बलात्कारी संस्कृति की जड़ें कहां हैं ?

बेबाक , , मंगलवार , 11-06-2019


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डॉ. सिद्धार्थ

अलीगढ़ में मासूम बच्ची के साथ सामूहिक दरिंदगी की घटना ने बहुलांश लोगों को शर्मसार कर दिया। अलवर सामूहिक बलात्कार, कठुआ के जघन्य कांड और अन्य अनेक घटनाओं के बाद भी ऐसा हुआ था। इन घटनाओं से हर संवेदनशील व्यक्ति की आत्मा कांप उठी। ओह और आह के अलावा अधिकांश लोगों को कुछ सूझ ही नहीं रहा है। कुछ इसी तरह की स्थिति 16 दिसंबर 2012 में निर्भया बलात्कर कांड के समय भी हुई थी।

जब देश की राजधानी दिल्ली में, चलती बस में छः पुरुषों द्वारा 23 वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को मर्माहत और शर्मशार कर दिया था। बलात्कारियों ने वहशीपन और दरिन्दगी की सारी हदों को पार करते हुए छात्रा के जिस्म को लोहे के रॅाड से छलनी कर दिया और उसे अर्द्धनग्न अवस्था में मरने के लिए बस से बाहर फेंक दिया। दो सप्ताह तक मौत से संघर्ष करने के बाद इस छात्रा ने आखिरकार सिंगापुर के माउण्ट एलिजाबेथ अस्पताल में दम तोड़ दिया। सामूहिक बलात्कार की इस घटना से पैदा हुए दुःख, आक्रोश, गुस्से और प्रतिशोध की भावना की अभिव्यक्ति दिल्ली तथा देश के अन्य शहरों-कस्बों में विभिन्न रूपों में हुई थी। दिल्ली में तो जनाक्रोश इस कदर सड़कों पर उतर आया कि सरकार को स्थिति को सम्भालने के लिए तमाम तीन तिकड़मों और दमन का सहारा लेना पड़ा था। अन्य शहरों में भी लोग अपने गुस्से का इजहार करने के लिए सड़कों पर उतर आये थे। बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या यौन हिंसा का कोई अन्य रूप ऐसी घटनाएं हैं, जिसके खिलाफ सिद्धांतत: सभी लोग हैं, लेकिन कठुआ की घटना के बाद तो यह कहना पड़ा कि, बहुलांश लोग हैं।

सामूहिक बलात्कार से पैदा हुए जनाक्रोश ने निर्भया कांड के बाद एक बार फिर यौन हिंसा सहित महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कारणों तथा समाधान को भी जेरे-बहस ला दिया था, कुछ प्रदर्शनकारियों के प्लेकार्ड पर बलात्कारियों के लिए फाँसी की सजा की मांग लिखी हुई थी। साथ ही, महिलाओं की सुरक्षा की भी मांग की जा रही थी और मीडिया, राजनेता तथा दुःख-गुस्से से भरे लोगों का अधिकांश हिस्सा बलात्कार की समस्या का समाधान फांसी की सजा या अन्य कड़े कानूनों में देख रहा है। कुछ लोग पुलिस व्यवस्था को और मजबूत बनाने की माँग कर रहे थे। निर्भया कांड के बाद जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व में तीन सदस्यीय आयोग ने अनके उपाय सुझाये थे। कुछ के संदर्भ में कानून भी बना।

इस खैरलांजी, निर्भया या कठुआ जैसे जघन्य और दिल दहला देने वाली घटनाओं के बाद दुख, आक्रोश और वेदना की तात्कालिक अभिव्यक्ति के रूप में कठोर कानूनी उपाय और फांसी की सजा की मांग के मनोविज्ञान को तो समझा जा सकता है, लेकिन क्या यह वास्तव में कोई कारगर समाधान है? इसका उत्तर नहीं में ही दिया जा सकता है। सभी कानूनी उपाय असफल साबित हो रहे हैं। इस विषय के बहुत सारे गहन अध्येताओं का तो कहना है कि फांसी की सजा बलात्कारी को सबूत मिटाने के लिए पीड़िता की हत्या के लिए प्रेरित करता है। जरूरत है कि बलात्कारी संस्कृति की जमीन की तलाश की जाए और उसके भौतिक आधारों की भी पड़ताल की जाए। सारे दुःख, गुस्से, आक्रोश, प्रतिरोध की प्रभावी आवाजों के बीच बलात्कार तथा यौन हिंसा के वास्तविक कारणों-आधारों, उसके समूल नाश के उपायों तथा इसके लिए उपस्थित कार्यभारों के सम्बन्ध में गम्भीर चर्चा-संवाद किया जाए।

