नाम बदलता रहा, गंदगी फैलती रही

स्वच्छता अभि. का सच , , बुधवार , 17-05-2017


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श्याम आनंद झा

ब्रह्मपुरा मनीगाछी, दरभंगा। जब महात्मा गांधी ने कहा कि अगर मुझे आजादी और सफाई में से एक को चुनना हो तो मैं सफाई को चुनूंगा, तो वह गुलामी को गुलाबी पैजामा पहनाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। सफाई गुलाम हिंदुस्तान के लिए कितना बड़ा मुद्दा था इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1817 से 1947 के बीच करीब चार करोड़ 30 लाख हिन्दुस्तानियों की मौत सिर्फ हैजा से हुई थी। सन 1896 में मुंबई में प्लेग का हमला हुआ। जिसमें 1900 प्रति सप्ताह के हिसाब से पूरे साल में करीब 100000 लोग काल कवलित हुए। सन 1900 में एक हजार में से तकरीबन 22 लोगों की मौत सिर्फ प्लेग से होती थी। 

महामारियों के बारे में अज्ञानता

अंग्रेजी हुकूमत का नजरिया पीड़ित हिन्दुस्तानियों को लेकर उपेक्षापूर्ण और इन महामारियों के बारे में अज्ञानता से भरा था। 1850 तक यूरोप और इंग्लैंड के सत्तासीन लोगों को लगता था कि हैजा जैसी महामारी हवा से फैलती है। भारत में तो अब तक इसे दैवीय प्रकोप माना जाता है। 

1880 में रॉबर्ट कोच के अनुसन्धान से कोई 30 साल पहले इतालवी वैज्ञानिक फिल्लिपो पाचिनी ने हैजा फैलाने वाले रोगाणुओं का पता लगा लिया था। 1880 के पहले तक माना जाता था कि हैजा की महामारी हवा से फैलती है। इस महामारी के फैलने की वजह मल से प्रदूषित जल है। इस बात को सत्यापित करने का श्रेय रॉबर्ट कोच को ही जाता है। भारत की आजादी तक हैजा के रोकथाम की वैज्ञानिक प्रविधियों का पता लग गया था। लेकिन हैजा का हमला हिंदुस्तान में 1964 तक होता रहा। 

राजीव गांधी सरकार की सफाई योजना 

समस्या के समाधान को लेकर सरकार का नजरिया शुरू से आलस्य भरा रहा है। 1986 में पहली बार राजीव गांधी की सरकार ने सफाई की जिम्मेदारी का संज्ञान लिया और सेंट्रल रूरल सैनिटेशन प्रोग्राम की शुरुआत हुई। 

इस योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों के लिए शौचालय बनाने का पूर्ण खर्च सरकार उठाती थी। लेकिन शौचालय की जरूरत क्यों है, या खुले में मल त्याग के नुकसान क्या हैं, की जानकारी देने वाले अनुषांगिक कार्यक्रम के अभाव में यह योजना बिना कोई उल्लेखनीय उपलब्धि के बंद हो गयी। 1998 में हुए सरकारी सर्वेक्षण में यह बात उभर कर आई कि शौचालय बनाने के लिए मिलने वाली अनुदान राशि लोगों को प्रेरणा देने के लिए काफी नहीं थी। 

वाजपेयी सरकार ने योजना का बदला नाम 

अटल बिहारी वाजपाई की सरकार ने 1999 में सेंट्रल रूरल सैनिटेशन प्रोग्राम का नाम बदलकर टोटल सैनिटेशन कैंपेन कर दिया। पहली बार भारत के नीति निर्माताओं ने स्वच्छता को विचार का मुद्दा बनाया। कैंपेन में इस बात पर बल दिया गया था कि पंचायतों को इस अभियान से जोड़ा जाय ताकि आम लोगों को यह पता चले कि खुले में शौच जाने से मानव मल से विनाशकारी रोगाणु खाने में पहुंचते हैं। जनसाधारण स्वयं से शौचालय बनाए, इस बात के प्रचार-प्रसार के लिए अलग से बजट का प्रावधान था। 

उपयुक्त स्वच्छता के अभाव में होने वाले नुकसान के बारे में 2006 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, हिंदुस्तान को करीब ढाई खरब रुपये का सालाना नुकसान होता है। मतलब प्रत्येक व्यक्ति को करीब 21 सौ 80 रुपये का सालाना व्यक्तिगत घाटा। 

गांव में या शहरों के मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी को अगर हम गौर से देखें तो इन अध्ययनों की सत्यता नजर आएगी। 800 परिवार वाले जिस गांव में बैठ कर यह रिपोर्ट लिखी जा रही है वहां दवा की 6 दुकानें हैं। हर दुकान से पेट की गड़बड़ी रोकने वाली दवा की बिक्री लाखों में है। 

मनमोहन सरकार का निर्मल भारत अभियान 

वाजपाई के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने टोटल सैनिटेशन कैंपेन का नाम बदल कर निर्मल भारत अभियान कर दिया। मनमोहन सिंह की सरकार ने एक कदम आगे बढ़ कर इसे एक स्वतंत्र मंत्रालय का दर्जा दिया। जिसे हम केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के नाम से जानते हैं।

स्वच्छता अभियान को जिस फोर्स के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लागू किया वह प्रशंसनीय है। सम्भव है कि वह देशव्यापी चुनाव अभियान के दरम्यान उन्होंने हिन्दुस्तानी गांवों और कस्बों में खुले में शौच जाने को विवश वृद्धों, महिलाओं और बीमारों को देखा हो। आज हिंदुस्तान में द्वितीय श्रेणी में आने वाला एक भी ऐसा शहर नहीं है जिसे साफ कहा जा सकता है। गांव तो वैसे ही उपेक्षित हैं। प्रधान मंत्री ने 2 अक्टूबर 2014 को गांधी जयंती के मौके पर हिंदुस्तान के गांवों और छोटे शहरों की सफाई की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने यह लक्ष्य रखा कि 2019 तक यह काम पूरा कर लिया जाएगा।

ढाई साल बाद आज स्वच्छ भारत अभियान कहां पहुंचा है इसका लेखा जोखा हम अगली खेप में देंगे।  

(जेएनयू के छात्र रहे श्याम आनंद झा सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। श्याम जी आजकल दरभंगा जिले में स्थित अपने गांव और उसके आस-पास सामाजिक कामों में सक्रिय हैं।)










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