संर्घष का दूसरा नाम मनोरंजन रॉय

हमारे नायक , , रविवार , 04-06-2017


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मसऊद अख़्तर

(1909 -1992)

मनोरंजन रॉय एक क्रांतिकारी, एक मज़ूदर नेता, एक अच्छे संगठनकर्ता और एक जनवादी लेखक के तौर पर जाने-पहचाने जाते हैं। 1930, 1950 व 1960 के दशक के दौरान मनोरंजन जी अनेक बार गिरफ्तार हुए व जेल भेजे गए। उन्होंने अपने जीवन के बारह वर्ष सामाजिक व मजदूर संघर्षों की खातिर जेल में व भूमिगत होकर बिताये।

प्रारंभिक जीवन

मनोरंजन रॉय का जन्म सन् 1909 में तत्कालीन जिला फरीदपुर (यह वर्तमान में बांग्लादेश में है) के कुआंपुर गांव में हुया था। उनके पिता का नाम अश्विनी कुमार रॉय और माता का नाम लबन्य प्रोवा रॉय था।  पिता आबकारी विभाग में कार्य करते थे। चूँकि पिता को नौकरी में तबादले की वजह से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ता था, अतः मनोरंजन जी को भी अपने पिता व परिवार के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ता था। यही वजह है कि मनोरंजन जी का स्कूली व कॉलेज का जीवन चटगाँव, रंगपुर, ढाका, जलपाईगुड़ी व कलकत्ता आदि अनेक स्थानों पर गुजरा।

कोलकाता का प्रेसीडेंसी कॉलेज (फाइल फोटो) साभार : गूगल

शिक्षा

उन्होंने जे.एम. सेन स्कूल, चटगाँव के कॉलेजिएट स्कूल, ढाका के जुबली स्कूल और कलकत्ता के हेयर स्कूल आदि में शिक्षा ग्रहण की। हेयर स्कूल से उन्होंने वर्ष 1925 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे की पढाई के लिए उन्होंने कलकत्ता के बंगवासी कॉलेज में प्रवेश लिया तथा वर्ष 1929 में चटगांव के शासकीय महाविद्यालय से बी.एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे एम.एस-सी. की शिक्षा के लिए उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में रसायन शास्त्र में प्रवेश लिया। बाद में उन्होंने 1933, 34 व 35 के दौरान देवाली जेल में रहते हुए विधि की परीक्षा उत्तीर्ण की।

राजनीतिक जीवन

मनोरंजन जी का राजनीतिक जीवन घटना प्रधान था. वे युगांतर पार्टी, कांग्रेस लेबर पार्टी, बोल्शेविक पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से संबद्ध रहे। 

मनोरंजन जी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत चटगांव में तब हुयी जब वे 11 वर्ष की अवस्था में स्कूली छात्र के रूप में गांधी जी का भाषण सुनने गए। वास्तव में गांधी जी की सभा में भाग लेने के लिए उन्हें रास बिहारी जी ने प्रोत्साहित किया था। मनोरंजन रॉय 1928 की शुरुआत में मास्टर दा (सूर्यसेन) के सम्पर्क में आए। उनकी सलाह से वह कलकत्ता में क्रांतिकारी ताकतों को संगठित व समन्वित करना शुरू किया। वर्ष 1930 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और प्रेसीडेंसी जेल में बंदी बनाकर रखा गया। बाद में प्रशासन द्वारा मास्टर दा के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से उन्हें बैरकपुर जेल भेज दिया गया और उनपर नज़र रखी गयी। कुछ समय बाद उन्हें मिदनापुर स्थित हिज़ली जेल भेजा गया, लेकिन इन सब कवायद के बावजूद ब्रिटिश सरकार को कोई सफलता नहीं मिली।

सीपीआई का लोगो

मार्क्सवाद का प्रभाव

इधर हिजली जेल में मनोरंजन जी कुछ ऐसे राजनीतिक कैदियों के सम्पर्क में आये जिन्होंने मार्क्सवाद का गहरा अध्ययन किया था। 22 जून 1932 को मनोरंजन रॉय को राजस्थान स्थित देवाली जेल भेज दिया गया। यहाँ रहकर उन्होंने अनुशीलन समूहों, युगांतर समूहों व बंगाल वालंटियर समूह के विरोध के बावजूद मार्क्सवाद का अध्ययन जारी रखा। वर्ष 1935 में उन्होंने अन्य राजनीतिक कैदियों के साथ स्वयं के साम्यवादी होने की घोषणा की।

वर्ष 1937 के आरम्भ में वह अचानक बीमार हो गए, इसलिए उन्हें देवली जेल से देवली चिकित्सालय में स्थानांतरित कर दिया गया। मार्च 1937 में उन्हें वापस प्रेसीडेंसी जेल भेज दिया गया। जुलाई, 1937 में बंगाल के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक कैदियों को जेल से रिहा कराने के लिए आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। सभी जेलों में राजनीतिक कैदियों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी, जो पन्द्रह दिनों तक चली। जब तत्कालीन भारत सरकार के गृह मंत्री वहाँ आए तो उन्होंने सभी राजनैतिक कैदियों को जेल से रिहा करने का आदेश दिया। इस आश्वासन के कुछ दिनों बाद मनोरंजन जी को भी जेल से रिहा कर दिया गया, परन्तु सितम्बर 1938 तक उन्हें उनके घर में नज़रबंद रखा गया। उन्हें जनवरी 1938 के प्रथम सप्ताह में जेल से रिहाई का आदेश मिला था व मार्च 1938 में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।

