा कि रूह काँप जाए या अक्सर मौत...लेकिन नौजवान दिलों का क्या, सहमे-सहमे भी जब-तब ज़ोर से धड़क ही जाते हैं और सज़ाएँ भी पाते हैं। मुख़्तलिफ़ तहज़ीब की कैसी भी बातें हो, पर जज़्बात तो आख़िर दुनिया के किसी कोने में एक-जैसे उठ ही सकते हैं। क़ुदरत पर मुख़्तलिफ़ुलअक़ाइद का ज़ोर भला कितना चल सकता है!

तहज़ीब की उलटबांसियां

ख़ानदान की इज़्ज़त हमारे मुल्क में सबसे बड़ी बात है। परिवारों में बँटवारे के हालात कम ही आते हैं। क़ुनबा बड़ा भी हो जाए तो भी जहाँ तक हो सके, सब साथ रहते हैं। अजीब उलटबाँसियाँ हैं हमारी तहज़ीब में। परिवार की मज़बूती हमारी ताक़त है, जो हिफ़ाज़त का औज़ार है, लेकिन यही ताक़त एक औरत को गुनहगार कहकर उसे मौत के घाट भी उतार सकती है। जाती गुनाहों या ऐसे मुआमलों में क़ुनबे की इज़्ज़त के सामने मुआफ़ी जैसी किसी के चीज़ के हालात बहुत कम बनते हैं। शौहर अगर अपनी बीवी पर शक करके उसे घर से निकाल दे तो बीवी इंसाफ़ के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकती है, पर अमूमन क़ैदख़ाने में उसे ही जाना पड़ता है। बावजूद इसके, अफ़ग़ान ख़वातीन की फ़ितरत देखिए कि जेल के भीतर अपने हालात पर आँसू बहाते हुए हँस भी लेती हैं।

इन बातों से यह मतलब न लगाएँ कि अफ़ग़ान औरतें हमेशा ज़ुल्मोसितम की शिकार होती रहती हैं। असलियत यह भी है कि हमारे मुल्क में समाज की बनावट ऐसी है कि मर्द जब चाहे, आसानी से तलाक़ दे तो सकता है, पर देता नहीं है। तलाक़ के मुआमले वहाँ बेहद कम होते हैं। मर्द को एक से ज़्यादा बीवियाँ रखने की इजाज़त है, पर आमतौर पर एक से ज़्यादा बीवियाँ रखने की नौबत तभी आती है, जबकि छोटे भाई की बेवा से निकाह करने की बात हो। हमारे अपने क़ुनबे में दूर के एक ताया जी ने दो निकाह ज़रूर किए थे, पर बाक़ी किसी की दो शादियाँ नहीं हुईं। मुखिया के तौर पर घर की ज़िम्मेदारी बड़ी उम्र के मर्द और उसकी बीवी पर होती है। ख़वातीन इज़्ज़त की हक़दार हैं। बढ़ती हुई उम्र के साथ उनकी इज़्ज़त में इज़ाफ़ा होता जाता है, पर बच्चे जनने के बाद औरत की इज़्ज़त ख़ास हो जाती है। हाँ, घर में बड़ी उम्र का कोई मर्द न हो हो तो औरत के बजाय कम उम्र के नाबालिग मर्द का फ़ैसला ही आख़िरी होता है। हेरात के दूरदराज़ के इलाक़े इस मुआमले में काबुल की बनिस्बत कुछ ज़्यादा पुरानी सोच वाले हैं।

किसी समाज की यह बनावट आपको अजीब लग सकती है, पर हमारे लिए इसमें तअज्जुबअंगेज़ जैसी कोई बात नहीं है। ज़ाहिर है, इन हालात में अम्मी-अब्बू की मुहब्बत कैसे परवान चढ़ी और कैसे तमाम मुश्किलों से बच निकली, यह सोचते हुए मैं भी हैरत में पड़ जाती हूँ। इश्क़ फ़रमाने वाला गुनाह अम्मी को कड़ी सज़ा देने के लिए काफ़ी था ही, ऊपर से ग़ैर मुल्क और ग़ैर मज़हबी इनसान के साथ...वही बात हुई कि करेला और नीम चढ़ा।

