अलवर गैंगरेप: प्रशासन ने नहीं की दरिंदों के खिलाफ समय पर कार्रवाई

मुद्दा , , मंगलवार , 14-05-2019


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भवंर मेघवंशी

पीड़ित दम्पत्ति के अनुसार वो लोग 26 अप्रैल 2019 को शाम 3 बजे के बाद राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी इलाके के एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए अपनी मोटरसाइकिल पर निकले, तभी निर्जन क्षेत्र में 2 मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर आये 5 युवकों ने रुकवाया और पीड़िता व उसके पति को जबरदस्ती रेत के बड़े बड़े टीलों में ले जा कर मारपीट करने लगे।

इन पांचों बदमाशों ने मिलकर पीड़ित दम्पत्ति के कपड़े उतरवा लिए, अश्लील तस्वीरें खींचीं और पीड़िता से उसके पति के सामने ही बारी-बारी से दुष्कर्म किया, इस जघन्य अपराध का वीडियो बनाया और जाते-जाते उसे वायरल करने और घटना के बारे में किसी को भी बताने पर जान से मार डालने की धमकी दी।

अपने साथ हुए इस हादसे से पीड़ित दम्पत्ति स्तब्ध रह गए, उनकी हिम्मत जवाब दे गई, मानसिक व शारीरिक रूप से टूट चुके इस युगल ने हिम्मत बटोरी और वापस गांव की तरफ निकले, चुपचाप घर पहुंच कर युवक ने अपनी पत्नी को उसके पीहर छोड़ा और खुद अपने घर आ गया।

इज्जत खराब होने के डर और अचानक हुए इस हादसे ने दोनों ही पीड़ितों को इतना तोड़ दिया कि वे न तो अपने परिजनों को अपनी पीड़ा बयान कर पाए और न ही पुलिस में जाने का हौसला जुटा पाये।

इस बीच गैंगरेप करने वाली गैंग की ओर से लड़के के मोबाइल पर कॉल आने लगे, जिसमें पैसे की डिमांड की गई और पैसा न देने पर दुबारा उसी जगह पर दोनों को बुलाया गया, वरना वीडियो वायरल करने और जान से मार डालने की धमकियां दी जाने लगीं।

बार-बार की धमकियों व पैसे तथा अस्मत की मांग से आज़िज़ आ कर पीड़ित दम्पत्ति ने परिजनों को अपने साथ घटी घटना से अवगत कराया और पुलिस की मदद लेने के लिए थानागाजी पहुंचे।

घटना के तीसरे दिन 29 अप्रैल 2019 को पीड़िता की ओर से थानागाजी पुलिस स्टेशन पर लिखित रिपोर्ट दी गई, जिसमें अपने साथ हुए सामूहिक बलात्कार, अश्लील वीडियोग्राफी व उसे वायरल करने की धमकियों की जानकारी थी। पुलिस ने इस रिपोर्ट को दर्ज करना तो दूर उस पर ध्यान देना भी उचित नहीं समझा।

जब स्थानीय थाने में कोई सुनवाई नहीं हुई तो पीड़ित पक्ष ने अगले दिन 30 अप्रैल 2019 को अलवर एसपी के सामने व्यक्तिशः पेश हो कर एक रपट प्रस्तुत की, उन्होंने एसपी को अवगत कराया कि अभी आपके दफ्तर में आने के बाद भी आरोपी समाजकंटकों के फोन आ रहे हैं, वे पैसा मांग रहे हैं, अस्मत मांग रहे हैं, नहीं तो वीडियो वायरल करने की धमकी दे रहे हैं।

अलवर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने इस गंभीर घटना को भी सामान्य लिया और रूटीन में रिपोर्ट पर मार्क करके वापस थानागाजी पुलिस स्टेशन को भेज दिया।

एसपी के निर्देश के बावजूद भी थानाधिकारी ने इस रिपोर्ट को दर्ज नहीं किया, अगले दो दिन 1 व 2 मई 2019 को मेडिकल के बहाने और चक्कर कटवाए।