बलात्कार के सामाजिक संस्कृति और वैचारिक आधारों पर विचार करने से पहले बलात्कार क्या है तथा समाज में बलात्कार कहां-कहां किन रूपों में घटित होता है, इसका जायजा लेना आवश्यक है। बलात्कार किसी खास किस्म की यौन विकृति का परिणाम भर नहीं है बल्कि यह महिलाओं के खिलाफ समाज में जारी आम हिंसा का ही चरम रूप है। बलात्कार स्त्री के खिलाफ पुरुष की एक ऐसी आक्रामक एवं हिंसात्मक प्रतिशोध की कार्यवाही है, जिसमें वह स्त्री के शरीर, मन, संवेदना तथा चेतना अर्थात् उसके सम्पूर्ण अस्तित्व को मनमाने तरीके से रौंदता और लांक्षित करता है। जिसका प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न उद्देश्य एक मनुष्य के रूप में उसकी गरिमा एवं आत्मसम्मान को तार-तार कर देना, उसकी औकात बताना, उसे उसकी हद को तोड़ने के लिए दण्डित करना, और उसे भविष्य के लिए चेतावनी देना होता है।

बलात्कार तथा बलात्कारी मानसिकता के कारणों पर विचार करने से पहले बलात्कार सम्बन्धी कुछ बुनियादी तथ्यों पर निगाह डाल लेना आवश्यक है –

● भारत में प्रत्येक दिन 106 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। सिर्फ राजधानी दिल्ली में ही प्रतिदिन 6 लड़कियां बलात्कार का शिकार होती हैं।

● बलात्कार की शिकार महिलाओं में 94 प्रतिशत 2 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की मासूम बच्चियां हैं।

● दुधमुंही मासूम बच्ची से लेकर 70 साल की दादी-परदादी भी बलात्कार का शिकार होती हैं

● सामाजिक तबकों के आधार पर सर्वाधिक बलात्कार की शिकार आदिवासी, दलित तथा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलायें होती हैं।

● औसतन प्रत्येक दिन 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है।

● शिक्षण संस्थान, फैक्टरी, ऑफिस, अस्पताल जैसी जगहों से भी आये दिन बलात्कार की खबरें आती हैं।

● मन्दिर भी बलात्कार के मुख्य अड्डों में से एक हैं। पहले से ही यहां देवदासी के रूप में बलात्कार का परंपरागत रूप स्वीकृत रहा है।

अगर बलात्कारियों के अलग-अलग समूहों की सूची बनाई जाये तो बलात्कारियों के निम्न समूह सामने आते हैं–

● 94 प्रतिशत बलात्कारी सगे सम्बन्धियों- पिता, भाई, चाचा, मामा, मौसा, फूफा, जीजा, ममेरे, फुफेरे, चचेरे भाई, अन्य रिश्तेदार, पारिवारिक दोस्त तथा पड़ोसी हैं।

● बलात्कारियों की सूची में दूसरा सबसे बड़ा समुदाय पुलिस, सेना तथा अर्द्धसैनिक बलों का शामिल है।

● हमारे समाज में पुरुष प्रायः अपनी पत्नियों के साथ उनकी अनिच्छा के बावज़ूद और कभी-कभी तो विरोध के बावज़ूद शारारिक सम्बन्ध बनाते हैं जो कि सारतः बलात्कार ही है।

● बलात्कारियों का अन्य समुदाय जाति-धर्म के आधार पर बनता है। भारत में दलित स्त्रियों के साथ गैर दलितों द्वारा सामूहिक बलात्कार की घटनायें आये दिन अंजाम दी जाती हैं।

