जनसंघर्षों की आंच में तपकर बने थे नियोगी

हमारे नायक , , रविवार , 23-07-2017


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मसऊद अख्तर

शंकर गुहा नियोगी

(1943 – 1991)

नई आर्थिक नीति के बाद पहले मजदूर नेता के बतौर शहीद हुए शंकर गुहा नियोगी का जन्म 19 फ़रवरी, 1943 को आसनसोल, पश्चिम बंगाल के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुया था। इनका बचपन ऊपरी असम के जंगलों में बीता। शुरुआती स्कूली शिक्षा कलकत्ता में व बाद में जलपाईगुड़ी में हुई। 50 के दशक के अंतिम वर्षों में नियोगी जी वामपंथी राजनीति की तरफ आकर्षित हुए। कुछ समय के लिए वह आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की स्थानीय इकाई के संयुक्त सचिव भी रहे। 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में नियोगी जी छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नगरी भिलाई आ गए जो कि उनकी स्वयं की चुनी हुई कर्मभूमि रही। यहां आने के बाद वह दुर्ग में अपने चाचा के साथ रहने लगे। तब से उन्होंने स्वयं को पूरी तरह छत्तीसगढ़ का बना लिया। वह हिंदी और छत्तीसगढ़ी अच्छी तरह बोल लेते थे। छत्तीसगढ़ में ही उन्होंने आशा नाम की एक स्थानीय छत्तीसगढ़ी लड़की से शादी भी की।

भिलाई इस्पात उद्योग में एक कुशल मजदूर के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने बीएससी व एएमआईई स्तर की शिक्षा ग्रहण की। गरीबी के कारण बड़ी कठिनाई से विभिन्न काम करते हुए उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। विद्यार्थी जीवन में ही वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सक्रिय रूप से जुड़ गए थे। बाद में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़ गए। 1966-67 के दौरान वह क्रांतिकारी राजनीति में कूद पड़े और कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की नवगठित समन्वय समिति में शामिल हो गए।

यूनियन संगठक के तौर पर शुरुआत

1965-66 में भिलाई स्टील प्लांट में कार्य करते हुए नियोगी जी एक यूनियन संगठक के रूप में उभरे। वह ‘ब्लास्ट फर्नेस एक्शन कमेटी’ के सचिव भी रहे। बारिया कांड में हिन्दू-मुस्लिम दंगों में नियोगी जी ने दंगा विरोधी अभियान में हिस्सा लिया। यूनियन सम्बन्धी उनकी कार्यवाहियों को यूनियन नेताओं द्वारा मान्यता नहीं मिली। 1967 में नियोगी जी क्रांतिकारी राजनीति की ओर आकर्षित हुए। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की अग्रदूत कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ कम्युनिस्ट रिवोल्युशनरीज से उनका सम्बन्ध रहा। 

भिलाई इस्पात उद्योग में काम करते हुए नियोगी ने वहां पहले जुझारू मजदूर संगठन ‘ब्लास्ट फर्नेस एक्शन कमेटी’ के गठन में मदद पहुंचाई। जल्द ही उन्हें सुरक्षा के लिए खतरा बताकर नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने हिंदी में एक साप्ताहिक पत्र ‘स्फुलिंग’का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इसी काल में उन्होंने मध्य भारत के वन क्षेत्र के महाराष्ट्र वाले छोर पर स्थित चंद्रपुर और गढ़चिरौली इलाकों में काम प्रारम्भ किया। कालान्तर में वो बस्तर आ गए। इस दौरान उन्होंने विभिन्न प्रकार के काम किये। उत्तरी बस्तर में वन मजदूर के रूप में काम किया तो दुर्ग में मछलियां पकड़ने और बकरी चराने का काम किया, कैरी जुन्गेरा में उन्होंने खेत मजदूर के रूप में भी काम किया। 

