गांधी जी के निर्देश पर मज़दूरों के बीच किया काम

हमारे नायक , , रविवार , 18-06-2017


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मसऊद अख़्तर

श्रम राजनीति और श्रम आन्दोलन की दुनिया में गोपाल रामानुजम, जी. रामानुजम के नाम से जाने जाते हैं। उनका नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाने वाला एक जाना-पहचाना नाम है।

 

गांधीवादी रामानुजम

रामानुजम गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे और बहुत अधिक वैचारिक मतभेदों में विश्वास नहीं रखते थे। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह किसी पक्ष विशेष का पूरी तरह समर्थन नहीं करते हों बल्कि देश के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र की सार्थक भूमिका में उनका दृढ़ विश्वास था और इसी प्रकार जूट और वस्त्र उद्योग के राष्ट्रीयकरण की वकालत करने वालों में वह सबसे मुखर और अग्रणी थे। 

साफ राय

इसी प्रकार मजदूरी को उत्पादकता से सम्बद्ध करने के संबंध में उनकी पृथक व स्पष्ट राय थी। इस विषय में उनकी राय यह थी कि उत्पादकता के लिए श्रम ही एकमात्र उत्तरदायी कारक नहीं है बल्कि कुछ अन्य तत्व भी ऐसे हैं, जिन्हें उत्पादकता के आंकलन के ध्येय से ध्यान में रखा जाना चाहिए, जैसे कि निवेश, ऊर्जा कि उपलब्धता, समय से उचित निर्णयों का लिया जाना तथा प्रबन्धन-दक्षता तथा इसलिए उनकी राय थी कि उपयुक्त उत्पादकता मानकों के अभाव में मजदूरी को उत्पादकता से जोड़ना उचित नहीं होगा।

शांति के लिए इधर-उधर भटके

रामानुजम जी का जन्म 1915 में तमिलनाडु के रामानाथपुरम जिले के एयरकोट्टई गाँव में एक मध्यमवर्गीय पुरोहित परिवार में हुया था। वह काफी आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे तथा अपना अधिकतर खाली समय वेदों, उपनिषदों, वेदान्त विशेषकर शंकराचार्य व रामानुज के दार्शनिक साहित्य के अध्ययन करने में लगाते थे। उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा इंटरमीडियट के बाद छोड़ दी और कुछ वर्षों तक पत्रकार के रूप में कार्य किया। लेकिन इसमें उन्हें संतुष्टि न मिल सकी। इसके बाद वह यहां-वहां भटकते हुए साधु-संतों के सानिध्य में शान्ति की तलाश में ऋषिकेश चले गए, परन्तु यहां भी उन्हें शान्ति नसीब नहीं हुई।

श्रमिक नेता जी. रामानुजम (फाइल)।

मज़दूरों के बीच मिली शांति

वे जिस मानसिक उलझन और कष्ट से गुजर रहे थे, इसके बारे में उन्होंने महात्मा गांधी को लिखा। महात्मा गांधी ने उन्हें अहमदाबाद आकर मजदूरों के साथ काम करने कि सलाह दी। इसके उपरान्त रामानुजम जी हिन्दुस्तान मजदूर सेवक संघ, जिसकी स्थापना महात्मा गांधी ने ट्रेड यूनियन आन्दोलन के काम में लगे लोगों के लिए की थी, से जुड़ गए। इस संस्था से अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल, जो उस संघ के अध्यक्ष थे, ने रामानुज जी के अहमदाबाद के टेक्सटाइल मजदूर संघ कि तर्ज़ पर तमिलनाडु के टेक्सटाइल मजदूरों को संगठित करने की जिम्मेदारी सौंपी. इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने से पहले रामानुजम जी ने यह महसूस किया कि उन्हें टेक्सटाइल मजदूरों की समस्याओं का व्यक्तिगत अनुभव हासिल करना चाहिए, इसलिए उन्होंने एक टेक्सटाइल मिल में आकस्मिक मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया जो कि उस समय की जातीय स्थिति और उनके उच्च ब्राह्मण पृष्ठभूमि को देखते हुए यह विचित्र माना गया।

इंटक का लोगो।

इंटक की स्थापना

रामानुजम के मद्रास जाने से पहले सरदार पटेल ने कामराज के लिए उन्हें  एक पत्र दिया, लेकिन कामराज उनके प्रति उदासीन रहे। कालान्तर में भी उनके संबंधों में कभी मधुरता नहीं आई। मद्रास में अपने काम को शुरू करके रामानुजम ने धीरे-धीरे अन्य टेक्सटाइल केन्द्रों जैसे कि कोयम्बटूर आदि के मजदूरों के बीच प्रभाव बढ़ा लिया। उन्होंने वर्ष 1947 ईस्वी में अन्य कुछ लोगों के साथ मिलकर भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) की स्थापना की। 1958 में एस.आर. वसावडा के उपरान्त इंटक के अध्यक्ष बनने के बाद रामानुजम जी राष्ट्रीय स्तर पर श्रम मंच पर आ गए।