● सामूहिक बलात्कार का दूसरा शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय है। गुजरात दंगे के दौरान खुलेआम सड़क पर गर्भवती महिला के साथ बलात्कार तथा पेट फाड़ने की घटना ने सबको शर्मशार कर दिया था । यह अपवादस्वरूप घटने वाली घटना नहीं, यह हर साम्प्रदायिक दंगे की सच्चाई है। हाल ही में, हिन्दूवादियों का स्त्री-विरोधी होने का घिनौना चेहरा मुजफ्फरनगर दंगों में सामने आया जब गांव के ही लोग जिन्हें कल तक मुस्लिम स्त्रियां अपना चाचा, ताऊ, भाई, बेटा कहकर पुकारती थीं, उनके साथ सामूहिक बलात्कार करने में इन ताऊओं, चाचाओं, बेटों, भाईयों को कोई शर्म नहीं आयी। शर्म की जगह गर्व की अनुभूति हुई। वे आज भी गर्व से फूले घूम रहे हैं, कई तो सांसद भी बन गये।

● असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली मजदूर महिलाओं को आये दिन यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है लेकिन इसकी कोई सुनवाई तक नहीं होती।

● देश के पूर्वोत्तर राज्यों तथा कश्मीर की महिलाओं के साथ भारतीय पुलिस, अर्द्धसैनिक बल तथा सेना आये दिन महिलाओं की मर्यादा का उल्लंघन करती रहती है।

● नक्सल विरोधी– माओवाद विरोधी युद्ध के नाम पर पुलिस तथा अर्द्धसैनिक बलों के लोग आये दिन आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार तथा यौन हिंसा करते रहते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अर्ध सैनिक बलों द्वारा बस्तर में बलात्कार की घटनाओं की पुष्टि की है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि घर या बाहर कोई जगह ऐसी नहीं है जहां किसी भी उम्र की औरत अपने को पूर्ण सुरक्षित महसूस कर सके और न ही पुरुषों का कोई ऐसा समुदाय है जिससे स्त्री अपने को हिंसा की दृष्टि से पूर्णतः सुरक्षित समझे। फिर किसकी-किससे, कहां-कहां पुलिस, कानून से रक्षा की जा सकती है तथा किसको-किसको फांसी दी जाये। कानून और दंड, चंद अपराधियों के लिए होते हैं, जब समाज का बहुलांश हिस्सा ही किसी समुदाय के प्रति अपराधी मानसिकता रखता हो, तब क्या किया जाय? जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं, स्त्री के प्रति हिंसा का ही एक चरम रूप है बलात्कार। स्त्री के प्रति हिंसा को उसे दोयम दर्जे का मानने की मानसिकता से अलग करके नहीं देखना चाहिेए।

जहां तक लड़कियों को सुरक्षा प्रदान करने का प्रश्न है तो स्त्री की सुरक्षा को सबसे अधिक खतरा किससे और कहां है? सच तो यह है कि हमारे समाज में स्त्री मां के गर्भ में भी सुरक्षित नहीं है। 2018 में वित्तमंत्री द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वे में यह स्वीकार किया गया कि 6 करोड़ 30 लाख लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी गई और 2 करोड़ 10 लाख ऐसी लड़कियों ने जन्म लिया, जिन्हें जन्म देना उनके माता-पिता नहीं चाहते थे। पति के घर में दहेज हत्या की सम्भावना नयी-नवेली स्त्री को दहशत में रखती है। छेड़छाड़, छींटाकशी, यौन उत्पीड़न के अन्य रूप तो उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी के हिस्से हैं।

आधी आबादी के खिलाफ हिंसा और स्त्री के अस्तित्व को रौंदने वाली बलात्कार जैसी जघन्य घटनाओं को रोकने की आवश्यक शर्त यह है कि पहले इसके सामाजिक-सांस्कृतिक-वैचारिक कारणों की तलाश की जाये। बलत्कार की मानसिकता की तलाश की जाय। ऐसी गम्भीर सामाजिक सांस्कृतिक समस्या का, जिसकी जड़ें बहुत गहरी हों, कोई सरलीकृत एवं तात्कालिक समाधान कुछ होने या करने का आभास तो दे सकता है लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है। सच तो यह है कि रोक या समाधान की कौन कहे बलात्कार या सामूहिक बलात्कार की घटनाएं और बढ़ी ही हैं, साथ ही ज्यादा जघन्य होती जा रही हैं। अब तो बलात्कारियों के समर्थन में खुलेआम संगठित समूह और सत्ता खड़ी दिख रही है। हमारे देश में महिलायें मध्य-युगीन बर्बर मानसिकता और बाजार की खरीद-फरोख्त की मानसिकता का एक साथ शिकार हैं। दोनों जगह स्त्री भोग्या वस्तु है। घर में अभी भी वह दासी है जबकि बाहर उसका पण्यीकरण (कमोडिटीफिकेशन) जारी है।