स्थानीय संघर्षों में हिस्सेदारी

इन सभी जगहों पर काम करते हुए नियोगी जी वहां के स्थानीय संघर्षों में भी शामिल रहे। जैसे कि बड़े बाँध, मोंगरा जिला (राजनांदगांव) के विरुद्ध आदिवासी संघर्ष, दइहान पानी का संघर्ष आदि। आपातकाल के समय उन्हें बस्तर से गिरफ्तार कर लिया गया और 13 महीनों तक वे जेल में बंद रहे। जेल से रिहा होने के बाद वो दानी टोला आकर बस गए। यहां उन्होंने उन खदान मजदूरों को संगठित किया जहां वे खुद दैनिक दिहाड़ी पर पत्थर तोड़ने का काम करते थे। वह सबसे पहले आल इंडिया कांग्रेस में शामिल हुए और अपनी लगन तथा मेहनत के फलस्वरूप उन्होंने एक नई यूनियन ‘छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ’ (सीएमएसएस) का गठन किया। सीएमएसएस की प्रारम्भ से ही प्रमुख विशेषता औरतों की ट्रेड यूनियन गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी का होना रही।

सीएमएसएस का पहला प्रमुख संगठित कार्य सितम्बर 1977 में अनिश्चितकालीन हड़ताल थी। उनकी मांग थी– जीवन स्थिति में सुधार। उन दिनों खदान मजदूरों को रोजाना, जिस दिन वे काम करते थे 4 रुपया दिया जाता था। इसके बदले मजदूरों से 16-16 घंटे काम लिए जाते थे। संघर्ष के इस दौर में आगे चलकर सीएमएसएस ने ठेका मजदूरों का भी मुद्दा उठाया। दल्ली-राजहरा के 8000 मजदूरों में से अधिकतर मजदूर ठेके के आधार पर ही काम करते थे। यूनियन ने इन मजदूरों के विभागीकरण करने तथा ठेका प्रथा समाप्त करने की मांग की। अंत में यूनियन ने अपनी सहकारी समितियां बनायीं जिन्होंने ठेकेदारों का स्थान लेकर उनके द्वारा होने वाले मजदूरों के शोषण को रोका। 

एक पत्रिका का कवर पेज।

मशीनीकरण का विरोध

संघर्ष के अगले दौर में यूनियन ने मशीनीकरण के खिलाफ आवाज़ उठायी और 1980 के मई में हड़ताल घोषित कर दी गयी। जनवरी 1981 में मशीनीकरण के खिलाफ संघर्ष तेज़ होने के साथ ही शंकर गुहा नियोगी, सहदेव साहू और जनक लाल ठाकुर को जिला बदर के आदेश दे दिए गए। बाद में न्यायालय द्वारा इस आदेश को रद्द कर दिया गया। अंत में भिलाई इस्पात उद्योग को यूनियन के साथ समझौते में आना पड़ा जिसमें वे विभागीयकरण की मांग को आंशिक रूप से स्वीकार किये। इस दौरान सीएमएसएस ने अर्ध मशीनीकरण के वैकल्पिक कार्यक्रम को इस प्रकार विकसित कर लिया कि उत्पादन व उत्पादन शक्ति में बिना मजदूरों की छंटनी किये बढ़ोत्तरी हो। 

मजदूरी बढ़ाने के लिए संघर्ष

इस विकल्प ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा। मजदूरों द्वारा चलाये गए संघर्ष व उनके द्वारा प्रस्तुत वैकल्पिक अर्ध मशीनीकरण के कार्यक्रम के कारण भिलाई इस्पात उद्योग को अपनी मशीनीकरण की योजना को स्थगित करना पड़ा। कालांतर में 1989 में मजदूरों कीई छंटनी का एक और प्रयास किया गया। एक बार फिर सीएमएसएस के नेतृत्व में काफी बड़ी संख्या में मजदूर हड़ताल पर चले गए जो तीन सप्ताह तक जारी रही। एक बार पुनः मजदूरों की जीत हुई। 4 रुपये मजदूरी को 72 रूपये में बदल जाना व एक कार्य दिवस में 16 घंटों की जगह 8 घंटों का हो जाना, मजदूरी व कार्यदशा में हुए सुधार को दर्शाता है।

