सुनिए! सेटल होने का मतलब सिर्फ शादी और बच्चे नहीं हैं

आधी आबादी , , मंगलवार , 04-07-2017


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प्रतीक्षा पांडेय

कहां काम करती हो... दिल्ली, रहती कहां हो... अपना फ्लैट लिया है... कितनी तनख्वाह है ....80 हज़ार ...तो सेटल कब होना है ...यह बहुत आम सवाल हैं पर मूल में देखिये तो इन सवालों में खास मानसिकता छिपी है। खुद का घर, अच्छी आमदनी, अपने पैरों पर खड़ी महिला से जीवन में व्यवस्थित होने का प्रश्न होता है और इससे तात्पर्य होता है कि शादी कब करोगी, बच्चे कब पैदा करोगी। ऐसा ही सवाल सानिया मिर्जा से भी होता है और ऐसा ही सवाल एक सामान्य लड़की से भी होता है।

महिला क्रिकेट विश्वकप में भाग ले रही भारतीय टीम। फोटो साभार: गूगल

हमारी मानसिकता

महिला क्रिकेट विश्वकप शुरू हो गया है लेकिन कहीं चर्चा होती नहीं दिख रही, पैनल नहीं बैठ रहे, विशेषज्ञ टिप्पणियां नहीं कर रहे, सट्टेबाजी भी नहीं हो रही, क्यों पता है? क्योंकि ये महिला विश्वकप है। पिछले कुछ सालों का यदि आंकलन करें तो महिलाओं का प्रदर्शन हर खेल में अच्छा रहा है। कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, तिरंदाजी, तैराकी, जिमनास्ट... खेल की ऐसी कोई विधा नहीं जिसमें महिलाओं का उम्दा प्रदर्शन ना हो फिर भी गौर करिये कितनी बातें होती हैं उनके विषय में और उनकी उपलब्धियों को कितनी तवज्जों दी जाती है। खबरों की दुनिया के पैरोकार उनकी उपलब्धियों पर बात नहीं करते बल्कि यह जानना चाहते हैं कि उनकी इस सफलता में किस पुरुष ने सहयोग किया।

टेनिस स्टार सानिया मिर्जा। फोटो साभार : गूगल

खिलाड़ियों से खेल!

सानिया मिर्जा एक बड़ा टेनिस टूर्नामेंट जीत कर आती हैं तो सवाल होता है आप अपने पति को कितना क्रेडिट देती हैं, शुक्रिया करना चाहेंगी उन्हें, आप लाइफ में सेटल कब होंगी, वगैरह वगैरह...

यहां लाइफ में सेट होने से तात्पर्य मातृत्व सुख की मोहर से है। प्रेमी, पति और घऱ तक सीमित रहने से है।

मिताली राज अपनी काबिलियत और मेहनत से भारतीय महिला क्रिकेट को ऊंचाईयों पर ले जा रही हैं तो उनसे सवाल यह हो रहा कि पुरुष क्रिकेट खिलाड़ियों में आपका पसंदीदा खिलाड़ी कौन है।

बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल। फोटो साभार : गूगल

साइना नेहवाल से प्रश्न होता है शादी करके सेटल कब होंगी। किसी भी महिला के लिए विवाह करना, मातृत्व सुख को प्राप्त करना चुनाव है, अनिवार्यता नहीं। उनकी मेहनत से जुड़ा न कोई ख्याल, न सवाल और न ही सराहना, बल्कि शब्दों का ऐसा जाल फेंका जाता है कि उनकी हिम्मत उसी में उलझ जाए।

बराबरी का किस्सा सिर्फ आदर्शों में देखने को मिलता है यथार्थ इसे छूता भी नहीं। किस तरह की मानसिकता है जहां लिंग के आधार का भेदभाव तो होता ही है किसी महिला की कामयाबी को दोयम दर्जा देकर उसे हतोत्साहित किया जाता है।

यदि फिल्म चक दे इंडिया के कुछ दृश्य याद होंगे तो खेलों में महिलाओं की पहुंच की सच्चाई वैसी ही है। उनके खेल और प्रदर्शन को खेल संघ से लेकर परिवारजन तक गंभीरता से नहीं लेते और यदि अपनी मेहनत से कोई मकाम मिल जाए तो कैसे नीचे खींचा जाए इसकी हज़ार योजनाएं तैयार होती हैं। इतनी बाधाओं रुकावटों के बावजूद भी इन ललनाओं के हौसले बुलंद हैं। सानिया मिर्जा उतनी ही बेबाकी से जवाब देती हैं और कहती हैं कि वो सेटल हैं अपने जीवन में और जो कुछ हैं वो उनकी मेहनत और लगन है। मीताली राज उस सवाल के जवाब में एक सवाल पूछती है कि क्या पुरुष खिलाड़ियों से भी ऐसा सवाल होगा। इस तरह के जवाब उन लोगों की मानसिकता पर करारा तमाचा है और एक संदेश भी कि अब तो इस ओछी मानसिकता से बाहर आइये। 

किसी भी मकाम पर पहुंचनें पर आखिर एक महिला की काबिलियत की बात क्यों नहीं होती उसके दूसरे तीसरे मायने क्यों तलाशे जाते हैं। इस ढोंग से इतर कब यथार्थ में देखने मिलेगा कि आधी आबादी को बराबर की नजरों से देखा जा रहा है।










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Geeta petwal :: - 07-04-2017
How to change the mentality of societies, big question is this ,,,but I think we have to start this from our home to teach our children for humanities not by gender wise