बाड़े में लोकतंत्र!

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 31-05-2019


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भूपेश पंत

ये उस राज्य की कहानी है जहां माना जाता है कि आज से सदियों पहले लोकतंत्र स्थापित हो चुका था। लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के शुरूआती दौर में इस राज्य में चुनाव कराने का तरीका भी बड़ा विचित्र था। आप इस तरीके की भले ही कितनी भी आलोचना कर लो लेकिन इसका मूल तत्व आज भी दुनिया के बड़े बड़े लोकतंत्रों में विद्यमान है। कहानी बताती है कि इस राज्य के लोग मूलत: पशुपालक थे और आमतौर पर जनता भेड़ें ही पालती थी। लिहाज़ा अलग अलग गांवों और कस्बों में एक एक दिन तय किया जाता जब सारे लोग अपनी अपनी भेड़ों को एक बड़े मैदान में इकट्ठा कर देते। मैदान के एक सिरे पर भेड़ें होतीं और दूसरे सिरे पर सभी उम्मीदवार। पहले ये सभी एक एक कर भेड़ों को अपनी अपनी क्षमता के मुताबिक ललचाते और फिर उन्हें छोड़ दिया जाता। गांव के लोगों के जिम्मे बस एक ही काम होता। कुछ लोग भेड़ों को किसी खास उम्मीदवार की ओर जाने को प्रेरित करते तो कुछ उन्हें आवाज़ लगा कर विरोधी के पास जाने से रोकते। राज्य में पक्ष और विपक्ष इस तरह लोकतंत्र को मज़बूती दे रहा था।

राज्य के लोग केवल पक्ष विपक्ष में ही नहीं बँटे थे। चुनाव में जो लोग पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाते या होना नहीं चाहते वो चुनावी मैदान में घटित हो रही इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आँखों देखा हाल एक दूसरे को सुनाते। ये लोग कभी कभी भावनाओं में इतना बह जाते कि अपनी असलियत के कपड़े खोल कर एक दूसरे पर ही टूट पड़ते। उधर जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा भेड़ें अपने पाले में करने में कामयाबी मिलती उसे जीता घोषित कर दिया जाता। इसके बाद पूरा गाँव या कस्बा जीते हुए उम्मीदवार की पार्टी में उसी भेड़ का स्वादिष्ट मांस उधेड़ उधेड़ कर खाता जो सबसे पहले उस विजयी उम्मीदवार की ओर लपकी थी। राज्य के लोग उस दौर में कभी ये नहीं समझ पाये होंगे कि वही अपने तौर के पहले और असली समाजवादी हैं।

गांव और कस्बों से जीते हुए सभी उम्मीदवार सभासद कहलाते और अपना एक मुखिया चुनते। इसको पूरे राज्य का सम्राट घोषित किया जाता। जो इस चुनाव से सहमत नहीं होते वो अपनी पसंद का एक विरोधी सम्राट चुन लेते। वैसे तो इनका प्रमुख काम सम्राट के हर काम में टोकाटाकी करना होता। लेकिन कोई बड़ा मुद्दा सामने आने पर सम्राट उनकी हर बात संजीदगी से सुनता और रात में दोनों राजमहल के गोपनीय कक्ष में खाने के दौरान सारा मसला सुलझा लेते। बस एक भेड़ को राज्य हित में उस दिन अपने स्वार्थ की बलि देनी पड़ती। जनता को अकसर मुद्दों की जानकारी न होने से वो भी उन्हें हल हुआ मान लेती। वैसे भी जनता अपनी भेड़ों को ज़्यादा तनाव नहीं देना चाहती थी। लोकतंत्र अपनी गति से परवान चढ़ रहा था।

इस तरह धीरे धीरे राज्य की जनता को चुनाव लड़ने और उसमें जीतने का महत्व समझ में आने लगा। उन्होंने जब सभासदों की झोपड़ियों को पक्के मकानों में तब्दील होते देखा तो हैरान रह गये। जो जीत का इसी तरह आनंद लेना चाहते थे वो भेड़ों को हरी हरी घास खिलाने लगे। जो लड़ना नहीं चाहते थे वो अपनी भेड़ों को घास खिलाने वालों से कीमत वसूलने लगे। ज़ोर जबर्दस्ती के चलते चुनाव में धन बल और बाहुबल लोकप्रिय होने लगा। उधर सम्राट और सभासदों की दावतों के चक्कर में राज्य की भेड़ें भी कम होती जा रही थीं। जो बच गयी थीं वो राजसी मसालों में भुनने से पहले तक मौज में थीं। आम लोग अपनी भेड़ें गिन गिन कर मौज में थे। राज्य उन दिनों मानो सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय के मनोहारी काल के मजे लूट रहा था।