भारत के विकलांग पूंजीवाद के अधकचरे विकास ने एक ऐसे समाज का निर्माण किया है जहां दस कदम की दूरी में इनमें से कोई एक पहलू प्रखर दिखाई देता है। यह एक ऐसा पूंजीवाद है, जिसने एक ओर तो तमाम सड़े-गले, पिछड़े और पितृसत्तात्मक मध्य-युगीन मूल्य-मान्यताओं को गोद ले लिया है, वहीं दूसरी ओर अन्तरराष्ट्रीय कार्पोरेट पूंजी और उसकी संस्कृति से गलबहियां डाल रहा है। यह स्थिति तब और बदतर हो गई जब हिंदुत्व की संस्कृति ने खुलेआम पूंजी की साम्राज्यवादी संस्कृति से पूरी तरह मेल कायम कर लिया। इस मेल ने पूरी स्थिति को और भी बदतर बना दिया। भारतीय सामन्ती पितृसत्तात्मक संस्कृति स्त्री को पुरुष की सम्पत्ति तथा भोगने की वस्तु मानती है, पुरुष जैसा चाहे अपनी स्त्री-रूपी सम्पत्ति का इस्तेमाल कर सकता है। सामन्ती समाज के संचालक पुरुषों का सबसे बड़ा पुरुषार्थ यह होता है कि वह अधिक से अधिक स्त्रियों का भोग करे। इसीलिए सामन्ती राजे-महाराजे और नवाब अपने यहां स्त्रियों का हरम बनाते थे या बहुपत्नी-प्रथा प्रभावी थी। यह प्रथा अब भी विभिन्न रूपों में सामने आती है। यह संस्कृति स्त्री को स्वतन्त्र तरीके से सोचने, निर्णय लेने तथा उस निर्णय के आधार पर जीवन जीने का अधिकार नहीं देती। एकनिष्ठता की मांग, वस्तुतः, सिर्फ स्त्री से की जाती है, पुरुष तो व्यभिचार तथा बलात्कार दोनों के लिए स्वतन्त्र है। भारत में आज भले ही सामन्ती भौतिक आधार कमजोर पड़ते दिखते हों, लेकिन सामन्ती संस्कृति, स्त्री तथा जाति व्यवस्था दोनों के सन्दर्भ में प्रभावी संस्कृति बनी हुई है।

स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान भले ही सामन्ती संस्कृति के खिलाफ आवाजें उठीं, लेकिन महिलाओं की समानता के पक्ष में उठने वाली सबसे प्रखर आवाज जोतिराव फुले, पेरियार और आंबेडकर की थी। इन आवाजों को अनसुना कर दिया गया। आजादी के बाद जो लोग सत्ता में आये उन्होंने संविधान में औरतों को समानता का अधिकार देने की घोषणा तो की, लेकिन उनकी हर संवैधानिक घोषणाओं की तरह इस पर भी कोई मजबूत अमली कदम नहीं उठाया और वास्तविक जीवन में कमोबेश स्त्री की स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। पूरे भारत के पैमाने पर देखा जाय तो सिर्फ उन्हीं इलाकों में औरतों की सामाजिक स्थिति में थोड़ा फर्क आया जहां जनवादी या सुधार आन्दोलन मजबूत था।

हिंदुत्व की संस्कृति न केवल स्त्री को भोग्या और पुरूष की पूर्ण अधीनता में रहने वाली वस्तु मानती है, उसके भगवान भी बलात्कार का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश हिंदुओं के ईश्वर हैं। इन तीनों ने एक साथ मिलकर ऋषि अत्रि की पत्नी सती अनुसूइया से बलात्कार किया। इस प्रसंग का जिक्र करते हुए डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि “ तीनों देव सती का शील-हरण करने अत्रि की कुटिया को ओर चल पड़े। इन तीनों ने ब्राह्मण भिक्षुओं का वेष धारण किया।……..इन तीनों ने कहा कि वे उसी स्थिति में उनके घर भोजन करेंगे, जब वह निर्वस्त्र होकर भोजन परोसे….”। हिंदुओं की त्रिमूर्ति में एक ब्रह्मा द्वारा अपनी पुत्री वाच के साथ बलात्कार की कहानी सभी जानते हैं।

