बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 13-12-2018


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मसऊद अख्तर

अगले आम चुनाव के पहले पांच राज्यों का चुनाव 2013 की तरह इस बार भी पूर्वाभ्यास या कहें कि सेमीफाइनल था। इन चुनावों के नतीजे जनता के रुझान को स्पष्ट करते हैं। इन पांच में से तीन राज्यों में भाजपा, एक में कांग्रेस और एक में टीआरएस सत्ता में थी। जिनमें से केवल टीआरएस ने अपनी सत्ता बरकरार रखी और शेष चार जगह परिवर्तन की लहर ने सत्ताधारी दल को उखाड़ फेंका। इन पांच विधानसभाओं में कुल 678 सीटों पर चुनाव हुआ था, जिसमें भाजपा को 199 तो वहीं कांग्रेस को 305 सीटें प्राप्त हुईं। कांग्रेस ने मिजोरम राज्य जरूर गंवाया मगर उसने भाजपा शासित तीनों राज्य उससे छीन लिए। यही नहीं वो शेष दोनों राज्यों में दूसरे नंबर की पार्टी रही। जबकि भाजपा मिजोरम और तेलंगाना में मात्र 1-1 सीट ही प्राप्त कर सकी। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार इन्हीं पांच राज्यों के चुनावों ने भाजपा के पक्ष में जन धारणा बनाई थी।

यदि छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए तो शेष दो राज्य राजस्थान व मध्य प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा का न केवल मत प्रतिशत लगभग बराबर है, बल्कि सीटें भी। इस चुनाव परिणाम के विश्लेषण से पहले हमें देख लेना चाहिए कि 2014 में क्या स्थिति थी। अगर भाजपा की दृष्टि से देखें तो उसने 2014 में 283 सीटें पाई थी जिसमें मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश से 80 में से 71, महाराष्ट्र की 48 में से 23, मध्य प्रदेश की 29 में से 27, गुजरात की 26 में से 26, राजस्थान की 25 में से 25, बिहार की 40 में से 22, कर्नाटक की 28 में से 17, झारखंड की 14 में से 13, छत्तीसगढ़ की 11 में से 9, हरियाणा की 10 में से 7, दिल्ली की 7 में से 7, उत्तराखंड की 5 में से 5 और हिमाचल की 4 में से 4 सीटें प्राप्त की थीं। यह कुल मिलाकर 256 सीट होती है और यदि इसमें असम की उसकी 14 में से 7 सीटें जोड़ दें तो कुल 263 सीट होती है। इसके अलावा उसने केवल 20 सीटें और प्राप्त की थी।

अगर इन सारे राज्यों पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि इसमें से किसी एक भी राज्य में वो अपने 2014 के प्रदर्शन से बेहतर की उम्मीद नहीं कर सकती। इन सभी राज्यों में उसने पिछली बार ही अधिकतम सीटें प्राप्त कर ली थी और अब उसमें कमी ही होना है। यदि इन पांच राज्यों के चुनावों को जनता का रुझान मानें तो यह कमी 100 से लेकर 150 सीटों तक हो सकती है। अब सवाल यह है कि क्या भाजपा सीटों में होने वाली इस कमी की भरपाई कर पायेगी। आंध्र प्रदेश में पिछली बार इसका गठबंधन तेलगुदेशम से था और इन्हें वहां से 3 सीट मिली थी और तेलगुदेशम को 16। इस बार उसके साथ गठबंधन टूट चुका है। इसलिए वो 3 सीट बचाना ही चुनौती होगा। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु व केरल से एक आध सीट निकल आये तो वही बहुत है। नॉर्थ ईस्ट से 3-4 सीट तक बढ़ा सकते हैं। जम्मू-कश्मीर से पिछली बार ही 3 सीट जीत चुके हैं और उसको बरकरार रखना ही मुश्किल होगा।

भाजपा की एकमात्र उम्मीद उड़ीसा से ही है। वहां पिछली बार 21 में से 2 सीट पायी थी। लेकिन यहां से आखिर वो कितनी सीटों की भरपाई कर पाएगी। 2 से 12 भी होते हैं तो मात्र 10 सीटों की भरपाई होगी। यानी भाजपा वर्तमान परिस्थिति में 150 से 200 से अधिक सीट पाने की उम्मीद नहीं कर सकती। यदि महागठबंधन की अवधारणा फलीभूति होती है तो स्थिति इससे भी बुरी हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ कांग्रेस के पक्ष में हो गया। उसकी भी स्थिति कोई बहुत बेहतर नहीं है। उसे न केवल अपनी पार्टी के अंदर मेहनत करने की जरूरत है बल्कि अन्य दलों के साथ संबंधों को भी तय करना है और बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। जहां तक अगले चुनाव में उसकी सीटों का सवाल है तो 150 से 170 से अधिक पाती हुई अभी नहीं दिख रही है। 150 से कम भी हो सकता है। आज की स्थिति में यह अधिकतम है। अतः यह कहा जा सकता है कि अगले चुनाव के बाद नई सरकार का स्वरूप भले अभी स्पष्ट न हो परन्तु मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू मानी जा सकती है। यह एकदम स्पष्ट है और शायद यही इस चुनाव में भाजपा की बौखलाहट का कारण भी रहा।

(मसऊद अख्तर पेशे से एकैडमीशियन हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)


 










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???? :: - 12-12-2018
विश्लेषण सटीक है