हुनर बड़ी चीज़ है, लेकिन...

हमारा समाज , , बृहस्पतिवार , 01-06-2017


skill-quality-talent-genius-bihar-education

उपेंद्र चौधरी

अपने आस-पास ऐसे अनेक लोग मिल जाते हैं, जिनकी शिक्षा मामूली होती है, मगर उनके कौशल ग़ैरमामूली होते हैं। हिन्दी के सबसे बड़े लेखक प्रेमचंद की शिक्षा भले ही बी.ए. वाली होमगर उनका अकादमिक रिकॉर्ड अच्छा नहीं था, गुजराती के महान लेखक पन्नालाल पटेल की शिक्षा चौथी तक हुई थी, ओड़िया भाषा के पिता कहे जाने वाले फ़कीरमोहन सेनापति की शिक्षा भी पाठशाला तक की ही थी, उर्दू के महान लेखक मंटो भी एंट्रेंस (तब के हाईस्कूल) परीक्षा में दो बार फ़ेल हो गये थे। साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार हासिल करने वाले एकमात्र भारतीय और बांग्लाभाषा ही नहीं बल्कि भारतीय चेतना के गुरुदेव कहे जाने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन करने ज़रूर गये, मगर बिना डिग्री हासिल किए ही वहां से स्वदेश वापस आ गए। अबतक की सबसे भव्य माने जाने वाली फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म के निर्माता निर्देशक और पटकथा लेखक के.आसिफ़ की पढ़ाई भी सिर्फ़ आठवीं तक ही हुई थी। कारोबोर के क्षेत्र में तो इस तरह की ख़ास बातें बड़ी आम बात हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

कामयाबी का मतलब इंजीनियर, डॉक्टर?

इस तरह की कहानियां दुनिया भर के अलावा हमारे-आपके आस-पास भी पसरी हुई हैं। फिर भी सवाल पैदा होता है कि जब भी दसवीं या बारहवीं का रिज़ल्ट आता है, हम नाकामी को लेकर बेचैन क्यों हो जाते हैं? हमें अपने आस-पास की इन कहानियों पर भरोसा क्यों नहीं होता? कामयाबी का मतलब इंजीनियर, डॉक्टर या फिर अफ़सर या सरकारी बाबू बनना ही होता है?
असल में अर्थशास्त्र किसी भी देश के समाज शास्त्र या राजनीति शास्त्र की तरह शिक्षा शास्त्र में भी लागू होता है। थोक के भाव में जब से इंजीनियर बनने लगे, तो पता चला कि इंजीनियरिंग की डिग्री पर लाखों रुपये खर्च करने वाले लाखों जोशीले इंजीनियरों को औसत रूप से दस से पंद्रह हज़ार रुपये प्रति माह पर खटना पड़ रहा है। हमारे आस-पास ऐसे ढेरों इंजीनियर्स मिल जाते हैं, जिन्हें प्रवेश परीक्षा में दो प्रतिशत मार्क्स तक नहीं मिले हों, लेकिन किसी प्राइवेट इंजीनियरिंग इंस्टिट्युट में इंजीनियरिंग की डिग्री उनका इंतज़ार कर रही थी। ऐसी ही हालत एमबीए वालों की है। अगर किसी का आका किसी कॉर्पोरेट में टॉप पोजिशन पर बैठा है, तो ये डिग्रियां इनके बड़े काम की हो जाती हैं। उनके आकाओं को नज़र अंदाज़ करके सिर्फ़ उनकी सफलताओं को देखने वाले जोशीले युवाओं के लिए ये लोग आदर्श बन जाते हैं, लेकिन व्यावहारिक ज़मीन पर वो, घर-घर में अपने हुनर के बल पर तीस-चालीस हज़ार प्रति माह कमाने वाले किसी निरक्षरप्लंबर के मुक़ाबले, हताश होते हैं। इसी तरह किसी रेहड़ी या ठेले लगाने वालों की आमदनी के मुक़ाबले किसी एमबीए किये हुए मैनेजर साहब की स्थिति भी बड़ी दयनीय होती है। उसकी वजह सिर्फ़ इतनी है कि उस निरक्षरमगर हुनरमंद प्लंबर के बरक्स उन इंजीनियरों का कौशल सही अर्थों में दो कौड़ी की होती है। लिहाज़ा चाम प्यारा नहीं, दाम प्याराकी व्यावहारिकता में इंजीनियर और मैनेजर साहब बेहद हास्यस्पद मगर दुखत स्थिति में जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं। इसमें दोष इन नौजवानों या उनके अभिभावकों का नहीं है,बल्कि शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा प्रणाली को आकार देने वाली चेतनाशून्य या दृष्टिकोणविहीन शासन व्यवस्था का है।