देवताओं के राजा इन्द्र की बलात्कार की कहानियों का तो कोई अन्त ही नहीं है। वेदों से लेकर हिंदुओं के अन्य धर्मग्रंथ इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि शराब पीकर हत्या और बलात्कार करना इन्द्र का पेशा था। मनुस्मृति द्विजों,विशेषकर ब्राह्मणों को गैर द्विज स्त्रियों के साथ बलात्कार की इजाजत देती है। मनुस्मृति में जहां एक ओर शूद्र वर्ण के किसी व्यक्ति द्वारा ब्राह्मण की स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर शूद्र को प्राण दंड आदेश देती है।

अब्राह्मण: संग्रहणे प्राणान्तं दण्डमर्हति। चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमा: सदा।। (8.359)

वहीं यदि ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग की किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसे केवल पांच सौ पर्ण का आर्थिक दंड देना होगा।

अगुप्ते क्षत्रियावैश्ये शूद्रा वा ब्राह्मणो व्रजन् । शतानि पच्च दण्ड्य: स्यात्सहस्रं त्वन्त्ज्यस्त्रियम्।।(8.385 )

आधुनिक युग में हिदुत्व के सबसे बड़े सिद्धांतकार, पैरोकार और हिंदुत्ववादियों संघियों, भाजपाइयों और उनके आनुषांगिक संगठनों के आदर्श विनायक दामोदर सावरकर अपने विरोधी मुस्लमान समुदाय की महिलाओं के साथ बलात्कर को हिदुओं का एक आवश्यक कर्तव्य मानते हैं। उन्होंने अपनी किताब “सिक्स ग्लोरियस इकोज ऑफ इंडियन हिस्ट्री” में साफ-साफ व्याख्या किया है कि क्यों मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्करा जायज है। वे इतने पर ही नहीं रूकते हिंदुओं को ललकारते हुए कहते हैं कि “ यदि अवसर उपलब्ध हो तो ऐसा न करना नैतिक या वीरतापूर्ण काम नहीं है, बल्कि कायरता है”।

यहां सावरकर साफ-साफ सीख दे रहे हैं कि अवसर मिलने पर हिंदुओं को मुस्लिम महिलाओं के साथ जरूर बलात्कार करना चाहिए। यह उनका नैतिक धर्म है और एक वीरतापूर्ण कार्य है। इस तथाकथित नैतिकता और वीरता का परिचय हिंदुओं ने अनेक दंगों में दिया है। गुजरात और मुजफ्फरनगर के दंगे इसके सबसे ज्वलंत प्रमाण हैं। कठुआ की मासूम लड़की के साथ बलात्कार का हिंदूवादियों द्वारा समर्थन सावरकर के नक्शेकदम पर चलना ही है। भारतीय सामंती एवं हिदुत्वादी संस्कृति का मेल पश्चिम की पतनशील साम्राज्यवादी संस्कृति से हो गया है। साम्राज्यवादी संस्कृति भी, जो सारतः एक पतनशील पूंजीवादी संस्कृति ही है, स्त्री को माल या माल बेचने का माध्यम समझती है तथा उसके लिए स्त्री की देह मुनाफा कमाने की हवस का साधन है। इस संस्कृति की विशेषता है- आदमी के भीतर की बुनियादी आदिम-मूल प्रवृत्तियों को ऐसी दिशा देना जिससे वह एक ऐसे जानवर या नर पिशाच में तब्दील हो जाए जिसे इंसान-विरोधी कोई कुकृत्य करने में थोड़ी भी हिचक न हो।

यह संस्कृति मनुष्य की बुनियादी मूल प्रवृत्तियों को उभारकर उसे शैतानी दिशा देती है। मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में सबसे प्रबल प्रवृत्ति यौन-इच्छा या काम-भावना है। मनुष्यता के लम्बे समय के इतिहास में स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम जैसी उदात्त प्रवृत्ति का विकास इसी से हुआ। साम्राज्यवादी संस्कृति अपनी फिल्मों, टीवी-चैनलों, पोर्नोग्राफी तथा विज्ञापनों के माध्यम से यौन-इच्छा को प्रेम से अलग कर देता है। इसे इस तरह उभारती है कि यह कामपिपासु शैतान की इच्छा में बदल जाये। यह कामपिपासु शैतानों की रचना करती है, जिन्हें नन्हीं-सी बच्ची से लेकर दादी मां सरीखी स्त्री से भी बलात्कार करने में जरा-सी हिचक नहीं होती। यह संस्कृति स्त्री के प्राकृतिक सौन्दर्य तथा आकर्षण को माल बनाकर वस्तुएं बेचने के लिए इस्तेमाल करती है।

