वैज्ञानिक समाज के पक्षधर प्रो. यशपाल का जाना

श्रद्धांजलि , नई दिल्ली, मंगलवार , 25-07-2017


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली। प्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं शिक्षाशास्त्री प्रो. यशपाल नहीं रहे। मंगलवार को नोएडा स्थित आवास पर उनका निधन हो गया। वे 91 साल के थे। विज्ञान के छात्र एवं पेशे से वैज्ञानिक प्रो. यशपाल की चर्चा उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों के अलावा राजनीतिक एवं सामाजिक विचारों के कारण भी होती रही है। वैज्ञानिक समाज के पक्षधर यशपाल देश और समाज के हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर मुखर रहे हैं। अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं प्रगतिशील जीवन मूल्यों के कारण वे आलोचना के शिकार भी होते रहे। लेकिन आलोचना से घबरा कर कभी भी उन्होंने अपने विचारों को नहीं छिपाया। वे जिस भी क्षेत्र से जुड़े वहां बुनियादी बदलाव करने के साथ ही गुणवत्ता पूर्ण योगदान दिया। 

निवर्तमान राष्ट्रपति से पुरस्कृत होते यशपाल।

यशपाल ने छोड़ी अलग छाप

विज्ञान के साथ ही वे शिक्षा क्षेत्र में भी समयानुसार व्यापक बदलाव के हिमायती थे। योजना आयोग के मुख्य सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने अपने काम और विचार की स्पष्ट छाप छोड़ी। शिक्षा एवं विज्ञान के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा। 

 प्रो. यशपाल का जन्म 26 नवंबर 1926 को चेनाब नदी के किनारे स्थित शहर झांग (पंजाब )में हुआ था। बंटवारे के बाद यह क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। सन् 1949 में पंजाब विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र में परास्नातक करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए। 1958 में मेसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पीएचडी करके वापस भारत आए। यहां पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में बतौर वैज्ञानिक नियुक्त हुए। इस संस्थान में वे वैज्ञानिकों के उस समूह के सदस्य बने जो कॉस्मिक रेज (अंतरिक्षीय किरणों) पर शोध कर रहा था।

यशपाल पूर्व एचआरडी मंत्री कपिल सिब्बल के साथ।

कई उच्च पदों पर रहे यशपाल 

यशपाल 1983 तक टाटा इंस्टीट्यूट में काम करते रहे। उनके कार्यों की गूंज भारत सरकार के कानों तक पहुंची। केंद्र सरकार उन्हें अपने साथ जोड़ने को उतावली हो गई। विज्ञान में शिक्षा में गहरी पकड़ के साथ ही उनमें प्रशासनिक क्षमता भी अद्भुत थी। प्रशासनिक क्षमताएं और देश दुनिया के बारे में अलग नजरिया उन्हें बाकी वैज्ञानिकों से अलग करता था। जिसके कारण वे 1981 में दूसरे संयुक्त राष्ट्र विश्व शांति मिशन के महासचिव चुने गए। 1983 में वे योजना आयोग के मुख्य सलाहकार बनाए गए तो 1984 में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी विभाग के सचिव नियुक्त हुए। 1986 में वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष पद पर बैठाए गए। इस दौरान उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया। सन 1993 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूली शिक्षा में आवश्यक सुधार एवं बदलाव के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया। इस समिति का अध्यक्ष प्रो.यशपाल को बनाया गया। यशपाल ने नेतृत्व में समिति ने व्यापक अध्ययन के बाद ‘लर्निंग विदाउट बर्डन’ के नाम से रिपोर्ट सौंपी। यह रिपोर्ट आज स्कूली शिक्षा का बुनियादी दस्तावेज माना जाता है। 

उच्च शिक्षा में चर्चित है यशपाल समिति

सन 2009 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में उच्च शिक्षा पर एक समिति का गठन किया। प्रो. यशपाल ने उच्च  शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी खामियों का जिक्र करते हुए व्यापक बदलाव की अनुशंसा की। जिसमें विश्वविद्यालयों को ज्ञान के साथ ही आइडिया और बाहरी समाज से जुड़ने का सुझाव दिया। यशपाल ने अपने सुझाव में कहा था कि हमारे उच्च शैक्षणिक संस्थान बाहरी दुनिया से कट गए हैं। ऐसे में आईआईटी, आईआईएम और विश्वविद्यालयों को समाज के अन्य क्षेत्रों से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। यह समिति आज भी यशपाल समिति के नाम से जानी जाती है। यशपाल दूरदर्शन पर साइंस से जुड़े प्रोग्राम्स के सलाहकार बोर्ड में भी शामिल रहे।










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