जब शरद पवार ने किया फैमिली प्लानिंग का फैसला

शख़्सियत , नई दिल्ली, सोमवार , 17-07-2017


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली। पुत्रमोह का रोग बड़ा भयंकर होता है। हर आम और खास को यह रोग कभी न कभी अपनी चपेट में लेता है। अमीर और दौलतमंद हैं तो उन्हें अपनी विरासत संभालने के लिए पुत्र के रूप में एक उत्तराधिकारी की जरूरत होती है। गरीब है तो उसे वृद्धावस्था में सहारे के लिए पुत्र चाहिए। यह चलन भारत जैसे देश में ही नहीं है, बल्कि विश्व के ज्यादातर देशों में पुत्र ही प्रथम उत्तराधिकारी होता है। पुत्री न तो विरासत संभालने के काबिल मानी जाती है और न ही वास्तविक उत्तराधिकारी। 

राजनीति में भी यह चलन आम है कि राजनेता पुत्र को ही अपनी राजनीतिक विरासत सौंपता है, चाहे पुत्री कितनी ही काबिल क्यों न हो। राहुल गांधी और प्रियंका इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने अपनी एकलौती बेटी सुप्रिया के जन्म के कुछ महीनों बाद ही नसबंदी करा ली थी। इसका सीधा कारण परिवार नियोजन था। 

शरद पवार और सुप्रिया सुले।

सुप्रिया अब 48 वर्ष और बच्चों की मां बन चुकी हैं। महाराष्ट्र के बारामती संसदीय क्षेत्र से सांसद निर्वाचित होकर सुप्रिया ने साबित कर दिया कि बेटियां भी पिता की विरासत को संभाल सकती हैं। 

 शरद पवार और प्रतिभा पवार के जीवन में 1969 में हर्षातिरेक का एक और क्षण आया। जब जून माह में उनकी बिटिया सुप्रिया का जन्म हुआ। दोनों दिनों दिन बच्ची का हंसना, रोना, ठुमकना, मचलना देखते और उन्हें अपनी दुनिया सतरंगी नजर आती। आनंद के उस समय में भी शरद अपने सिद्धांतों से दूर नहीं रहते। उन्होंने पत्नी से सलाह की और दोनों ने मिलकर यह तय किया कि वे एक ही बच्चे को अपना संपूर्ण परिवार समझेंगे। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि उनके कोई लड़का नहीं है। शरद ने सोचा कि मैं जनता के बीच हमेशा परिवार नियोजन की सीख देता हूं, लोगों को जनसंख्या विस्फोट की समस्या से परिचित कराता हूं, तो परिवार कल्याण व नियोजन का कार्यान्वयन मुझसे ही आरम्भ होना चाहिए। लिहाजा पत्नी की सहमति के साथ उन्होंने अपनी शल्यक्रिया करवा ली। 

शरद पवार पर लिखी गयी किताब।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के जीवन पर आधारित पुस्तक ''स्वयंसिद्ध'' में इस घटना का जिक्र है। यह शरद पवार की आधिकारिक जीवनी है। जीवनी लिखने वाले डीपी त्रिपाठी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा सदस्य हैं। त्रिपाठी कहते हैं कि, ''इस तथ्य से उत्तर भारत, विशेषकर, उत्तर प्रदेश के नेताओं को कुछ शिक्षा लेनी चाहिए जो परिवार नियोजन को सिर्फ पराए परिवारों की जिम्मेदारी समझते हैं। उनके अपने निजी परिवार में बच्चों की लम्बी लाइन होती है। शरद पवार निजी स्तर पर भी उतने ही लिबरेटेड व्यक्ति हैं जितने सार्वजनिक स्तर पर। उनकी पत्नी भी इसी तरह सोचती हैं कि नेताओं की कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए।''

स्वयंसिद्ध पुस्तक के लेखक के रूप में डीपी त्रिपाठी जब शरद पवार की पत्नी प्रतिभा पवार से पूछते हैं कि, ''आपको शरद जी की कौन सी बात सबसे पसंद है?,

प्रतिभा कहती हैं कि ''ये कभी अपना कमिटमेंट नहीं तोड़ते। निन्यानवे प्वाइंट नौ प्रतिशत पालन करते हैं। अगर कहा है तो आएंगे चाहे आधी रात में आएं,पहुंचते जरूर हैं।''  दरअसल, शरद पवार भी नहीं चाहते कि जनता उनकों कथनी और करनी में अंतर करने वाला नेता कहे। वो अपनी पहचान जो कहा सो किया वाला बनाना चाहते थे। इसमें वह काफी हद तक सफल हुए। फिलहाल 'स्वयंसिद्ध' पुस्तक तो यही दावा करती है। 










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