अपने विज्ञापनों में यह स्त्री को एक ऐसे माल में तब्दील कर देती है, जो यौन-इच्छा जगाने की जीती-जागती गुड़िया हो। जूता बेचना हो तो, गाड़ी बेचना हो तो, मकान बेचना हो तो, कपड़े बेचने हो तो, सबसे पहले विज्ञापन में एक स्त्री आती है, वह यौन पिपासा जगाती है, फिर कहती है कि यदि इस यौन पिपासा को शान्त करना चाहते हो तो इस वस्तु को खरीद लो। स्वयं स्त्री को विज्ञापनों में ऐसे पेश किया जाता है, ऐसे बताया जाता है कि तुम जितनी अधिक यौन-इच्छा को जगा सकती हो, उतनी ही तुम्हारी उपयोगिता है, नहीं तो तुम व्यर्थ और बेकार हो, तुम्हारा कोई मूल्य नहीं है। इस संस्कृति के लिए स्त्री यौन-इच्छा को जगाने वाली वस्तु है। साम्राज्यवादी मीडिया, फिल्में, अखबार, पत्र-पत्रिकायें, इण्टरनेट ऐसी काल्पनिक स्त्री की तस्वीर पेश करते हैं जो हर हालत में हर पुरुष को मिलनी ही चाहिए। जबकि वास्तविक जीवन में अधिकांश भारतीय पुरुषों को ऐसी स्त्री की झलक भी नहीं मिलती।

उसके जीवन में उपस्थित स्त्री बाजार द्वारा प्रत्यारोपित स्त्री से कोई मेल नहीं है। स्त्री को लोभ की वस्तु समझने वाला भारतीय पुरुष का पितृसत्तात्मक मन रात-दिन उसे पाने-भोगने के लिए बेचैन रहता है। इसके अलावा एक पक्ष यह भी है कि पूंजी की गति, महिलाओं की आजादी एवं आत्मनिर्भरता की आकांक्षा और रोजी-रोटी की जरूरतें आज अधिक से अधिक संख्या में औरतों को घर से बाहर निकलने और बाजार में मर्दों से होड़ करने को बाध्य कर रही है और इस तरह वह अनजाने ही उपरोक्त पुरुष-मानसिकता को चुनौती देती और उसका शिकार बनती है। सड़क-चौराहों से लेकर संसद के गलियारों तक में ऐसे अपेक्षाकृत स्वतन्त्र महिलाओं पर फब्तियाँ कसने वाले मिल जायेंगे। दो पतनशील संस्कृतियों के मेल ने हमारे देश में एक ऐसी स्त्री-विरोधी संस्कृति का निर्माण किया है जिसमें स्त्री की स्वतन्त्रता, बराबरी, गरिमा तथा आत्मसम्मान के लिए कोई स्थान नहीं है। सामन्ती और साम्राज्यवादी-पूंजीवादी दोनों संस्कृतियां स्त्री को अलग-अलग तरीके से भोगने की वस्तु समझती हैं। साथ ही, वे स्त्री पर पुरुष के हर प्रकार के वर्चस्व को जायज ठहराती हैं। स्त्रियों के प्रति बलात्कार तथा यौन उत्पीड़न के अन्य रूप इसी वर्चस्वशाली संस्कृति तथा विचारधारा के परिणाम हैं।

स्त्री-विरोधी विचारधारा तथा संस्कृति को जड़ से उखाड़े बिना महिलाओं को यौन हिंसा के विभिन्न रूपों से मुक्ति मिलना सम्भव नहीं है। केवल संस्कृति और विचारधारा के खिलाफ संघर्ष चला करके ही हम यह काम कर सकते हैं? हम सभी जानते हैं कि कोई भी समुदाय या व्यक्ति जीवन के विभिन्न रूपों में वास्तविक समता उसी हद तक हासिल कर सकता है, अपने अधिकारों का व्यवहारिक तौर पर उतना ही उपयोग कर सकता है, जितनी उसकी भौतिक जमीन उसे इजाजत देती है। भौतिक जमीन का अर्थ है कि देश के संसाधनों और निर्णय केंद्रों में उसकी कितनी हिस्सेदारी है। भारतीय समाज में महिलाएं एक ऐसा समुदाय हैं, जो करीब-करीब संपत्ततिहीन है, राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व अत्यन्त कम है। सामाजिक जीवन में भी वह निर्णायक हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं हैं।