डॉक्टर साहब की स्थिति इसलिए अब भी सम्मानजनक बनी हुई है, इसका कारण यह नहीं है कि मेडिकल की फ़ैक्ट्री में बहुत ही कुशल मानव संसाधन पैदा किया रहा है। यहां के हालात भी कमोवेश वही हैं, जो बाक़ी पेशेवर क्षेत्रों के हैं। लेकिन उनकी मांग के बनिस्पत उनकी आपूर्ति बहुत ही कम है, इसलिए उनका बाज़ार अभी गर्म है और आगे भी कई सालों तक तपातप रहने की संभावना है।

पत्रकारिता का भ्रम

समाज को दशा-दिशा दिखाने वाली पत्रकारिता की हालत भी लगभग यही है। सोशल मीडिया पर सक्रिय उन लोगों की पैनी लेखनी से आप सहज अंदाज़ा लगा सकते हैं कि पत्रकार अच्छा लिखता है या पत्रकारिता से जिनका नाता-रिश्ता नहीं है, वो अच्छा लिख रहे हैं, संस्थाओं में कार्यरत पत्रकार अच्छा बोल रहे हैं या फिर संस्थाओं के बाहर समाज-सियासत पर पैनी नज़र रखने वाले लोग अच्छा बोल रहे हैं। चूंकि भारत में नौकरी महत्वपूर्ण है और यहां नौकरियां चमचमाती डिग्रियों से मिलती हैं या आकाओं की रहम-ओ-करम से ये डिग्रियां वरदान बन जाती हैं, इसलिए यह डिग्रियां चाहे, जहां से ली गयी हों, ज़रूरी है। इसलिए यहां पत्रकारिता कराने वाली संस्थायें इंजीनियरिंग, एमबीए या एमबीबीएस पैदा करने वाली इंस्टीट्युट्स जैसी ही फ़ैक्ट्रियां हैं। 
मेरा अपना अनुभव बतौर शिक्षक और पत्रकार का रहा है। दोनों ही जगह मैंने पाया है कि कौशल को लेकर मानव संसाधन बहुत ही कमज़ोर रहा है। नौकरियां आकाओं के बल पर ही मिलती रही है। जब पहली बार केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ाने गया और वहां महीना भर गुज़ारा, तो महीने भर में ही केन्द्रीय विद्यालय को लेकर बना आदर्श का भ्रम टूटकर बिखर गया। महीने भर से ज़्यादा वहां नहीं टिक पाया। शिक्षकों से पढ़ते हुए ही बड़ा हुआ था, आस-पास में समाज-रिश्तेदार में भी कई लोग शिक्षक थे। लेकिन पास-पड़ोस या जान पहचान में कोई भी पत्रकार नहीं था। अनेक शिक्षकों को शैतान के रूप में देखा-भोगा था, लेकिन पत्रकार तो सच बोलने वाला किसी देवता सरीखे मन में बैठा हुआ था। इस वजह से पत्रकारिता का भ्रम तो शिक्षा के भ्रम से कई गुना बड़ा था। लिहाज़ा उसे टूटने में भी लगभग दो दशक लगे। ऐसे कई भ्रम होते हैं, जो ताज़िंदगी टूटते ही नहीं। इस भ्रम का बना रहना शासन के लिए ज़रूरी होता है। कई बार तो शासन इस भ्रम को बनाये रखता है।
बिहार के शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी भी जब यह कहते हैं कि परीक्षा पद्धति कड़ी और ईमानदार हो गयी है, इसलिए बिहार बोर्ड का परिणाम शर्म की हद तक ख़राब आया है, तो यह भी हक़ीक़त से दूर ले जाकर एक भ्रम गढ़ने की कोशिश ही है। अशोक चौधरी जिस सरकार के मंत्री हैं, उसी सरकार में कई ऐसे अनपढ़, अनगढ़ मंत्री भी हैं, जिनके न संघर्ष का कोई अतीत है और न ही उनकी समझ बूझ को लेकर किसी तरह का उदार परसेप्शन है। कहीं से कोई डिग्री जुगाड़कर अपने आकाओं के दम पर अच्छी ख़ासी सैलरी पाने वाले एमबीए, इंजीनियर, शिक्षक, पत्रकार बनने की कहानी से अलग इन मंत्रियों की कहानी भी नहीं है। जहां के सियासी आदर्श या नेतृत्व की छवि ऐसी हो, वहां नई पीढ़ी की प्रेरणा किस तरह अंदर ही अंदर रच रही होगी, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। हमारी सियासत या उसका नेतृत्व जहां तक पहुंचा है, उस प्रेरणा के गढ़ने में उस सफ़र का भी कुछ न कुछ मतलब तो होगा ही।

बिहार में 12वीं बोर्ड का ख़राब रिज़ल्ट रहने पर गु्स्साए छात्रों का प्रदर्शन। फोटो साभार : गूगल

