धीरे-धीरे आ रही सच्चाई सामने, बंद के दौरान दलित नहीं सवर्णों ने फैलायी थी हिंसा!

पड़ताल , , बुधवार , 04-04-2018


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जनचौक स्टाफ

अब यह बात धीरे-धीरे साफ होती जा रही है कि भारत बंद के दौरान हुई हिंसा और टकराव के लिए दलित आंदोलकारियों से ज़्यादा आंदोलन विरोधी दबंग ही ज़िम्मेदार थे। 

भारत बंद के दौरान हुई हिंसा को रिपोर्ट करते समय ‘जनचौक’ ने ऐसी ही आशंका जताते हुए साफ कहा था कि अभी ये तय होना बाक़ी है कि हिंसा दलित आंदोलनकारियों ने की या आंदोलन विरोधियों ने। और अब यह बात सामने भी आ रही है। 

 

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में गोली चलाते राजा चौहान की तस्वीर, भिंड में प्रदर्शनकारियों से भिड़ते बजरंग दल के कार्यकर्ता और राजस्थान के बाड़मेर में करणी सेना का उपद्रव सब इसी ओर इशारा करते हैं और अब प्रतिशोध के तौर पर दलितों पर हो रही प्रतिहिंसा भी यही बताती है कि कथित सवर्ण या वर्चस्वशाली लोग दलितों के आंदोलन या उभार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों का रवैया भी लगभग दमनात्मक ही है।

 

आपको ये मालूम होना चाहिए कि बंद के दौरान मारे गए लोगों में सबसे ज़्यादा खुद दलित प्रदर्शनकारी ही हैं। अब यह तो संभव नहीं कि बंद समर्थकों ने अपने ही साथियों की हत्या कर दी। इससे साफ है कि इस आंदोलन और बंद को बदनाम और विफल करने के लिए हिंसा का पूरा कुचक्र रचा गया।

दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान सबसे ज़्यादा हिंसा मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुई। यूपी, हरियाणा, पंजाब और झारखंड में भी छिटपुट हिंसा की वारदात हुईं, हालांकि जितना बड़ा ये बंद था उस हिसाब से देशभर में बंद शांतिपूर्ण ही कहा जाएगा। 

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि हिंसा की ज़्यादातर बड़ी घटनाएं बीजेपी शासित प्रदेशों में हुईं। ख़ासकर उनमें (मध्य प्रदेश, राजस्थान) जहां चुनाव करीब हैं।    

मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिंड और मुरैना में हिंसा की सबसे ज़्यादा वारदात हुईं जिसमें कम से कम 6 लोगों को जान गंवानी पड़ी। भिंड में तो बजरंग दल और भीम सेना के बीच तीखी झड़प हुई।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में पुलिस महानिरीक्षक (कानून-व्यवस्था) मकरंद देवस्कर ने बताया कि प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में ग्वालियर में तीन, भिंड में दो और मुरैना में एक व्यक्ति की मौत हुई है। उनके मुताबिक पांच मौतें आपसी झड़पों के कारण हुई हैं। मरने वालों में तीन जाटव, एक राजावत और एक ब्राह्मण है। 

मध्य प्रदेश के इन इलाकों में अभी भी तनाव बना हुआ है। कुछ इलाकों में कर्फ्यू भी जारी है। हिंसा के दौरान मौत में दो पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया गया है।

 

ग्वालियर की घटना के पीछे भी दलित विरोधी साजिश सामने आ रही है। मीडिया में जो वीडियो आया है जिसमें एक शख्स पिस्तौल लेकर गोली चला रहा है, उसका नाम राजा चौहान बताया जा रहा है। यह एक प्रभावशाली परिवार से है। 

 

इस शख्स को एक्सपोज करने वाले ब्लॉगर और सोशल एक्टिविस्ट देवाशीष जररिया ने अपने ट्विट में लिखा है कि ग्वालियर में जो पिस्तौल से गोली चला रहा है इस शख्स का नाम है राजा चौहान। इसके सभी साथी तोमर बिल्डिंग चौहान प्याऊ ग्वालियर के रहने वाले है। इन्होंने भारत बंद को जाति की हिंसा में बदल दिया, दलित समुदाय के तीन लोगो को मार दिए इसने, मेरे स्कूल में मेरा सीनियर था।”

 

 

राजा चौहान को लेकर देवाशीष के सभी दावों की पुष्टि नहीं की जा सकती लेकिन पुलिस ने राजा पर धारा 308 के तहत गैरइरादत हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर लिया है।

यह खुलासा होने के बाद मशहूर एंकर अभिसार शर्मा ने जिन्होंने पहले इस तस्वीर को पोस्ट करके भारत बंद की आलोचना की थी, उन्होंने कहा कि “मैं भी अपना पहला ट्वीट वापस लेता हूं। जिसमें मैंने इस तस्वीर के आधार पर आंदोलन की आलोचना की थी। ये शख्स राजा चौहान है जिसका दलित आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है।”

 

 

राजस्थान के बाड़मेर में करणी सेना ने सड़क पर उतरकर दलित प्रदर्शनकारियों पर हमला किया। इसके अलावा अलवर में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प में एक व्यक्ति की मौत हो गई।

 

उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में भी बंद के दौरान एक व्यक्ति की मौत हुई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त डीजीपी (कानून और व्यवस्था) आनंद कुमार ने बताया कि  राज्य भर में हिंसा के पीछे एक साजिश की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक मुज़फ़्फ़रनगर में समाज विरोधी तत्व प्रदर्शनकारियों के बीच मिल गए और हिंसा की। ये तत्व अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के समुदायों के नहीं थे।

पुलिस ने दावा किया कि ऐसे तत्वों को वीडियो की मदद से पहचान लिया गया है और उन्हें गिरफ्तार करने के प्रयास चल रहे हैं।

 

आपको मालूम है कि एससी/एसटी (प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रोसिटीज़) एक्ट में बदलाव को लेकर ये सारा आंदोलन और बंद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट में बदलाव करते हुए शिकायत मिलने पर तुरंत एफआईआर और गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी है साथ ही इस मामले में अग्रिम ज़मानत की भी अनुमति दी है।

सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले को दलितों की सुरक्षा से खिलवाड़ के तौर पर देखा गया। यह भी डर सामने आया कि अब दलित उत्पीड़न का दौर तेज़ हो सकता है और इसी के विरोध में 2 अप्रैल को भारत बंद बुलाया गया। इस बंद की खासियत यह रही कि इसमें किसी नेता विशेष या पार्टी विशेष नेतृत्व की भूमिका में नहीं थी। बल्कि ये ज़मीनी स्तर से उठा आंदोलन था और दलितों के तमाम छोटे-छोटे संगठनों की ओर से ये बंद बुलाया गया जिसे तमाम प्रगतिशील ताकतों और राजनीतिक दलों ने सहयोग दिया। यही वजह रही कि इस बंद का इतना व्यापक असर देखने को मिला।  

इसी आंदोलन और बंद के दबाव में केंद्र सरकार बंद वाले दिन ही सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका लेकर गई। हालांकि इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित की दो सदस्यीय बेंच ने अपने पुराने आदेश पर तत्काल रोक लगाने से इंकार कर दिया है और सुनवाई के लिए 10 दिन बाद की तारीख दी है।

कोर्ट आगे इस पर क्या रुख लेता है ये देखने वाली बात है कि लेकिन ये आंदोलन अब अतंरराष्ट्रीय रूप धारण कर रहा है। सड़क से संसद होते हुए अब इस आंदोलन की गूंज विदेशों तक में सुनाई पड़ रही है और सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक पर सवाल उठ रहे हैं।






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