भाजपा सांसद ने समलैंगिकों को सिविल अधिकार न देने को बताया शर्मनाक

बदलाव , नई दिल्ली , शनिवार , 22-07-2017


transzender-parliamentrycomitee-rameshbais-bjpmp

जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। भाजपा सांसद रमेश बैस की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने केंद्र सरकार के समलैंगिक अधिकार संबंधी बिल के प्रारूप की कड़ी आलोचना की है। संसदीय समिति ने कहा कि इस बिल में समलैंगिकों के नागरिक अधिकार मसलन, शादी,तलाक समेत कई अधिकारों का उल्लेख नहीं है। सरकार के प्रारूप में समलैंगिकों का आपस में शादी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अधीन दंडनीय अपराध है। रमेश बैस रायपुर से लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे सात बार से लोकसभा के लिए चुने जा रहे हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति में रमेश बैस अध्यक्ष और विभिन्न राजनीतिक दलों के 31 सांसद सदस्य हैं। समिति द्वारा पेश रिपोर्ट ट्रांसजेंडर लोगों के लिए नागरिक अधिकार को मान्यता देने वाला पहला सरकारी दस्तावेज बन गया है।

समलैंगिक अधिकारों का विरोध करती है भाजपा

भाजपा समलैंगिक को ऐसे अधिकार देने का सिद्धांतत: विरोध करती रही है। समलैंगिक संबंधों को वह देश की परंपरा और संस्कृति का विरोधी मानती है। लेकिन भाजपा सांसद की अध्यक्षता वाली समिति ने इसको मान्यता देकर साहसिक कार्य किया है। सांसदों की 31 सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट समलैंगिक व्यक्तियों का (अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2016 सर्वसम्मति से पारित कर शुक्रवार को लोकसभा के पटल पर रखा लोकसभा। यह विधेयक अगस्त 2016 में लोकसभा में पेश किया गया था।

समिति ने कहा विधेयक के मसौदे में खामी  

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता संबंधी समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि, विधेयक में समलैंगिक व्यक्तियों के कई सिविल अधिकारों का उल्लेख नहीं है। जिसमें, ‘‘विवाह,तलाक और गोद लेने जैसे अधिकार हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि कई समलैंगिक व्यक्ति भी बिना किसी कानूनी संरक्षण के विवाह करके अपने साथी के साथ रहते हैं। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के जीवन और वास्तविकता के लिए यह महत्वपूर्ण है।’’ 

रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि जब तक विधेयक समलैंगिक व्यक्तियों के पार्टनरशिप और शादी, संबंधित निजी कानूनों या अन्य संबंधित कानूनों के तहत संरक्षण करने का अधिकार नहीं देता है तब तक उन पर  औपनिवेशिक युग के दंड कानून धारा 377 के तहत अपराधी ठहराने या सजा देने का खतरा बना रहेगा।  दरअसल, भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंध बनाने को अप्राकृतिक मैथुन की श्रेणी में रखा गया है। इसे प्रकृति के खिलाफ मानते हुए दंड का विधान है।

रिपोर्ट की प्रस्तावना में कहा गया है कि ट्रांसजेंडर समुदाय एक ऐतिहासिक बदलाव की राह पर हैं। अपने साथ होने वाले भेदभाव और हिंसा के खिलाफ संघर्ष में वे अकेले नहीं हैं। भेदभाव समाप्त करने के संघर्ष आप अकेले नहीं हैं। यह साझा संघर्ष है। समलैंगिकता विसंगति नहीं है यह मानव व्यवहार का हिस्सा है।

 सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति में रमेश बैस

रिपोर्ट ने बहस का दायरा बढ़ाया

समिति की इस रिपोर्ट से समलैंगिकों का मुद्दा सरकार के दायरे से बाहर चला गया है। अब यह सरकार और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं रह गया है। समिति के अनुसार समलैंगिक, लेस्बियन, उभयलिंगी, विपरीतलिंगी या यहां तक कि होमोफोन होने में कोई शर्म की बात नहीं है। इस मुद्दे पर विपरीत राय रखने के बावजूद समिति की रिपोर्ट के अनुसार अब भाजपा को विधेयक में बदलाव करना होगा। दरअसल, 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने धारा 377 को सही ठहराया और इसमें संशोधन करना या न करना विधायिका पर छोड़ दिया था। उस समय देश में इस पर व्यापक बहस छिड़ गई थी। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने समलैंगिकता को अप्राकृतिक कृत्य करार देते हुए निंदा की थी। पिछले साल, आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबोले ने कहा था कि, समलैंगिकता को एक अपराध के रूप नहीं लेकिन इसे सामाजिक रूप से अनैतिक कृत्य  और एक मनोवैज्ञानिक विकृति के रूप में देखा जाना चाहिए।  संसदीय समिति ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संदर्भ में  वैकल्पिक परविार व्यवस्था बनाने पर जोर दिया है। जिससे बुजुर्ग ट्रांसजेंडर युवा  ट्रांसजेंडर को पहचान करके गोद ले सकें। इससे उनका अपराधीकरण रूकेगा। दरअसल, किसी भी परिवार में हिजड़ा बच्चे के जन्म लेने के बाद परिवार एक तरह से उनसे दूरी बना लेता है। ऐसे में वैकल्पिक परिवार एक अच्छा माध्यम बन सकता है।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा पर भी आपत्ति

समिति की रिपोर्ट में मसौदा विधेयक के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा पर भी आपत्ति दर्ज की है। समिति का कहना है कि हमें एसे शब्दों से परहेज करना चाहिए जिसमें ट्रांसजेंडर को शारीरिक रूप से भेदभाव का शिकार होना पड़े। समिति ट्रांसजेंडर को परिभाषित करते हुए कहा है कि, न तो पूरी तरह पुरूष और न ही पूरी तरह महिला पुरूष और महिला का समिश्रण, और न तो महिला और न ही पुरूष के रूप् में देखना चाहिए। समिति का कहना है कि अभी तक हमारे समाज में जन्म के समय जिस बच्चे का लिंग पता नहीं चलता उसे किन्नर,हिजड़ा,अरावनी और जोगटस आदि कहते हैं। भारत में कुल कितने ट्रांसजेंडर हैं, हमारे पास इसका आंकड़ा नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार अन्य लोगों ( जिनकी पहचान पुरुष या महिला के रूप में नहीं है) 4.87 लाख  दर्ज की गई थी।  साल  2011 में एक गैर सरकारी संगठन के सर्वेक्षण के अनुसार देश में ट्रांसजेंडरों की कुल संख्या 19 लाख  है।   

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मिले आरक्षण का लाभ

समिति चाहता है कि विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को परिभाषित करके उनके साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त किया जाए। इसके  साथ ही ट्रांसजेंडर के साथ  भेदभाव करने वाले राज्य या निजी प्रतिष्ठान को दंडनीय बनाया जाए। समिति यह भी चाहता है कि ट्रांसजेंडर को आरक्षण का कैसे लाभ मिले या आरक्षण के लाभ का विस्तार ट्रांसजेंडरों तक कैसे पहुंचे इसे सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा जाए। शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में जिस तरह से सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों को आरक्षण दिया जा रहा है उसी तरह से ट्रांसजेंडरों को आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण का लाभ दिया जाए। 

 

 










Leave your comment