बिहार में शिक्षा 

बिहार में शिक्षा को लेकर दो तरह की विडंबनात्मक स्थितियां हैं; एक तरफ़ जो लोग वर्ष 2000 के पहले शिक्षक बने हैं, उनकी सैलरी एक अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए सहज आर्थिक स्थिति बनाती है, वहीं 2000 के बाद बनने वाले शिक्षकों की हालत एक बड़ी संख्या में रोज़गारशुदा लोगों के मुक़ाबले ख़स्ता तो नहीं है, लेकिन सैलरी के लिहाज़ से वो पहले भर्ती हुए शिक्षकों के मुक़ाबले बेहद विषम स्थिति का सामना कर रहे हैं। साथ-साथ और कमोवेश एक तरह के कौशल वाले इन शिक्षकों में समान काम के लिए समान वेतनका क़ानूनी और संवैधानिक प्रावधान नहीं है। जब कभी बिहार में इसे लेकर कोई आंदोलन हुआ है, तो इस आंदोलन की गर्मी को न तो मीडिया ने बाक़ियों तक महसूस कराया है और न ही इसकी तपिश बिहार सरकार तक पहुंची है। अंदाज़ा लगाइये कि समान कार्यों के लिए असमान वेतन पाने वालों के बीच कितना मानसिक संघर्ष होता होगा। सवाल है कि क्या इस मानसिक संघर्ष का असर स्कूल के वातावरण या बच्चो दी जा रही शिक्षा पर नहीं पड़ रहा होगा ?

इस मुद्दे का दूसरा पहलू यह भी है कि दूसरी खेप में मित्र शिक्षकों के नाम पर जो भर्तियां हुई हैं, उनके पैमाने बड़े ही निराश करने वाले रहे हैं। डिग्रियों के फ़र्ज़ीवाड़े की कहानियों से तो अख़वार अटे पड़े रहे ही हैं, जिस तरह से भर्तियां हुई हैं, वह साफ़-साफ़ दिखाती हैं कि इनमें भी आकाओंऔर जुगाड़का बड़ा योगदान रहा था, जिनमें राज्य स्तर से लेकर ग्रामीण स्तर तक के नेताओं, नौकरशाह, मुखिया, पत्रकारों आदि जैसे रसूखदारों की भूमिका बहुत अहम रही है। कई बार तो अलग से दलालों ने भी काम किया है और कई बार रसूखदार ख़ुद ही दलालों के किरदारों में फिट होकर इसे अंजाम देते रहे हैं। इस कारण शिक्षकों के रूप में बिहार को जो मानवसंसाधन मिला, वह कौशल के हिसाब से बेहद कमज़ोर और हद दर्जे का मामूली था ।
बिहार के शिक्षकों को लेकर तरह-तरह की कथा-कहानियां सुनने को मिलती रहती हैं। एक साल पहले ही किसी ने बताया था कि एक स्थायी शिक्षक ऐसे हैं,जो किसी गांव के मिड्ल स्कूल में हेडमास्टर जी हैं, लेकिन उस गांव से लगभग 50 किलोमीटर दूर किसी छोटे शहर में रहते हैं, अपने स्कूल को महीने में एक बार देखने आ जाते हैं, चालीस-पचास हज़ार की सैलरी वो हर महीने कूटते हैं और शहर में रहते हुए वो अपना कारोबार देखते हैं। 
किसी ने मुझे एक ऐसी महिला मित्र शिक्षक की कहानी सुनायी थी, जिसके पति बिहार के बाहर किसी बड़े शहर में बड़े अफ़सर हैं और वो उन्हीं के साथ रहती हैं, मगर उनकी सैलरी बतौर मित्र शिक्षक बिहार सरकार द्वारा दी जाती रहती है। वो मज़े से अपने बच्चों को उस बड़े शहर में पढ़ाती हैं, मगर बच्चों की फ़ीस बिना काम किये हुए बिहार सरकार से मुफ़्त की सैलरी के रूप में जुटाती हैं।
बिहार के शिक्षकों को लेकर ऐसी एक-दो नहीं, बल्कि हज़ारों कहानियां हैं। मगर इन कहानियों में किसी बच्चे के भविष्य की चिंता आपको नहीं दिखायी पड़ेगी और न ही शिक्षा की दुर्गति पर कोई आंसू बहाता मिलेगा। इसकी वजह है। जिनके पास रसूख है, वो अपने बच्चें को सरकारी स्कूलों से बाहर निकाल लाते हैं और प्राइवेट स्कूलों के हवाले कर देते हैं। यह सच्चाई तो उन शिक्षकों की भी है, जो ख़ुद ही अपने बच्चों को उन सरकारी स्कूलों में नहीं डालते, जिनमें वो पढ़ाते हैं। उनकी यह सोच शिक्षा की मौजूदा स्थिति को पूरी तरह बयान कर देती है। बिहार बोर्ड के इस परीक्षा परिणाम का विश्लेषण जब प्राइवेट बनाम सरकारी स्कूलों के संदर्भ में होगा, तो व्याख्या और दिलचस्प हो जायेगी। 










Leave your comment