अधिकांश महिलाएं आज भी घर की चारदीवारी में कैद हैं, चाहे या अनचाहे। सकल घरेलू उत्पाद में भले ही कृषि की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत तक सीमित हो गई हो, लेकिन देश की 63 प्रतिशत आबादी इसी पर निर्भर है। खेती योग्य जमीन का मालिकाना महिलाओं के पास नहीं के बराबर है। हाँ, उनका एक हिस्सा भूमिहीन मजदूर के रूप में खेतों में काम करता है, जिसमें ज्यादातर दलित महिलाएं हैं। भारत की कुल संपत्ति के 63 प्रतिशत हिस्से पर जिन 1 प्रतिशत लोगों का नियंत्रण कायम हुआ। उसमें महिलाओं की संख्या नगण्य है। 90 प्रतिशत संपत्ति के मालिक ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों में वास्तविक मालिकाना रखने वाली महिलाएं बहुत कम हैं। बिलिनियरों की सूची में कोई महिला नहीं है। संपत्ति के मालिकाने के जिन रूपों में महिलाओं का नाम दर्ज है, वहां भी अधिकांश महिलाएं उसकी वास्तविक मालकिन नहीं हैं, उसके वास्तविक मालिक उनके पति हैं। जहां तक महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधत्व का प्रश्न है, भारत की स्थिति सबसे बदतर है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और सऊदी अरब की स्थिति भी इससे बेहतर है।

भारत में 542 लोकसभा सांसदों में केवल 64 महिलाएं हैं यानी 11.8 प्रतिशत। जबकि अफगानिस्तान में 27.7 प्रतिशत, पाकिस्तान में 20.6 प्रतिशत और सऊदी अरब में 19.9 प्रतिशत है। जो महिलाएं सांसद या विधान सभाओं में हैं, उनमें से भी बहुत कम महिलाओं के पक्ष में खड़ी होती हैं। कठुआ और उन्नाव के मामले में सत्ताधारी पार्टी की सभी महिलाएं चुप्पी साधे हुई थीं। दुनिया भर में यह स्थापित मान्यता है कि महिलाओं की मुक्ति के प्रश्न के संदर्भ में दो तथ्य सबसे निर्णायक हैं। पहला यह कि सार्वजनिक उत्पादन यानी सार्वजनिक श्रम में उनकी हिस्सेदारी कितनी है और घरेलू श्रम का किस हद तक सार्वजनीकरण हुआ है। इस संदर्भ में भारतीय महिलाओं की स्थिति अत्यन्त कमजोर है। तथ्यों से अपरिचित किसी व्यक्ति को इस बात पर आश्चर्य हो सकता है कि वैश्वीकरण के बाद महिलाएं घरों में और सिमटी हैं।

1993-194 में 29 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं और 42 प्रतिशत शहरी महिलाएं खरेलू कामों में लगी हुई थीं। 2011-12 में यह प्रतिशत बढ़कर 35.3 और 46.1 हो गया। स्वाभाविक है कि जब महिलाएं घरों में सिमटी हैं, तो सार्वजनिक उत्पादन और श्रम में उनकी हिस्सेदारी गिरी है। 1999-2000 में सार्वजनिक उत्पादन और श्रम में महिलाओं की हिस्सेदारी 34.1 प्रतिशत थी, जो 2011-12 में गिरकर 27.2 प्रतिशत हो गई यानी करीब 7 प्रतिशत की गिरावट। बलात्कारी संस्कृति को पोषित करने वाली मध्ययुगीन बर्बर हिदुत्ववादी संस्कृति और पतनशील साम्राज्यवादी संस्कृति के विनाश के बिना बलात्कारी संस्कृति से मुक्ति पाना संभव नहीं लगता। साथ ही महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में बराबर की हिस्सेदारी और अधिकार प्रदान करने होंगे।

(लेखक डॉ. सिद्धार्थ फारवर्ड प्रेस में संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दिए गए विचार लेखक के निजी हैं।)








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