दर्शक मंडल में मार्ग दर्शकों का बैठाया जाना

ख़बरों के बीच , , रविवार , 07-04-2019


bjp-advani-joshi-mahajan-margdarshak-mandal-modi-shah

महेंद्र मिश्र

बीजेपी में मार्ग दर्शकमंडल के सदस्यों को दर्शक मंडल में बैठाने का सिलसिला जारी है। लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के बाद स्पीकर सुमित्रा महाजन को भी उसका रास्ता दिखा दिया गया है। इन नेताओं को राजनीति से सन्यास दिलाने यह कार्यवाही अगर उनकी सहमति से होती तो भला उस पर किसी को क्या एतराज हो सकता था। लेकिन जब यह जबरन किया जा रहा हो तब सवाल उठना लाजिमी है। 

हालांकि इस मामले में 75 साल के एज बार का हवाला दिया गया है जिसको पार्टी में रिटायरमेंट की उम्र बतायी जा रही है। लेकिन यह कहीं आधिकारिक तौर पर लिखा गया हो या फिर उसका कोई प्रस्ताव पास किया गया हो। ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती है। ऐसी स्थिति में यह एक नेता की इच्छा से ज्यादा कुछ नहीं लगती है। आम तौर पर किसी भी नेतृत्व के लिए यह एक सर्वमान्य सिद्धांत सरीखा है जो सभी संस्थाओं पर लागू होता है। वह यह कि कोई भी नेतृत्व हमेशा अपने से नीचे या फिर अधिकतम संभाव्य बराबर के लोगों को चुनता है। अपने से ऊपर का नेतृत्व जो किसी भी रूप में क्षमता या फिर योग्यता के पैमाने पर ज्यादा हो, को बहुत दिनों तक बनाए रखना बहुत मुश्किल होता है। लिहाजा यह बिल्कुल स्वाभाविक था जो बीजेपी में आज घटित हो रहा है। 

लेकिन इस मामले में आडवाणी का एक खास पक्ष हो जाता है। क्योंकि उन्होंने ही मोदी को राजनीति में पाल-पोस कर बड़ा किया और संकट के हर मौके पर उनके ढाल का काम किए। ऐसे में मोदी का उनके प्रति व्यवहार इन संदर्भों में क्रूरतापूर्ण हो जाता है। हालांकि इस बात में कोई शक नहीं कि नफरत और घृणा के जिस बीज को आडवाणी ने बोया था आज वही मोदी के रूप में फल-फूलकर बड़ा हो गया है। और अब उन्हें भी अपना शिकार बना लिया है। लिहाजा अगर इस बात के लिए किसी को प्राथमिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है तो वह आडवाणी ही हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर आप अपने से बाहर के हिस्से को दुश्मन के तौर पर देखते हैं और उसके खात्मे तक के बारे में सोचते हैं। 

तो ऐसा सोचने और करने वाला शख्स उसको उसे अपने आस-पास के लोगों पर ही लागू करता है। दंगे में बाहरी लोगों को मार देने की हिम्मत ही घर के भीतर के सदस्यों (हरेन पांड्या सरीखे लोगों) के खात्मे का हौसला देती है। दूसरे दलों के नेताओं के अपमान पर जब बीजेपी के नेताओं ने चुप्पी साध रखी थी तो उन्हें इस बात का जरूर आभाष होना चाहिए था कि एक दिन इसी अपमान से खुद उन्हें भी गुजरना पड़ सकता है।

गुजरात का 2002 का दंगा रहा हो या फिर हरेन पांड्या की हत्या आडवाणी उन सब मसलों को न केवल दरकिनार किए बल्कि मोदी को उन्होंने खुला संरक्षण दिया। ऐसे में अब अगर खुद उनके उसी चेले के हाथ से उनकी राजनीतिक हत्या गयी है तो फिर पीड़ा किस बात की। आडवाणी आज जो ब्लॉग लिख रहे हैं। क्या इसे उन्हें पहले नहीं लिखना चाहिए था? जब पूरे देश में समाज समेत पूरा विपक्ष मोदी की निरंकुश सत्ता के इसी तरह के हमलों का शिकार हो रहा था।

लेकिन यह कुछ उसी तरह से था जैसे फासिज्म के बारे में समाज के विभिन्न हिस्सों के लिए कहा जाता है। कुछ उसी तरह की बात बीजेपी के नेतृत्व की सोच में भी शामिल थी जिसमें दूसरे पर हमले और उसके अपमान के दंश से खुद के बचे रहने की उम्मीद होती है। और इस कड़ी में बारी-बारी से सभी को किनारे लगाया जा रहा है। और अपमानित किया जा रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि अभी आडवाणी, जोशी, सुषमा स्वराज और महाजन पर गाज गिरी है। अब बारी जेटली राजनाथ समेत दूसरे नेताओं की है। और आखिर में दो नेताओं की पार्टी होगी। जिसमें अगले नेतृत्व का नंबर उसकी हैसियत 100वें पायदान के बाद शुरू होगी।

लेकिन इस पार्टी और उसके नेतृत्व के बने रहने की शर्त यही होगी कि वह पूरे समाज और राजनीति को भी उसी के स्तर पर ले जाकर खड़ा कर दे। जो 2000 साल पुरानी सभ्यता के वारिसों और 70 सालों के पुख्ता लोकतंत्र की हवा में खुली सांस ले चुके इस समाज के लिए बहुत ही मुश्किल है।

रही बात 75 साल के बाद की उम्र में नेतृत्व की क्षमता और उसके बने रहने की तो इस देश में अभी तक जितने भी बदलाव आए हैं उसका नेतृत्व 75 साल से ऊपर के लोगों ने ही किया है। वह गांधी हों या कि जयप्रकाश नारायण या फिर हाल में चले अन्ना आंदोलन तक का सच यही है। लिहाजा किसी का यह कहना कि 75 साल से ऊपर का नेतृत्व नकारा हो जाता है। यह खुद के अपने इतिहास को झुठलाना है। वैसे भी इंसान की जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है उसका अनुभव, परिपक्वता और समझ गहरी होती जाती है। लिहाजा समाज और राजनीति समेत राष्ट्र के हर क्षेत्र में उसका योगदान किसी पूंजी से कम नहीं है।

यहां तक कि पश्चिमी देशों में भी भले ही युवा नेतृत्व को सत्ता में तरजीह दी जाती है। बावजूद इसके बुजुर्ग नेतृत्व को बिल्कुल खारिज कर दिया जाए या फिर उन्हें राजनीति से अलग कर दिया जाए ऐसी कोई शर्त नहीं है। वरना ब्रिटेन में जर्मी कोरबिन और अमेरिका में बर्नी सैंडर्स नेता नहीं बने रहते जो उम्र के हिसाब से बेहद बुजुर्ग हैं। यहां तक कि अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की उम्र भी 71 साल है। जो पश्चिम के हिसाब से ज्यादा है।








Tagbjp advani joshi mahajan modishah

Leave your comment