अम्मी का इश्क

हम ऋषिकेश घूमते हुए लक्ष्मण झूला के नज़दीक दरिया के पानी में पैर लटकाए एक चट्टान पर बैठे थे, जब अम्मी से मैंने अब्बू से जुड़ी पुरानी यादें ताज़ा करने की ज़िद की। अम्मी ने अनमने ढंग से कहा था—‘’तू जानती तो है सब कुछ, अब और क्या बताऊँ।’’ आँखें नम हो आई थीं अम्मी की, पर उन्होंने आहिस्ता-से अपनी ज़िंदगी के पन्ने एक बार फिर पलटने शुरू कर दिए थे।

‘’बाबा का हिंदुस्तान से नाता और तेरे अब्बू की ख़ुफ़ियागीरी की फ़ितरत...ये ही दो चीज़ें थीं जिनकी वजह से हमारा निकाह मुमकिन हुआ। हालाँकि ज़रा भी चूक होती तो मेरी मौत तय थी। बाबा की सारी ज़िंदगी की कमाई इज़्ज़त ख़त्म हो जाती, सो अलग।’’

बाबा लफ़्ज़ से तअज्जुब में मत पड़िएगा। चीज़ों को कुछ-कुछ समझने लगी थी तो बाबा के ही मुँह से सुना था कि यह लफ़्ज़ अब्बू के मुल्क यानी हिंदुस्तान में भी बोला जाता है। बोबो, अमशिरा, सेवार, सेमोन, लाला, अमू, अमः, नयकह वग़ैरह से यहाँ के लोग अनजान होंगे, पर शौहर, बिरादर, आपा, काका, नाना, मामा जैसे रिश्तों वाले लफ़्ज़ मेरे ख़याल से काफ़ी इस्तेमाल किए जाते हैं। हमारे यहाँ अब्बू आग़ा हैं तो बाबा भी...पर अब्बू के अब्बू और अम्मी के अब्बू के लिए भी बाबा बोला जाता है। काका ख़ासतौर से बड़े भाई और अब्बू के भाई के लिए बोला जाता है। मामा में दोनों जगह कोई फ़र्क़ नहीं है। रिश्तों की एक लंबी रिवायत है और इसके लिए तमाम लफ़्ज़ हैं। हमारी पश्तो ज़बान की भी एक दिलचस्प ख़ासियत है कि यह अरबी-फ़ारसी की बनिस्बत हिंदुस्तान से ज़्यादा तअल्लुक़ रखती है। इसके कई लफ़्ज़ हिंदी-संस्कृत से नज़दीकी रखते हैं।

जब अब्बू अम्मी के पीछे पड़े और न चाहते हुए भी अम्मी इश्क़ की गिरफ़्त में आईं तो क़रीब हफ़्ते भर तक उनकी समझ में न आया कि यह बात घर में कैसे ज़ाहिर की जाय। इश्क़ की बात सामने आने का सीधा मतलब था मौत। एक दिन अम्मी ने अब्बू से अपने ज़ेहन में पसरे डर की बाबत कहा—‘’जनाब, आप ठहरे हिंदुस्तानी..आपके यहाँ इश्क़-मुहब्बत आसान खेल होता होगा, पर आपने तो मेरी जान साँसत में डाल दी है। बहुत कोशिश की कि किसी तरह आपसे जान छूटे, पर अब यह मुमकिन नहीं। हम अफ़ग़ानों को किसी के साथ दग़ा करना नहीं आता। मैं अपने वालिदैन से भी झूठ नहीं बोल सकती। ..आख़िर कितने दिनों तक मुँह छिपाकर मिल सकेंगे! बाबा की वजह से मुझे तमाम लड़कियों से ज़्यादा ही घूमने की आज़ादी मिली है, पर यही आज़ादी अब ख़तरे का सबब है।’’

अब्बू ने डाँटा—‘‘ख़बरदार मार्जिया, जो इस तरह से डरने की बात की। ख़ुफ़ियागीरी का सबक़ सीखने के दौरान मुझे कामयाबी हासिल करने की बातें बताई गई हैं। याद रखना हमें लैला-मजनू की नज़ीर नहीं पेश करनी है। वह हाल होगा तो देखा जाएगा, अभी हाल तो रब से बेहतरी की दुआ माँगो।’’