अन्ततः स्थानीय विधायक कांति मीणा के दखल के बाद  2 मई 2019 को दोपहर 2.30 बजे मुकदमा दर्ज किया गया, इस तरह गैंगरेप जैसी भयानक घटना का मुकदमा ही घटना के 7 दिन बीत जाने पर बड़ी मुश्किल से दर्ज किया गया।

थानागाजी पुलिस स्टेशन में पीड़िता की ओर से नामजद अभियुक्तों के ख़िलाफ़ दर्ज इस मुकदमे में भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 149, 323, 341 व 354 (ख) 376 (डी) 506 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (नृशंसता निवारण) अधिनियम 2015 की धारा 3(2)(5) के तहत आरोप लगाए जाने की जांच जगमोहन शर्मा को सौंपी गई।

पुलिस ने बड़ी मुश्किल से मामला भले ही दर्ज कर लिया, पर कार्रवाई के नाम पर कुछ भी नहीं किया, जबकि मामला सामूहिक दुष्कर्म जैसे भयंकर अपराध से जुड़ा हुआ था, पीड़िता बार बार घटना का वीडियो वायरल हो जाने का अंदेशा जता रही थी, मगर चुनाव का बहाना बना कर थानागाजी पुलिस तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, जब तक कि अभियुक्तों ने वीडियो वायरल न कर दिया।

6 मई 2019 को राजस्थान में चुनाव का आखिरी चरण निपटा, अलवर में भी मतदान सम्पन्न हो गया, इसी के साथ उन समाजकंटकों ने पीड़ित पक्ष की इज़्ज़त को तार तार करते हुए उनका अश्लील वीडियो लोगों में आम कर दिया।

7 मई 2019 के अखबार, न्यूज़ चैनल्स और वेबसाइट्स दलित विवाहिता के साथ पति को बंधक बना कर किये गए इस सामूहिक दुष्कर्म की खबर से भर गये। सदैव की भांति बाकी देश तो शांत ही रहा पर इंसानियत में यकीन करने वाले तमाम लोग और दलित बहुजन युवा सड़कों पर उतर आए, वे इस अन्याय को बर्दाश्त करने को तैयार न थे, उन्होंने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया।

अलवर गैंगरेप कांड और राजस्थान की सिविल सोसाइटी

घटना के उजागर होते ही अलवर, भरतपुर, सीकर और जयपुर इत्यादि निकटवर्ती जिलों के दलित, बहुजन, अल्पसंख्यक व इंसाफ व मानवता में भरोसा करने वाले नागरिक समाज के तमाम साथी थानागाजी की तरफ चल दिए, जो जिस भी हालत में था, उसने कूच कर दिया।

एडवोकेट रामजीवन बौद्ध निरन्तर अपडेट कर रहे थे, उनसे हर घण्टे का समाचार मिल रहा था, 8 मई को मेरी रामनाथ मेघवाल से फोन पर बात हुई, उनसे घटना के संबंध में विस्तृत चर्चा हुई और संघर्ष की रणनीति पर हमने बात की ।

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की राज्य अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने सिविल सोसाइटी ग्रुप्स की ओर से पहल करते हुए डीजीपी और सीएम से बात करके कड़ी कार्रवाई की मांग की।

हर जिले में अम्बेडकरवादी संगठनों ने धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन दिया। विशेषकर भीमसेना और राज्य के दलित व प्रगतिशील संगठन और महिला संगठनों की इसमें अग्रणी भूमिका रही।