शंकर गुहा नियोगी ने न केवल मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने के लिए संघर्ष किया बल्कि उनके उपभोग मदों में बदलाव लाने का भी प्रयास किया। चूंकि मजदूरों की आय का एक बड़ा हिस्सा शराब में चला जाता था, अतः मजदूरी बढ़ जाने पर भी उनके परिवार की जीवन दशा में कोई बदलाव न हुआ। अपनी यूनियन के जरिये शंकर गुहा नियोगी व उनके साथियों ने सबसे पहले शराबखोरी के खिलाफ आन्दोलन शुरू किया। दल्ली-राजहरा के आदिवासी इलाके में शराब का चलन बहुत ज्यादा था और मजदूरों की तंगहाली के अनेक कारणों में से यह एक मुख्य कारण था। 

यहां के लोगों की सामाजिक आर्थिक हालत में सुधार लाने के लिए इस तरह का आन्दोलन जरूरी भी था। यूनियन ने जन सभाओं, व्यक्तिगत संपर्कों तथा राजनीतिक शिक्षा के जरिये अपने इस अभियान के समर्थन में भारी संख्या में मजदूरों को एकजुट किया। यूनियन के सदस्यों के लिए एक शर्त यह रखी गई कि वे शराब न पीएं। अगर कोई सदस्य इस नियम का उल्लंघन करता था तो उसपर जुर्माना किया जाता और अगर इसपर भी वह नहीं मानता तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता था। सामाजिक बेहतरी की लड़ाई के लिए नियोगी जी ने यूनियन की इन सीमाओं के मद्देनज़र ‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ की स्थापना की। 

शंकर गुहा नियोगी।

समाज सुधार के एजेंडे को प्राथमिकता

इसके अलावा भी मजदूरों के कल्याण के लिए यूनियन ने कई अन्य महत्वपूर्ण कार्य किये। यूनियन ने एक 80 बिस्तरों वाले अस्पताल की स्थापना की जो आज शहीद अस्पताल (1977 गोलीकांड में शहीद मजदूरों की याद में) के नाम से जाना जाता है। यूनियन ने बच्चों की शिक्षा के लिए अनेक विद्यालय भी खोले। यूनियन के इन्हीं अनोखे प्रयासों ने सुधारवादी बुद्धिजीवियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

नियोगी जी ने स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए ऐसा क्षेत्र चुना जहां गरीबी तथा शोषण था और वहां क्रांतिकारी कम्युनिस्टों का वैसा कोई संगठन वहां नहीं था। नियोगी जी बड़े धैर्य के साथ द्वंद्वात्मक भौतिकवाद तथा वैज्ञानिक चिंतन को आधार बनाकर कार्य शुरू किया और अपनी सोच के अनुरूप एक मॉडल तैयार करने में लगे रहे।

सत्ता से रहा संघर्ष का रिश्ता

1979 से छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे ने हर वर्ष 19 दिसम्बर के दिन ‘वीर नारायण दिवस’ के रूप में मनाना शुरू कर दिया। वीर नारायण छत्तीसगढ़ किसान आन्दोलन के नेता थे जिन्हें अंग्रेजों द्वारा 1857 में मार डाला गया था। पारम्परिक व सत्ता में आये नवोदित वर्ग ने राज्य की सहायता से उस दिन होने वाली सभाओं व रैलियों पर रोक लगाने के प्रयास किये। लेकिन तीन वर्ष बाद जन दबाव के चलते मध्य प्रदेश सरकार ने वीर नारायण को इतिहास के एक नायक के रूप में मान्यता दे दी। आनन-फानन में सरकार द्वारा उनकी एक जीवनी प्रकाशित की गयी। यहां तक कि सरकार ने वीर नारायण के वंश से एक व्यक्ति को भी ढूंढ निकाला और उसे स्वतंत्रता सेनानियों को दी जानेवाली पेंशन देनी शुरू कर दी।

