पीआर का मतलब परमानेंट रिवोल्यूशनरी

हमारे नायक , , रविवार , 21-05-2017


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मसऊद अख्तर

पी. राममूर्ति  (1908 -1987)

अपने तमाम साथियों व देश भर में फैले लाखों मजदूरों के बीच कामरेड पीआर के नाम से प्रसिद्ध पी. राममूर्ति का जन्म तमिलनाडु के तंजौर जिले के वेप्पाथुर नामक गांव में 20 सितम्बर, 1908 को एक रुढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस वक़्त तंजौर में धान की खेती प्रमुखता से होती थी। आगे चलकर उस क्षेत्र के खेतिहर मजदूर तथा लघु व सीमान्त किसानों को बहुत ही संघर्ष का सामना करना पड़ा। इनमें से कई संघर्ष का नेतृत्व कामरेड पीआर व इनके समकालीन अन्य साथियों ने किया। पीआर की प्रारम्भिक शिक्षा गाव के ही स्कूल में हुयी। अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने बड़े भाई के पास जो कि रोजगार की तलाश में तंजौर से मद्रास चले आये थे, चले आये। वर्ष 1918 से उनका परिवार वर्तमान चेन्नई के ट्रिपलीकेन क्षेत्र में रहने लगा जो मैरिना समुद्र तट के बहुत पास था। वो क्षेत्र उस वक़्त की राजनैतिक गतिविधियों का केंद्रबिंदु भी था। स्कूली छात्र पीआर के ऊपर इसका गहरा असर पड़ा। स्वतंत्रता आन्दोलन, जलियांवाला नरसंहार, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आह्वान व ऐसे ही अन्य अनेक आन्दोलनों ने बालक पीआर को आकर्षित किया। तमिल, अंग्रेजी व संस्कृत की शिक्षा तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के बारे में जागरूकता ने उन्हें प्रेरित किया कि इसमें वो भी अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें और इसी क्रम में वे अपना स्कूल छोड़ने के बारे में सोचने पर मजबूर हुए।

खेल के बेहद शौकीन थे

मैच देखने के शौक़ीन पी राममूर्ति जी एक बार एक मैच देखने के लिए पेड़ पर चढ़ गए और मैच देखने के दौरान वो पेड़ से गिर गए और उनके पैर में काफी चोट लगी। बावजूद इसके वो मात्र तेरह वर्ष की आयु में इलाहाबद जाकर जवाहर लाल नेहरू व टंडन जी द्वारा चलाये जा रहे राष्ट्रीय विद्यालय में प्रवेश लेने का निश्चय किया और घर पर अभिभावकों को बिना सूचित किये ही वो तत्कालीन मद्रास से इलाहाबाद आ गए और दो वर्ष तक अध्ययन किया। दरअसल उस समय चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलनों ने उनके ऊपर गहरा असर किया था और वो देशप्रेम की उत्कट भावना से ओत-प्रोत थे। अध्ययन पश्चात वो लौटकर वापस मद्रास आये जहां उन्होंने वर्ष 1926 में अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण की। मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में किसी बात को लेकर राममूर्ति जी का कॉलेज के तत्कालीन अंग्रेज प्राचार्य से विवाद हो गया। उन्होंने आगे के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। यहां पढ़ने के दौरान उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने का पूर्ण अवसर मिला जिसका उन्होंने पूरा उपभोग किया। साइमन कमीशन द्वारा विश्वविद्यालय दौरे के दौरान उन्होंने बड़े प्रभावपूर्ण तरीके से ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ आन्दोलन का नेतृत्व किया जिसके परिणामस्वरुप शीघ्र ही वे काफी प्रसिद्ध हो गए। 1930 में बीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात उन्हें ‘विदेशी वस्त्र जलाओ’ आन्दोलन में भाग लेने के कारण प्रथम बार केन्द्रीय कारागार में छः महीने के लिए डाल दिया गया और इस तरह से उनके जेल-जीवन की शुरुआत हुयी। इसके पश्चात उन्हें स्वतंत्रता पूर्व व पश्चात भी एक लम्बी अवधि जेल में गुजारनी पड़ी।

राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद-बनारस में

इलाहाबाद व बनारस में रहने के दौरान उनका परिचय राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े अनेक नेताओं से हुआ। 1930 के अंत में जेल से रिहा होने के पश्चात पीआर वापस मद्रास लौट आये और यहां आकर इन्होंने युवाओं को संगठित कर ‘लीग ऑफ़ यूथ’ नाम से एक संस्थान का निर्माण किया। तत्पश्चात दलितों को संगठित कर छुआछूत और ऐसी अन्य अनेक कुरीतियों के खिलाफ क्षेत्रीय आन्दोलन किया। बाद में कुछ समय के लिए उन्होंने हरिजन सेवा संघ में एक कार्यकर्ता के बतौर काम किया। चप्पल बनाने के काम में लगे दलितों को भी संगठित करने का प्रयास किया व वैष्णव सम्प्रदाय के सदस्य के रूप में दलितों को मान्यता प्रदान किये जाने और मद्रास में स्थित प्रसिद्ध पार्थ सारथी मंदिर के पदाधिकारियों के चयन के लिए दलितों को वोट देने के अधिकार दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। इस उद्देश्य से उन्होंने दलितों को संघठित किया, उन्हें श्लोकों का ज्ञान कराया और उन्हें वैष्णवों के रूप में अधिकार दिलाने में मदद की। इस कार्य में पीआर ने कुछ अधिवक्ताओं की मदद भी ली और अंत में दलितों को यह अधिकार दिलाने में सफलता प्राप्त की। बाल्यकाल से ही तमाम तरह के शोषक प्रथाओं के खिलाफ शुरू हुई लड़ने की प्रवृत्ति उनमें आजीवन बरकरार रही। वैष्णव मंदिर से जुड़े उनके आन्दोलन ने देशभर के लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। गांधीजी ने भी इसके समर्थन में लिखा। वर्ष 1930 के बाद पीआर ने मद्रास में स्वतंत्रता आन्दोलन से सम्बंधित सभी आन्दोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया व अपनी सांगठनिक क्षमता का भी बखूबी परिचय दिया। इस दौरान वे राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े सभी विचारधारा के कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में आये। एक जानकारी के अनुसार पीआर को मार्क्सवादी साहित्य से जुड़ी पहली पुस्तक तत्कालीन खुफिया विभाग के एक अधिकारी द्वारा मुहैय्या कराई गई थी, जिसने उन्हें अपनी समझ के हिसाब से तत्कालीन उग्रवादी आन्दोलन में हिस्सा न लेते हुए मार्क्सवादी साहित्य का उपयुक्त तरीके से अध्ययन करने के पश्चात भावी मार्ग तय करने का सुझाव दिया। इस समय तक राष्ट्रीय आन्दोलन में कुछ और भी धाराएं विकसित हो गयी थीं। वर्ष 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने अपनी गतिविधियां प्रारम्भ की और तभी से पीआर ने भी इनमें भाग लेना शुरू कर दिया। वर्ष 1936 से वे औपचारिक रूप से ट्रेड यूनियनों से जुड गए। वह और कामरेड सुंदरैय्या जो साम्यवादी आन्दोलन के प्रख्यात नेता रहे के साथ-साथ मीलों साइकिल से चलकर नेल्लोर से मद्रास के बीच बड़ी तादाद में मजदूरों को संगठित किया करते थे। इस उद्देश्य से उन्होंने वहां एक कर्मकार सुरक्षा लीग की स्थापना भी की। सबसे पहले उन्होंने नसवार कामगारों को संगठित किया क्योंकि उस वक़्त मद्रास में अनेक नसवार कारखाने थे। इसके बाद उन्होंने रिक्शा चालकों व ताड़ी निकलने वाले मजदूरों को संगठित किया। कालांतर में वे ट्राम व बिजली कर्मकारों के भी यूनियन से जुड़े। इन सभी यूनियनों में राममूर्ति जी पूर्ण रूप से संलग्न रहे। उन्होंने ताड़ी निकालने वाले मजदूरों की एक ऐतिहासिक हड़ताल का नेतृत्व किया। उस समय मद्रास  स्थित ट्रेड यूनियनों का कार्यालय हड़ताल कार्यालयों के नाम से मशहूर हो गया था। ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसे सरकार, पुलिस या कहीं और से कोई समस्या होती थी वह इस कार्यालय से सम्पर्क करता और कार्यालय भी उसका जितना हो सकता था मदद किया करता था।

कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य बने

कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस समाजवादी पार्टी से एक नेता के रूप में जुड़े होने के साथ-साथ पीआर ने 1936 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जो उस समय तक भूमिगत रूप से कार्य कर रही थी की भी सदस्यता ग्रहण कर ली थी। राममूर्ति जी पूरी मद्रास प्रेसीडेंसी, विशेष तौर पर तमिल भाषी क्षेत्र में मजदूरों के विभिन्न समूहों व वर्गों द्वारा किये गए सभी संघर्षों में सक्रिय भूमिका अदा किया करते थे। कोयम्बटूर व मदुरै के कपड़ा मजदूरों द्वारा की गयी हड़ताल को नेतृत्व प्रदान करने तथा जांच आयोगों व औद्योगिक अधिकरणों के सामने मजदूरों का कुशलतापूर्वक पक्ष रखने में जो भूमिका आपने निभायी उसका तमिलनाडु के ट्रेड यूनियन आन्दोलन के इतिहास में बहुत ही महत्व है। देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक लोगों के खिलाफ चलाये गए षड्यंत्र के मामले में एक बड़ा हिस्सा मद्रास का भी था। षड्यंत्र के मामले में फंसाए गए अन्य अनेक साम्यवादियों व ट्रेड यूनियन नेताओं में पीआर शायद सबसे पहले व्यक्ति थे, जो इस तरह के षड्यंत्र के शिकार बने। मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने अपने मुकदमे की पैरवी खुद की। अपने विरुद्ध लगे मामलों में खुद पैरवी करने व बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामलों में अन्य अनेक नेताओं की ओर से पैरवी करने का सिलसिला उन्होंने लगभग जीवन पर्यंत जारी रखा। जहां तक राजनीतिक और ट्रेड यूनियन आन्दोलन से जुड़े मामलों का सवाल है, इनसे सम्बन्धित अधिकतर मामलों के कानूनी पहलू की राममूर्ति जी को काफी अच्छी जानकारी थी।

एटक के राष्ट्रीय नेता बन गए

वर्ष 1940 आते-आते राममूर्ति एटक की राष्ट्रीय स्तर की कार्यकारिणी में शामिल हो गए तथा ‘एटक’ में सुधारवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ संघर्ष के 1969 में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचने तक इससे जुड़े रहे और अपने कुछ साथियों के साथ कार्यसमिति की सदस्यता छोड़ दी। मई 1970 में कलकत्ता में आयोजित ‘एटक’ के अधिवेशन में मजदूरों द्वारा आक्रामक वर्ग-सिद्धांतों के आधार पर ‘सीटू’ की स्थापना हुयी। इस स्थापना सम्मलेन में राममूर्ति सीटू के महासचिव चुने गए। महासचिव के रूप में उन्होंने 1983 तक सीटू के लिए कार्य किया तत्पश्चात उन्हें सीटू का अध्यक्ष चुना गया। सीटू को राष्ट्रीय स्तर के ट्रेड यूनियन संगठन के रूप में स्थापित कराने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने देश के कोने-कोने में जहां उन्हें सहायता व दिशा-निर्देश की आवश्यकता थी जाकर उनसे बातचीत की व उनकी समस्याओं को सुलझाने में मदद की।