धीरे धीरे ये भी लोगों की समझ में आने लगा कि लड़ाई जीतने के लिये होती है और उसके बाद मिलने वाली अपार सुविधाएं भी उन्हीं के कर चुकाने से संभव हैं। इससे जनता के एक तबके में इस बात की जागरूकता भी आयी कि दरअसल भेड़ों को एक दिशा में हाँकने की कीमत उन्हें कम मिल रही है। जागरूकता ने भेड़ों की कीमत बढ़ा दी थी। लोगों को अलग अलग गुटों में बांट कर भेड़ों की संख्या अपने पक्ष में करने की होड़ शुरू हो गयी। यहां तक कि भेड़ की खाल पहने इंसान भी अकसर चुनाव में हिस्सा लेते पाये जाने लगे। धीरे धीरे ये परंपरा में तब्दील हो गया। सम्राट ने अपना फ़ायदा देखते हुए चुनाव में ऐसी इंसानी भेड़ों को शामिल करने की इजाज़त दे दी। विरोधी सम्राट ने भी इस फायदे में चुपचाप खुद को शामिल कर लिया। लोकतंत्र की यही तो खूबसूरती है जो शासकों और शासितों में नफ़ा-नुक़सान को बराबर बांट देती है। सम्राटों का नफ़ा एक तरफ़, भेड़ों का नुक़सान दूसरी तरफ़।

राज्य में कई सम्राट आये और गये लेकिन भेड़ों की लगन की बदौलत लोकतंत्र का परचम शान से लहराने लगा था। इंसानी भेड़ों के साथ साथ भेड़ों की तादाद भी कई गुटों में बँट गयी। लोग अपनी अपनी भेड़ों की पहचान स्पष्ट करने के लिये उन्हें अलग अलग रंगों और निशानों से दाग़ने लगे। जहाँ तक मेरी समझ कहती है तकरीबन उसी दौर में इंसानी भेड़ों को भी दाग़ने का सिलसिला शुरू किया गया। जिन भेड़ों ने दग़ने से इंकार किया होगा उन्हें ज़रूर सत्ता की बलिवेदी पर ज़िबह कर दिया गया होगा। मेरा मानना है कि दुनिया भर में मज़बूत लोकतंत्र की बुनियाद आज भी इन्हीं भेड़ों के दोहरे सींगों पर खड़ी है।

बहरहाल समय के साथ साथ उस राज्य के लोकतंत्र ने भेड़ों और इंसानी भेड़ों की मिलीभगत से कई उतार चढ़ाव देखे। एक बार तो सम्राट ने खुद को लोकतंत्र का सच्चा हितैषी घोषित करते हुए सारी भेड़ें अपने बाड़े में भर लीं। भेड़ों की इस भीड़ की आपसी जंग में कई भेड़ें हलाक हुई तो कई चोटिल। ज्यादातर इंसानी भेड़ों का व्यवहार हालात और समय को देखते हुए बचाव अनुकूल रहा। इसलिये वो कुछ कम मारे गये। विरोधी सम्राट ने बची खुची भेड़ों को बहला कर अपने बाड़े में पहुँचा दिया। लेकिन भेड़ें ज़्यादा समय तक वहाँ भी टिक नहीं पायीं। वो मौका पा कर अपने पुराने बाड़े की ओर रफूचक्कर हो लीं।

कहानी अब और आगे बढ़ती है। लोकतंत्र का सम्राट बनने के लिये कई खांचों में बंटे राज्य की भेड़ों को अब हाँकना मुश्किल होने लगा था। भेड़ों की तादाद कम हो चुकी थी और इंसानी भेड़ों की ज़्यादा। चुनाव में दोनों को साधने के लिये अलग अलग चारे की ज़रूरत होती। इंसानी भेड़ें आसानी से पट जातीं जबकि भेड़ों को मनाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती। उनके पास अब देने को ऊन भी नहीं बचा था। उधर इंसानी भेड़ों के पास खून तो था बचा हुआ। चुनाव से पहले सम्राट को अचानक विचार आया कि सभी तरह की भेड़ों को एक ओर तभी हांका जा सकता है जबकि उन्हें किसी सामूहिक खतरे से डराया जाए।

ऊन पर खून को तरजीह देते हुए सम्राट ने अपने नज़दीकी सिपहसालार को नयी चाल की जानकारी दी। कुछ समय बाद ही जहां तहां भेड़ें मरने लगीं और पूरे राज्य में अनदेखे भेड़िये का आतंक छा गया। घबरा कर सारी शेष भेड़ें अपने इंसानी रूपों के साथ दौड़ कर सुरक्षा के लिये सम्राट के बाड़े में जा घुसीं। सुना है कि जीत के बाद दावतों में बाकी बची सारी भेड़ें उड़ाने के बाद राज्य के सम्राट ने पुरानी परंपरा का वास्ता देकर इंसानी भेड़ों के भी चुनाव में भाग लेने पर रोक लगा दी। कहा जाता है कि उसी दौरान राज्य में लोकतंत्र की रक्षा और उसे मज़बूत करने में भेड़ों के योगदान को चिर स्थायी रखने के लिये भेड़ चाल शब्द ईजाद किया गया। सच है कि आज भी दुनिया का बड़े से बड़ा लोकतंत्र इस चाल की अहमियत को भूला नहीं है।

मैं इस कहानी को जब जब पढ़ता हूँ तो रोमांचित हो उठता हूँ कि कैसा रहा होगा लोकतंत्र की मज़बूती का वो सफ़र ! आगे जाकर कितना यशस्वी बना होगा वो राज्य! क्या भेड़ों के बिना ये सब मुमकिन हो पाया होगा? लेकिन समझ नहीं आता कि लोकतंत्र की ये कहानी पता नहीं गतांक से आगे क्यों नहीं बढ़ती? शेष अगले अंक में... लिख कर भी यहीं खत्म क्यों हो जाती है?

 (भूपेश पन्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

  








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