खदानों में अपने मूल आधार से आगे, मोर्चे को चारों तरफ प्रसिद्धि मिलती रही। 1985 के विधानसभा चुनावों में मोर्चे के नेतृत्व में आन्दोलन औद्योगिक व शहरी क्षेत्र से आदिवासी क्षेत्र में फैला। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर तब अधिकतर पहली पीढ़ी के थे। इस कारण उनका गांव से सम्बन्ध बहुत गहरा था। यही वह सम्बन्ध है जिसकी बदौलत मोर्चा गांव में सामाजिक न्याय पाने के लिए चल रहे आन्दोलनों से जुड़ा। इनमें से कुछ उल्लेखनीय हैं – कृषि भूमि को नष्ट करने वाली लौह अयस्क मिट्टी से बचाव व मुआवजे का आन्दोलन (कुमुरकट्टा), गाँव के सामूहिक अन्न भण्डार को भ्रष्ट प्रमुखों की मुट्ठी से निकालने के लिए आन्दोलन (बोहरन भेडी), भ्रष्ट मठाधीश के खिलाफ संघर्ष (नादिया) तथा कई अन्य किसानों को पानी व सिंचाई सुविधाओं के लिए चलाये गए आन्दोलन।

ट्रेड यूनियन आंदोलन को नई ऊंचाई दी

धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे से जुड़ी यूनियनों ने खदानों के अलावा अन्य औद्योगिक श्रमिकों में काम करना शुरू कर दिया। इनमें से एक थी राजनांदगांव में एनटीसी मिल की ट्रेड यूनियन। मोर्चे के ध्वज तले, कपड़ा मिल मजदूरों द्वारा चलाये गए आन्दोलन के दौरान ही 12 सितम्बर 1984 को पुलिस फायरिंग में तीन मजदूर मारे गए। आगे चलकर मोर्चे से जुड़ी यूनियनें केमिकल, सीमेंट व अन्य मजदूरों तक फ़ैल गईं। इस प्रक्रिया का चरम भिलाई-दुर्ग का आन्दोलन है जिसमें आगे चलकर शंकर गुहा नियोगी की नृशंस ह्त्या हुई।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 का गैर कानूनी प्रयोग 1977 में गोली कांड की वजह था। चौदह वर्ष बाद क़ानून की इसी धारा के दुरूपयोग से भिलाई में एक श्रम विवाद को ‘क़ानून और व्यवस्था कीई समस्या’ में तब्दील कर दिया गया। नियोगी जी के कार्यों पर रोकथाम हेतु उन्हें समय-समय पर कैद में रखा गया। इसका कारण कोई विशेष अपराध नहीं था। मुख्यतः बिना मुकदमों के हिरासत में लेना ही उनके खिलाफ ख़ास हथियार रहा। 1970 के दशक के शुरू में निरोधक कैद अधिनियम (पी.डी. एक्ट) के अंतर्गत, आपातकाल के दौरान मीसा एक्ट में और 1980 के दशक में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) में उन्हें गिरफ्तार किया गया। 1989 में नियोगी जी को दुर्ग से तड़ीपार करने के आदेश जारी किये गए थे। 1990 में उन्हें पूरे छत्तीसगढ़ से तड़ीपार करने के प्रयास किये जा रहे थे। इन दोनों ही मामलों में अदालत ने तड़ीपार करने पर रोक लगा दी। बीस वर्षों में कई बार जेल जाने के बावजूद किसी भी अदालत ने किसी भी मुक़दमे में उन्हें अपराधी घोषित नहीं किया। नियोगी जी का असली अपराध था कि वो संवैधानिक घेरे की सीमाओं में शासक वर्ग द्वारा थोपे गए ढांचे में जनवादी आन्दोलन के लिए एक जगह बनाने में संघर्षरत थे। भिलाई इस्पात उद्योग का यह कुशल मजदूर जो तीस वर्ष पहले इस क्षेत्र में आया था, अंत में इसी फैक्ट्री के समीप ही आने के तीस वर्ष बाद मार डाला गया। 27 सितम्बर 1991 को उनकी जनपक्षधर आवाज़ को खामोश करने के लिए शासक-पूंजीपति गठजोड़ द्वारा ह्त्या कर दी गयी।

एक तरह से शंकर गुहा नियोगी को जनता के संघर्षों ने तैयार किया था। जिसका जीवन और मौत जन आन्दोलन का एक अभिन्न अंग है।










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