उनका अध्यक्षीय कार्यकाल दो वर्षों का रहा, इसके बाद वे दो दशकों से अधिक समय तक संगठन के महासचिव रहे। वर्ष 1985 में बिंदेश्वरी दुबे के बिहार के मुख्यमंत्री पद पर चुने जाने के बाद रिक्त हुए इंटक अध्यक्ष के पद पर एक बार फिर उन्हें चुना गया और 1994 में गोवा के राज्यपाल बनने तक इस पद पर कार्य किया। रामानुजम ने अनेक शासकीय निकायों में इंटक का प्रतिनिधित्व किया। वे वर्ष 1965 में न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में गठित पहले राष्ट्रीय श्रम आयोग के सदस्य थे, उन्हें कर्मचारी भविष्य निधि योजना में आने वाली कठिनाइयों के अध्ययन के लिए गठित समित का अध्यक्ष भी चुना गया। केन्द्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में रामानुजम जी ने इस संगठन को नई दिशा प्रदान की। वह अनेक सार्वजनिक उपक्रम प्रतिष्ठानों के निदेशक रहे, जिसमें हिन्दुस्तान शिपयार्ड और भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स शामिल है। वे अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन में श्रमिकों के प्रतिनिधि भी रहे।

रामानुजम जी की गांधी जी के ट्रस्टीशिप में गहरी आस्था थी। रामानुजम ने औद्योगिक विवादों को सुलझाने के लिए स्वैच्छिक विवाचन की अवधारणा को काफी बढ़ावा दिया और वह सीमेंट उद्योग में दो बार मजदूरों के प्रतिनिधि के रूप में विवाद को स्वैच्छिक विवाचन के आधार पर हल करने के लिए प्रेरित करने में सफल रहे।

सादगी-सरलता

उनका पूरा जीवन सरलता, सादगी और इमानदारी की मिसाल रहा। अपने कार्यकाल के दौरान वे जब कभी भी दिल्ली सरकारी बैठकों में हिस्सा लेने आते थे तो हमेशा ही सरकारी आतिथ्य को स्वीकार न करते हुए इंटक के मुख्यालय में रुकना पसंद करते थे।

एक ट्रेड यूनियन नेता के रूप में विदेशी दौरों से भी उन्हें गुरेज़ था। साथ ही मजदूर संगठनों के लिए आर्थिक रूप में विदेशी सहायता के भी वह प्रबल विरोधी थे, सिवाय श्रम संगठन के द्वारा प्रशासित कोष के।

पद्मभूषण अवार्ड का लोगो

पद्मभूषण से सम्मानित

हालांकि इंटक को कांग्रेस पार्टी का हिस्सा माना जाता है,लेकिन रामानुजम जी ने हमेशा इंटक के स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखने का प्रयास किया। ट्रेड यूनियन नेता के रूप में रामानुजम जी मार्क्सवाद को समय की आवश्यकताओं से पिछड़ा हुया मानते थे। स्वभाव से अत्यंत विनम्र तथा मृदुभाषी रामानुजम जी को श्रम आन्दोलन में उनकी महत्वपूर्ण कार्य के लिए वर्ष 1985  में ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया गया।

कई पुस्तकें लिखीं

रामानुजम जी 1994-95 के दौरान गोवा और 1995-99 के दौरान उड़ीसा के राज्यपाल रहे। अपने जीवन काल के दौरान अपनी श्रम आन्दोलन संबन्धी अनेक गतिविधियों में व्यस्तता के बाद भी उन्होंने अनेक भाषाओं में बहुत से लेख लिखने के साथ-साथ तमिल व अंग्रेजी में अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं। उनकी रचनाओं में कुछ प्रमुख रचनाएं हैं – औद्योगिक सम्बन्ध: एक दृष्टिकोण, फ्रॉम द बबूल ट्री : ए स्टोरी ऑफ़ इंडियन लेबर, द थर्ड पार्टी, द हनी बी : ए न्यू कल्चर इन इंडस्ट्रियल रिलेशन्स, इंडियन लेबर मूवमेंट, यारूकागा (तमिल), इवारूकागा (तमिल), मैनेजमेंट : द रिंग साइड व्यू आदि। 

1915 में जन्में जी. रामानुजम ने 26 जून 2001 को 86 साल की उम्र में आखिरी सांस ली और सबको अलविदा कह गए।

 

 










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