अब्बू ने जेब से सोने का एक लॉकेट निकाल कर अम्मी के हाथ में रख दिया। बोले—‘‘सँभालो, दादी ने दिया था इसे। उनका इरादा था कि अपने हाथों से बहू को पहनाएँगी, पर वे तो इस दुनिया में रहीं नहीं, सो मैंने सँभाल कर रखा हुआ है। किसी ख़ास मिशन पर न हुआ तो ज़्यादातर साथ रखता हूँ।’’

अम्मी ने लॉकेट पर निगाह डाली तो अजीब-सी तसवीर थी उस पर। पलट कर देखा तो उसके दूसरी तरफ़ हनुमान की तसवीर बनी हुई थी। अम्मी चौंकीं—‘‘यह क्या...इस पर किसी की निगाह पड़ी तो एक नई मुसीबत और गले पड़ जाएगी।’’

अब्बू ज़ोर-से हँस पड़े थे—‘‘देखो मार्जिया, सीधी-सी बात है...मैंने मेरा दिल जहाँ लगाना था, काम पर लगा दिया। अब तुम अपना दिल सँभालो। बस इतना समझ लो कि मैं तुम्हें अफ़ग़ानिस्तान से हिंदुस्तान ले जाऊँगा ज़रूर। फिलहाल, हफ़्ते भर के लिए पाकिस्तान जा रहा हूँ..आऊँगा, फिर सोचते हैं कि क्या करना है।’’

अम्मी बताती है कि अब्बू मुसकुरा रहे थे और पहली बार हिंदी फ़िल्म का एक नग़मा गुनगुनाते हुए उठे थे, जिसके बोल थे—नागन-सा रूप है तेरा..मैं बन के प्रेम सँपेरा..ले जाऊँगा तुझको...दुनिया देखेगी..। अब्बू फ़िल्मी नग़मे काफ़ी बेहतरीन गाते थे। मालूम नहीं यह नग़मा उन्हें कुछ ज़्यादा ही पसंद था या अम्मी को चिढ़ाने के लिए गाते थे। बहुत बाद में अब्बू ने इसकी पश्तो तरजुमानी सुनाई और बताया था कि यह बग़ावत नाम की एक फ़िल्म का गाना है। लापता होने के पहले तक का हाल यह था कि चार-छह दिन के बाद अब्बू कहीं बाहर से घर लौटते तो अम्मी को देखते ही मुसकुराते हुए यह नग़मा गुनगुनाने लगते थे। हम दोनों बहनों को भी इसकी कई लाइनें रट गई थीं, और कई बार अब्बू के शुरू करते ही हम भी उनके सुर में सुर मिलाने लगतीं।

ख़ैर, अम्मी ने लॉकेट को पर्स में सँभाल कर रखा और घर के लिए रवाना हो गईं। अम्मी की बेचैनी दिन-ब-दिन बढ़ रही थी। अब्बू को हफ़्ते भर बाद आना था। रातों की नींद दिन का चैन किसी क़ाबू में न था। क्या करें, कहाँ जाएँ, किससे कहें? आख़िर तीन-चार दिन बीतते-बीतते एक दिन शाम के धुँधलके में अम्मी बाबा के कमरे में पहुँचीं और उनकी गोद में सिर रखकर फफक कर रो पड़ीं। बाबा सक्ते में थे—क्या हुआ मेरी बच्ची..चुप हो जा—और अम्मी थीं कि बस ज़ारज़ार रोए जा रही थीं।  

जारी...

पहली किस्त पढ़ने के लिए 'जनचौक' के संस्कृति-समाज पेज पर पढ़ें- 'दो मुल्कों की दास्तान सौन्दर्या नसीम'।

janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/afganistan-india-sondrya-naseem/55










Leave your comment











Sundeep Raj Pandey :: - 06-17-2017
samjhsamjhna k samjhna BHI ek nasamjh h Kyoki Sharif krk dekho.... pyar hi kinda pyar hi ishwer pyar hi.... sb sb sb kuchh baat view ki h

??????? ???? ???????? :: - 04-29-2017
ये ' जिंदगी ' का बयान सौ अफसानों पर भारी है । अगली किश्त का इंतजार ।

Adarsh Singh Parihar :: - 04-28-2017
Can't wait for next part. & Want to read the full story in 1 part. Plz Think about It.

Dr Mahender Singh Parashe :: - 04-28-2017