वह मिर्ज़ापुर स्ट्रीट स्थित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के कार्यालय गए जहां उनकी साम्यवादी पृष्ठभूमि के कारण सीएसपी की सदस्यता की उनकी मांग ठुकरा दी गई। इसी बीच उन्होंने कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव में जिला समिति व राज्य समिति सीट दोनों के लिए चुनाव लड़ा और वो पहली बार 1939 में चुनाव जीते। उन्होंने लेबर पार्टी की सदस्यता ग्रहण की लेकिन 1944 में फिर से सीपीआई में लौट आए।

वह एक अच्छे संगठनकर्ता थे. उन्हें पार्टी संगठन को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से विभिन्न समय अवधियों में बिहार, असम व उत्तर प्रदेश भेजा गया। उन्होंने 1938 में कुछ समय के लिए कलकत्ता से प्रकाशित होनेवाले ‘हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड’ (अंग्रेजी दैनिक) व कुछ समय तक ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ में भी काम किया।

वर्ष 1938 के जनवरी के तीसरे सप्ताह में कॉमरेड पंचूगोपाल भादुड़ी से परिचयात्मक-पत्र लेकर मनोरंजन जी भूकैलाश रोड, खिदरपुर स्थित डॉक लेबर यूनियन के कार्यालय पहुंचे और वहाँ काम करना प्रारम्भ कर दिया। बाद में जब वह सीपीआई में वापस लौटकर आये तो उन्हें कलकत्ता निगम कर्मकारों की यूनियन के लिए काम करने को कहा गया। कुछ समय पश्चात उन्हें राहत कार्य के लिए ‘पीपल्स रिलीफ कैंप’ के कार्यालय में भेज दिया गया।

पश्चिम बंगाल की बसंती कॉटन मिल (फाइल फोटो)। साभार : गूगल

वर्ष 1945 में उन्हें मजदूरों का संगठन खड़ा करने के उद्देश्य से टीटागढ़ भेजा गया। यहाँ उन्होंने मजदूरों के मध्य कार्य करते हुए इस औद्योगिक क्षेत्र के अनेक बड़े संघर्षों को नेतृत्व प्रदान किया। इसमें एक ऐतिहासिक संघर्ष वर्ष 1946 में बसंती कॉटन मिल में हुई हड़ताल थी जो आज़ादी के बाद तक जारी रही।

वर्ष 1948 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिए जाने पर उन्हें भूमिगत होना पड़ा। इस दौरान उत्तरी बंगाल में उन्हें जलपाईगुड़ी व दार्जिलिंग के चाय बागानों के मजदूरों को संगठित करने का जिम्मा सौंपा गया और इन्हें संगठित करने में उन्हें बेहद सफलता भी मिली। वर्ष 1952 में सीपीआई से प्रतिबन्ध हटा लिए जाने पर उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से ट्रेड यूनियन गतिविधियों के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें कॉटन टेक्सटाइल फेडरेशन का अध्यक्ष चुना गया।  वर्ष 1960 में उन्हें बीपीटीयूसी का महासचिव चुना गया। वह 1970 तक इस पद रहे।

मज़दूर संगठन सीटू के आंदोलन का एक दृश्य। साभार : गूगल

सीटू का गठन होने पर वह सीटू के पश्चिम बंगाल इकाई के महासचिव बनाए गए और वह 1990 तक इस पद पर बने रहे। वे सीटू के अखिल भारतीय सचिव भी बनाए गए। बाद में वे कोषाध्यक्ष भी बने। वर्ष 1990 में वह सीटू की पश्चिम बंगाल कमेटी के अध्यक्ष बनाए गए। 1991 में वे आल इंडिया सीटू के उपाध्यक्ष बने। वह कॉटन टेक्सटाइल वर्कर्स फेडरेशन के महासचिव भी रहे।

1947 में वह सीपीआई की पश्चिम बंगाल राज्य समिति के सदस्य बनाए गए थे। वह 1952 से 53 तक सीपीआई की पश्चिम बंगाल राज्य समिति के सचिव मंडल के सदस्य रहे। सीपीआई का विभाजन होने के पश्चात मनोरंजन जी सीपीआई (एम) से जुड़ गए तथा जीवन पर्यंत वे इसके सदस्य रहे। वर्ष 1977 में वह सीपीआई (एम) के पश्चिम बंगाल राज्य सचिव मंडल के सदस्य तथा 1978 में केन्द्रीय समिति के लिए चुन लिए गए।

संघर्ष में बीता जीवन

1930, 1950 व 1960 के दशक के दौरान मनोरंजन जी अनेक बार गिरफ्तार हुए व जेल भेजे गए। उन्होंने अपने जीवन के बारह वर्ष सामाजिक व मजदूर संघर्षों की खातिर जेल में व भूमिगत होकर बिताये। मनोरंजन जी एक उच्च कोटि के लेखक भी थे। उन्होंने श्रम आन्दोलन पर अनेक लेख भी लिखे जो मुख्यतः बंगाली में है। उन्होंने श्रम आन्दोलन पर बंगाली भाषा में दो पुस्तकें भी लिखीं जिनमें से एक पुस्तक श्रम आन्दोलन की एकता (1986) तथा दूसरी पुस्तक साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष तथा श्रमिक वर्ग के आन्दोलन (1987) पर है।

मनोरंजन जी का निधन 13 जून 1992 को लगभग 83 वर्ष की अवस्था में एसएसकेएम हॉस्पिटल कलकत्ता (कोलकाता) में हुया।      










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