मंटो पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे- जमील गुलरेज़

जन्मदिन पर विशेष , , बृहस्पतिवार , 11-05-2017


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लोकमित्र

आज उर्दू के मशहूर अफसानानिगार सआदत हसन मंटों का जन्मदिन है। अगर वे जिंदा होते तो आज 105 साल के हो गए होते। 11 मई, सन्  1912 को समरालापंजाब में पुश्तैनी बैरिस्टरों के परिवार में पैदा हुए मंटो, जितने अच्छे कहानीकार थे, उतने ही प्रखर पत्रकार और पटकथाकार भी थे. उन्होंने फ़िल्मों की पटकथाएं और रेडियो के लिए नाटक भी खूब उम्दा लिखे हैं। लेकिन इंसानी भावनाओं को झकझोर देने वाली कहानियां लिखने में तो वे मास्टर थे।

कहानीकार मंटो (फाइल फोटो)

हिंदी के मशहूर कहानीकार कमलेश्वर, मंटो को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ कहानीकार मानते थे। बीसवी शताब्दी में दुनिया में सिर्फ दो ही बड़े गद्यकार हुए हैं, जिन्होंने बिना उपन्यास लिखे भी खुद को दिग्गज साहित्यकार मनवाया है। उनमें से एक हैं एंटोन चेखव और दूसरे सआदत हसन मंटो।

मंटो साहित्य के जानकार और कथा-कथन संस्था के मुखिया जमील गुलरेज़ मंटो की कहानियों का पाठ करते हुए। फोटो: जनचौक

लेकिन मंटो के साथ हमने इंसाफ नहीं किया, उनके जीते जी भी नहीं और उनके मरने के बाद भी नहीं।यह कहना है, मंटो साहित्य के मर्मज्ञ और कथा-कथन संस्था के मुखिया जमील गुलरेज़ का। जमील साहब अपनी टीम के साथ मुंबई तथा पूरे देश में विभिन्न मंचों से मंटो की कहानियों का नाट्यपाठ करते हैं। आज के दिन भी वह मुंबई के बांद्रा इलाके में मंटो को श्रद्धांजलि देते हुए अपनी टीम के साथ उनकी कुछ कहानियों का मंचीय पाठ कर रहे हैं। इसके बाद जल्द ही उन्हें लखनऊ में भी अपना एक कार्यक्रम करना है।

जमील साहब के मुताबिक़ आजकल दिन ब दिन देश में जिस किस्म का साम्प्रदायिक माहौल बनता जा रहा है, वैसे में मंटो पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। उनके मुताबिक़ आज ज़रूरी है कि हम मंटो की उन कहानियों का बारबार पाठ करें जो इंसान के साम्प्रदायिक चेहरे को बेनकाब करती हैं। मंटो के साहित्य की मौजूदा प्रासंगिकता पर जमील साहब से मुंबई में उनके खार स्थित आवास पर जनचौक के सहयोगी लोकमित्र की उनसे विस्तार से बातचीत हुई। पेश हैं इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

पत्रकार लोकमित्र से बात करते हुए कथा-कथन संस्था के मुखिया जमील गुलरेज़ फोटो: जनचौक

विशेष साक्षात्कार

लोकमित्र- आज जिस किस्म का साम्प्रदायिकता के अनुकूल माहौल बन गया है, उस पृष्ठभूमि में मंटो को याद करना कितना प्रासंगिक है?

जमील गुलरेज़- इस सवाल का जवाब देने के पहले मैं मंटो की कुछ छोटी-छोटी कहानियां सुनाना चाहूँगा। उनकी एक कहानी है, जिसका शीर्षक है- सात-ए-शीरी, मतलब मीठापन। कहानी यूँ है कि इत्तला महसूल हुई कि महात्मा गांधी की मौत पर इज़हार ए मसर्रत करने के लिए अमृतसर, ग्वालियर और बम्बई में कई जगह लोगों में मिठाई बांटी गयी। अब इस कहानी के संदर्भ में अगर आप देखें तो जो माहौल है, उसमें गांधीजी के अनुयायी कम होते जा रहे हैं और गोडसे के अनुयायी बढ़ते जा रहे हैं।

उनकी एक और कहानी है- कौन हो तुम? कहानी इस तरह है- हर हर महादेव-हर हर महादेव। सुबूत? मेरा नाम धरमचंद है। ये कोई सबूत नहीं हुआ? चार वेदों में से कोई भी बात मुझसे पूछो? वेद हम नहीं मानते, सुबूत दो, सुबूत? हां..हां..पाजामा ढीला करो, पाजामा ढीला हुआ, मार डालो...मार डालो.अरे ठहरो मैं तुम्हारा भाई हूँ। भगवान की कसम तुम्हारा भाई हूँ, तो ये क्या सिलसिला है? जिस इलाके से आ रहा हूँ, वह हमारे दुश्मनों का था, इसलिए मुझे मजबूरन ऐसा करना पड़ा। अपनी जान बचाने के लिए। बस यही एक चीज गलत हो गयी, बाकी बिलकुल ठीक है। उड़ा दो इस गलती को। गलती उड़ा दी गयी और उसी के साथ धरमचंद भी उड़ गया। यही माहौल आज भी है। आपको अपना धर्म साबित करने के लिए आज भी पजामा ढीला करना पड़ेगा। हमने आजादी के बाद जितनी उन्नति की है, मानसिकता उस सबसे कहीं ज्यादा गिरती गयी है।