मजदूर आंदोलन को नई ऊंचाई दी

मजदूरों से जुड़े विभिन्न मुद्दों की जानकारी व कर्तव्यकुशलता तथा अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं के साथ-साथ हिंदी व उर्दू भाषा में बातचीत करने की अपनी निपुणता का पूरा-पूरा इस्तेमाल उन्होंने मजदूर आन्दोलन को मजबूत करने व सीटू का विस्तार करने में किया तथा साम्यवादी आन्दोलन से जुड़े एक नेता के रूप में उनका ऊंचा कद भी इसमें सहायक सिद्ध हुआ। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में मजदूर समस्याओं से जुड़े लेख तैयार किये। साम्यवादी आन्दोलन में सुधारवादी प्रयासों के खिलाफ उनका किया गया संघर्ष ऐतिहासिक महत्व का है। उनका विवाह पार्टी से ही जुड़े एक परिवार की पुत्री अम्बाल जी के साथ हुया। अम्बाल जी की अन्य बहनों की शादी भी पार्टी नेताओं के साथ ही हुयी थी। उनका विवाह एक पंजीकृत विवाह था जिसमें कुछ पार्टी के साथी उपस्थित थे। शादी के पंजीकरण के पश्चात महान समाज सुधारक पेरियार जी की अध्यक्षता में एक स्वागत समारोह का आयोजन किया गया। आगे चलकर राममूर्ति जी दो पुत्रियों के पिता बने जिनका नाम उन्होंने तमिलनाडु की दो मशहूर नदियों के नाम पर पोन्नी व वेगायी रखा। उनकी बड़ी पुत्री डॉक्टर व छोटी वकील है।

संसद में भी गूंजी मजदूरों की आवाज 

राममूर्ति ने एक ट्रेड यूनियन में मजदूरों के नेतृत्व करने के अलावा विधान सभा व संसद में भी आम जनता का प्रतिनिधित्व किया। जेल में रहने के दौरान ही वर्ष 1952 में वह मद्रास विधान सभा के लिए चुन लिए गए। इसके पश्चात वे दो बार राज्य सभा तथा 1967-71 के दौरान लोकसभा के सदस्य के बतौर काम किया। 16 साल के अपने संसदीय कार्यकाल के दौरान उन्होंने देश के मजदूरों व जन सामान्य से जुड़े अनेक मुद्दे संसद में उठाये. उनकी किसी भी विषय पर बोलने की क्षमता और उन सभी मुद्दों पर वर्गीय पक्ष रखने के उनके कौशल के सभी लोग कायल थे। उन्होंने बहुत ही दक्षता के साथ मजदूर वर्ग, किसानों व सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को उठाया। तमिलनाडु के औद्योगिकीकरण, विशेषतः नेविवली लिग्नाइट जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के विकास में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों जिसमें आईएलओ भी शामिल है पर बहुत ही प्रभावपूर्ण तरीके से मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। अंतर्राष्ट्रीय एकता आन्दोलन को बढ़ावा देने में भी उनके योगदान की महती भूमिका है।

स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया

सन 1980 से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा व 1984 में इसी वजह से वो दिल्ली से मद्रास चले गए। इसके बाद अपने स्वास्थ्य की वजह से वो ज्यादा सक्रिय न रह सके। उनका अंतिम सार्वजनिक भाषण तमिलनाडु कपड़ा कर्मकार परिसंघ के गठन के मौके पर कोयम्बटूर में हुआ, जो कि उनके जीवन के आरम्भिक दौर में उनकी गतिविधियों का सबसे अधिक सक्रिय केंद्र था। वर्ष 1987 में वो तत्कालीन मद्रास में आयोजित डीवाईऍफ़आई के तीसरे राष्ट्रीय सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष बनाए गए। उन्होंने पूरे मनोयोग के साथ इसकी तैयारी भी शुरू की परन्तु उनके स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया और उन्हें इसी बीच अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। 15 दिसम्बर 1987 को जिस दिन यह सम्मेलन आरम्भ होना था, आगे की जिम्मेदारियां भावी पीढ़ी को सौंपते हुए इस दुनिया से उन्होंने विदा ले ली।

देश में स्वतंत्रता आन्दोलन, साम्यवादी आन्दोलन व विशेषकर मजदूर आन्दोलन के क्षेत्र में पी.आर. का योगदान अविस्मरणीय है।

 

 










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