जब नेता भी कहने लगें मन लाग्यो मेरो फकीरी में

आड़ा-तिरछा , , बुधवार , 29-05-2019


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बसंत रावत

सचमुच देश बदल रहा है। काफ़ी हद तक बदल भी चुका है। और ये बदलाव हमारे राजनेताओं में  सबसे पहले दिख रहा है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली नयी बात जो देखने को मिल रही है वह यह है कि संन्यासी संन्यास धर्म के विरुद्ध राजनीति जैसे घोर सांसारिक आकर्षणों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, उनमें कुर्सी प्रेम जाग रहा है, लेकिन हमारे कुछ बड़े राजनेतागण कुर्सी मोह को त्यागने को आतुर दिखाई दे रहे हैं। वो कितना त्याग पाते हैं ये तो समय बताएगा लेकिन सन्यास वृत्ति  दो विपरीत दिशाओं में बहती हुईं  हमें घोर कलयुग का दर्शन करा रही है।

 पिछले कुछ  दिनों से हमारे शीर्ष नेताओं में गज़ब का त्याग और बैराग्य छलक रहा है। अगर यही हाल रहा तो हमें डर है कि लुटियन्स दिल्ली जल्द ही एक दिन वैराग्य नगरी बन जाएगी। 

 और एक धारा  जो उल्टी  बह रही है देश में इसको खास तौर से लखनऊ और भोपाल में देख सकते हैं। भोपाल से बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और लखनऊ  में बतौर कांग्रेस उम्मीदवार आचार्य प्रमोद कृष्ण चुनावी मैदान में थे। ये दोनों मुक्त आत्माएं धर्म का कारोबार करते हैं सदा ईश्वर में लीन रहते हैं लेकिन अचानक कुर्सी की ओर खिंचते चले गये। 

लेकिन दूसरी ओर  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हैं जिन्हें बेरहम कुर्सी से इतनी कोफ्त हो गयी कि  इनके अंदर वैराग्य इतना उफान मारने  लगा कि समस्त दरबारी पशोपेश में  पड़ गए ।

 लोक सभा में मिली अपमानजनक हार के बाद  एक तरह का श्मशान वैराग्य से ग्रसित होकर उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद को ठोकर मार दी, त्यागपूर्ण गुस्से में कह दिया वे प्रेजिडेंट का दायित्व नहीं निभाना चाहते।  कांग्रसी हक्के बक्के रह गए। है न त्याग की बात? 

अब अपने फ़क़ीर प्रधानमंत्री को ही देख लो। उनकी तो बात ही निराली है। अभी  19  मई  को आपने  भी वो अनोखा  अविस्मरणीय दृश्य तो देखा  होगा जब हमारे प्रधानमंत्री  सत्य की खोज करने  हिमालय में निकल पड़े और  17 घंटों की तपस्या करने केदारनाथ के पास  की एक  गुफ़ा में अंतर्ध्यान हो गए थे। भला हो उस जांबाज़ कैमरा मैन का जिसने 125 करोड़ देशवाशियों को गुफ़ा में ध्यानस्त हमारे तपस्वी प्रधानमंत्री के ध्यानयोग की झलक  दिखायी। बाकी कर्मयोग और वैरायग्य की खूबसूरत बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने खुद कर डाली प्रचंड जनादेश  हासिल करने के बाद, अति विनम्र भाव से देश को सम्बोधित करते हुए। बिल्कुल नए अंदाज में। उनके भाषण में सद्भावना के लिये चिंता झलक रही थी। ऐसी चिंता वे पहले भी कर चुके हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए। 

उन्होंने देश की अपनी "प्रिय  जनता" से कहा कि मेरे प्यारे देशवासियों आपने इस फ़क़ीर की जी भर कर झोली भर दी-  क्या ऐसा उद्बोधन किसी प्रधानमंत्री के मुंह से सुना था किसी ने आज तक! फ़क़ीर प्रधानमंत्री। स्वघोषित ही सही, है न नयी बात? 

फ़क़ीर की झोली भर दी यानी उनके कमंडल   में 352 कमल डाल दिये।  वे बतौर राजनैतिक फ़क़ीर कमल की ही भिक्षा लेने निकल पड़े थे देश भर में। उन्हीं के शब्दों में, जनता ने  दिल खोल कर भिक्षा दी। ये अलग बात है उस वक्त  वे फ़क़ीरी की बात कम और चौकीदारी की बातें ज्यादा करते थे । और अब जब  चौकीदारी का प्रयोजन सिद्ध हो गया तो चौकीदार शब्द से ही नाता तोड़ लिया। अब शायद चौकीदार शब्द में वो अपील, वो क्रांतिकारी फील नहीं आता होगा। आउट ऑफ फैशन भी तो हो गया ये शब्द।  आखिर कोई कब तक अपने को चौकीदार कह सकता है! झूठ की भी एक सीमा होती है।

लेकिन आपसे विशेष अनुरोध है कि आप इस फ़क़ीर की वेशभूषा पर मत जाइए। प्रसून जोशी ने मोदी में जो फ़कीरी देखी, आप भी देखने की कोशिश कीजिये, यकीन मानिए आपको भी दिख जाएगी फ़कीरी।  भई, दिन में चार बार सूट बदलने वाला भी फ़क़ीर हो सकता है। क्यों नहीं हो सकता। फ़कीरी तो एक मिज़ाज़ है। आखिर वो सब कुछ तो देश के लिये करता है अपने लिये कुछ नही करता। सांसें भी लेता है तो देश के लिये। उसका दिल भी धड़कता है तो देश के लिये, अपने लिये कुछ नहीं। "मैं अपने लिये कुछ नही करूंगा" ,याद है न फ़क़ीर का ये  महावाक्य? फिर तो मान लो कि वो है तो फ़क़ीर। फ़क़ीर होना बड़ी बात है।

इधर बंगाल से खबर आ रही है कि ममता दीदी को भी मुख्यमंत्री  की कुर्सी से वैराग्य हो गया। शायद उनके किल्ले में बीजेपी की सेंध लगने के बाद कुर्सी चुभने लगी हो।

और मध्यप्रदेश से भी कुछ ऐसा ही सुनने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ  को भी अपनी  कंटीली कुर्सी से मोह भंग हो गया है, इसीलिये तो उन्होंने  त्याग पत्र की पेशकश की है। शायद उनको अपनी कुर्सी हिलती हुई दिखने लगी हो।

लेकिन सबसे ज्यादा त्याग का परिचय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिया है शायद अपनी माताश्री की तरह उन्हें भी अंतरात्मा की आवाज  सुनाई दी हो।

इस देश में त्यागी को ज्यादा पूज्यनीय माना और समझा जाता है। महात्मा गांधी इसकी मिसाल हैं ।

राहुल गांधी उसी राह पर निकल पड़े हैं लेकिन  कमबख्त दरबारी मानने वाले नहीं। उनके द्वारा सीडब्ल्यूसी में मनोनीत सदस्यों ने विधवा प्रलाप करना शुरू कर दिया है।

गांधी को अगर गांधी की राह पर जाने दिया तो असली फ़क़ीर का पुर्नजन्म होगा और इस गांधी के रूप में हम सचमुच में असली गांधी  को पा सकेंगे  जिसे त्याग और वैराग्य का स्वांग नहीं करना होगा। 

(बसंत रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और “दि टेलीग्राफ” के अहमदाबाद ब्यूरो चीफ रह चुके हैं।)








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