प्रेम के बरगद पर नफरत की शाखाएं

कहां आ गए हम... , , बृहस्पतिवार , 20-04-2017


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स्तुति नारायण

आए दिन धर्म, जाति, क्षेत्र, रंग, वेशभूषा, भाषा आदि को आधार बनाकर लोगों का एक दूसरे से उलझने की खबरें जैसे दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही हैं देश में। लोगों में इन आधारों पर एक दूसरे के प्रति नफरत छलककर सड़कों पर निकलने लगी है। हर कोई एक दूसरे को घूर रहा है। आखों से धमका रहा है कि तू मेरा प्रिय नहीं हो सकता। क्योंकि तू मुझसे अलग दिखता है। तेरी दाढ़ी, तेरी टोपी, तेरी पगड़ी, तेरा रंग, तेरी भाषा तेरा कुछ भी मेरे जैसा नहीं है। मैं तुझे मार डालूंगा।

हर किसी के भीतर एक जानवर

हर किसी के अंदर ये जानवर हुआ ही करता है। मदमस्त, बददिमाग सा विनाश का दूत। पर हमने तो उसे सुला दिया था गहरी नींद में, मीठी थपकियों से। क्योंकि हमारे बड़े बुजुर्गों ने समझाया था ये सूत्र कि जागने मत देना अपने अंदर कभी इस जानवर को। वरना एक ही झटके में घायल कर देगा ये उन समस्त उच्च भावों को जिसकी गोद में मानवता पलती है। और मानवता का खात्मा ही सृष्टि का अंत कर देगा। इसलिए मत जगने देना कभी उस जानवर को अपने भीतर। समय-समय पर जब कभी किसी में ये जानवर जागा, तो तबाही मची और हमारे विवेकशील पुरोधाओं ने उसे फिर से सुला देने की सलाह दी। नेतृत्व के इसी सूत्र पर सदियों से चलता आ रहा हमारा देश।

किसी का इंसान होना ही काफी

भारत एक महान देश है, विभिन्नता में एकता इसकी महानता है। विभिन्नता को समेटने के लिए जिस सहिष्णुता की जरूरत है। भारत के विशाल हृदय में व्याप्त इस सहिष्णुता ने ही इसे भारत माता बना दिया। जब भी हम किसी विविधता को स्वीकारते हैं तो एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए सहिष्णुता का परिचय देते हैं। वो हमारे जैसा नहीं है पर हमें प्रिय है। विविधताओं विपरीतताओं के बीच उसका इंसान भर होना हमें समानता का एहसास करा जाता है।
हम समस्त विभिन्नताओं के साथ एक सूत्र में बंध जाते हैं और इंसानियत की ये भावनात्मक उछाल महानता के दर्जे तक ले जाता है हमें।

सिर्फ खुद से प्यार एक तरह की बीमारी

इस महान भारत माता के प्रति अगाध भक्ति भी एक तरह से उसी इंसानियत की पूजा है जो सर्वोपरि है। हृदय की सर्वोच्च भावना है इंसानियत। वो उच्च भाव जिसमें कमी आते ही आप पतनोन्मुख हो जाते हैं। आपकी महानता नष्ट होने लगती है। आपको अपने से इतर इंसान अब प्रिय नहीं लगते। फिर आप उन्हें  रहन-सहन वेश-भूषा के आधार पर खुद से भिन्न मानने लगते हैं। फिर आपको सिर्फ अपनी और अपनी ही चीज प्रिय लगने लगती हैं। फिर किसी और की चीजें आपको फूटी आंख नहीं सुहातीं।

कहां थमेगा ये सिलसिला ?

पतन का ये क्रम अगर चलता ही रहे तो आप वहां पहुंच ही जाते हैं आखिर जहां हर भिन्नता को मिटाते हुए आप मानवता को तिरोहित कर देते हैं और फिर कुछ भी शेष नहीं बच पाता। विनाश की गहरी खाई में नफरत का परमाणु धमका। आह उस जानवर को सुला देने की सलाह की आवाज भी नहीं पहुंच पा रही तुम्हारे कानों तक। शायद खाल में लिपटे विनाश दूतों की गुर्राहट का शोर बहुत तेज है।











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