8,9 व 10 मई को कई संगठनों ने अपने फैक्ट फाइंडिंग दल भेजे, जिनमें ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, सद्भावना मंच, एपीसीआर, जमाते इस्लामी हिन्द ,जनवादी महिला समिति, राजस्थान नागरिक अधिकार मंच, दलित अधिकार केंद्र, नेशनल अलायंस फ़ॉर पीपुल्स मूवमेंट्स, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया, माकपा, भाकपा, सीपीआई एमएल,  डगर, एसआर अभियान, दलित आदिवासी अल्पसंख्यक अत्याचार विरोधी अभियान,संवैधानिक अधिकार संगठन तथा दलित शोषण मुक्ति मंच सहित दर्जनों सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशन्स ने घटना स्थल का दौरा किया,पीड़ितों से मुलाकात की और न्याय के लिए आवाज़ बुलंद की ।

10 मई को जयपुर में भारत एकता मंच के संयोजक रोशन मुंडोतिया व भीम सेना के प्रमुख चंद्रशेखर के नेतृत्व में हजारों युवाओं ने जयपुर में जंगी प्रदर्शन किया।

8 मई से आज तक प्रदेश के किसी न किसी हिस्से में कोई न कोई अम्बेडकरवादी, बहुजन मिशनरी, प्रगतिशील संस्था या समूह अथवा संगठन की ओर से प्रतिरोध की आवाज़ को बुलंद किया जाता रहा है। सुदूर जालोर में बृजेश मेघवाल से लेकर नोखा से मगनाराम केडली जैसे सैंकड़ों युवा स्वतःस्फूर्त इस जंग में कूद पड़े थे।

निसंदेह यह कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति ने अपना योगदान दिया है, जैसा कि एडवोकेट ताराचंद वर्मा कहते है कि विशेषकर दलित युवाओं ने इस आंदोलन में अपनी अग्रणी भूमिका निभाकर सरकार को मजबूर कर दिया।

राजस्थान नागरिक मंच से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अनिल गोस्वामी बताते हैं कि लोगों को पता ही नहीं है कि कितने लोगों ने क्या योगदान दिया है, किसी ने मोरल सपोर्ट दिया है तो अजाक जैसे संगठन ने पीड़ितों को 1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देकर उनका हौंसला बढ़ाया है।

राजस्थान की सिविल सोसायटी अपने तमाम मतभेदों और असहमतियों के बावजूद ऐसे हर मौके पर एकजुट हो कर आगे रही है,सभी ने अपना योगदान किया है,चूंकि इस संघर्ष में लीड रोल में दलित बहुजन संगठन नजर आए हैं,मगर सिविल सोसायटी व प्रगतिशील समूह भी बराबर साथ खड़े रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस बार का पूरा संघर्ष राजस्थान के दलित युवाओं ने अपने भरोसे और आत्मविश्वास पर किया, न उन्होंने पड़ोसी राज्यों के मसीहाओं का इंतज़ार किया और न ही पूना पैक्ट की दुर्बल संतानों से उन्होंने कोई अपेक्षा की, अगर कोई स्वतः आ गए तो उनको भी साथ ले लिया,पर अपनी पीड़ा,अपना मुद्दा,अपनी लड़ाई,अपनी अगुवाई के रूप में ही यह इंसाफ का आंदोलन आगे बढ़ा है और इसमें सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइजेसंश की भूमिका सराहनीय रही है।

घटना के आधा माह बीत जाने के बाद अगर कुछ लोग जिनको केंद्रीय भूमिका नहीं मिल पाई, वे सवाल उठा रहे हैं कि राजस्थान की सिविल सोसाइटी चुप क्यों है, मुंह पर ताला क्यों पड़ा है या की मंगल ग्रह पर शिफ्टिंग हो चुकी है, तो ऐसी तमाम बातों का भी राजस्थान के संघर्षरत युवाओं और नागर समाज के मुखर लोगों ने जमकर जवाब दिया है।

(जारी)

(भंवर मेघवंशी राजस्थान के जाने-माने सोशल एक्टिविस्ट हैं। यह रिपोर्ट उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

 








Tagalwar ganagrape police administration action

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???????? ???????? :: - 05-14-2019
भँवर भाई, राजस्थान की सिविल सोसायटी से आप का क्या तात्पर्य है, यह समझ नहीं सका।