मैं आजादी के तुरंत बाद पैदा हुआ। मैं जब बड़ा हुआ तो मुझे कभी नहीं लगा कि मेरे साथ कोई भेदभाव कर रहा है, लेकिन जब मैं कॉलेज पहुंचा, तब ये लकीर मिट चुकी थी। आज मुसलमान मुंबई के तमाम इलाकों में चाहकर भी रहने के लिए मकान नहीं ले सकता।

मंटो अपने बच्चों के साथ (फाइल फोटो) साभार: गूगल

लोकमित्र- मंटो भारत-पाक विभाजन के काफी वक्त बाद पकिस्तान गये थे? क्या वह पकिस्तान नहीं जाना चाहते थे? आखिर यह देरी क्यों? उनके दिमाग में क्या चल रहा था?

जमील गुलरेज़- मंटो को बंबई से प्यार था। वह बंबई छोड़ना नहीं चाहते थे। वह पकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। सिर्फ़ एक घटना घटी और उनको हिन्दुस्तान छोड़ना पड़ा.उनके दोस्तों में अशोक कुमार भी थे। दंगे पर उनकी एक कहानी है,जिसमें उन्होंने बताया है कि कैसे अशोक कुमार उन्हें बचाकर ले गए थे। उस समय के एक बड़े हीरो थे, श्याम। उनका उस जमाने में वही रुतबा था, जो आज शाहरुख खान का है। श्याम और मंटो बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों रोज साथ शराब पीया करते थे। उन दिनों दंगों की हर रोज़ तरह-तरह की ख़बरें आ रही थीं। श्याम उससे बहुत डिस्टर्ब हो गए थे। इसी डिस्टरबेंस के दौरान एक दिन शराब पीते हुए उन्होंने मंटो से कहा कि ये सब सुन सुनकर मेरा खून उबलता है। हो सकता है किसी दिन मैं तुमको भी मार डालूँ। यह सुनकर मंटो थर्रा गए। सबसे पहले वो घबराए अपने बीवी-बच्चों के लिए। इसलिए सबसे पहले उन्होंने यहाँ से अपने बच्चों और बीवी को भगाया। जब बीवी-बच्चे वहां चले गए तो फिर उन्हें भी जाना ही था, लेकिन वहां जाने के 6 महीने बाद उन्होंने यहाँ सबको ख़त लिखा कि वे उन्हें यहाँ वापस बुला लें, लेकिन कोई उन्हें बुला न सका।

लोकमित्र- मंटो भारत में न रह पाये तो क्या इसमें हम हिन्दुस्तानी भी दोषी नहीं हैं?

जमील गुलरेज़- हैं न, मैं हिंदुस्तानीपाकिस्तानी में नहीं बांटता, लेकिन मैं कहता हूँ कि हम किसी तरफ के इंसान हों, उतने ही दोषी हैं। अगर श्याम ने वह जुमला नहीं कहा होता तो मंटो नहीं गए होते। उनकी तो जान अटकी हुई थी बंबई में।

लोकमित्र- पाकिस्तान सरकार का मंटो के साथ मुसल्सल मोहब्बत और नफ़रत वाला रिश्ता क्यों रहा?

जमील गुलरेज़- मोहब्बत तो शायद से उन्होंने कभी की ही नहीं।

लोकमित्र- नहीं, पाकिस्तान सरकार ने मंटो को पुरस्कृत भी किया, लेकिन बार-बार जेल में भी डाला। उन पर तमाम मुकदमें चलाये।

जमील गुलरेज़- देखिये उनकी पकिस्तान सरकार से हमेशा लड़ाई उस मुद्दे को लेकर रही, जिस बिना पर पकिस्तान बना है। वह बहुत अच्छे मुसलमान नहीं थे, वह तो कम्युनिस्ट थे। नमाज़ पढना, रोज़े रखना, ढकोसले करना उनको बिल्कुल पसंद नहीं था और वही सब कहते थे खुलकर। इससे कठमुल्ले उनसे अक्सर नाराज़ रहते थे। कठमुल्लों कि पंहुच ऊपर तक थी, इसलिए सरकार उन्हें टार्चर करती थी और वह, वहां घुट रहे थे। इसी घुटन के कारण उन्होंने और ज्यादा शराब पीनी शुरू कर दी।

लोकमित्र- मंटो बहुत जल्दी मर गए। क्या इसके लिए उनके अलावा कोई और जिम्मेदार था?

जमील गुलरेज़- हम सब जिम्मेदार थे, चाहे वो लकीर के उस पार के हों या इस पार के। दोनों ही तरफ़ के लोगों ने उन्हें इतना उदास कर दिया कि उन्होंने अपने आपको शराब में पूरी तरह से डुबो लिया। अहमद नसीम काज़मी ने उनसे कहने की कोशिश कि भैया, शराब कम पीया करो तो मंटो ने जवाब दिया- मैंने तुम्हे अपने ज़मीर कि मस्जिद का इमाम नहीं मुकर्रर किया। तुम मुझे नसीहत मत दो। उन्होंने किसी कि नहीं सुनी और शराब के कारण जल्दी चल बसे लेकिन उस छोटी सी उम्र में वह जो लिख गए है वह शायद लोग अस्सी साल की उम्र में भी न लिख सकें। 

 

 










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