फ़ुटपाथ: 2018 में मेरी नजरों से गुजरा किताबों का कारवां

फुटपाथ , , सोमवार , 31-12-2018


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अजय सिंह

वर्ष 2018 में मैंने कई किताबें पढ़ीं। नयी और पुरानी दोनों। कुछ किताबें मैंने दोबारा पढ़ीं। पढ़ी गयीं किताबों और पुस्तिकाओं की संख्या 50 से ऊपर होगी। इनमें साहित्य, समाज, राजनीति, इतिहास व संस्कृति से जुड़ी किताबें शामिल हैं। किताब के पन्नों में बेसब्र दुनिया, साकार होने को बेताब सपने, कल्पनाशीलता और रचनाशीलता की नयी आहटें समायी रहती हैं। अब यह हम पर है कि क्या लें, क्या सीखें।

कवि, गीतकार, कम्युनिस्ट चिंतक और जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव गोरख पांडेय (1945-1989) की थीसिस ‘अस्तित्ववाद में अलगाव की धारणा’ मैंने पढ़ी। मूल अंगरेज़ी में लिखी गयी इस थीसिस का हिंदी अनुवाद गोपाल प्रधान, अवधेश और मृत्युंजय ने मिल कर किया है। इसे आकार बुक्स (दिल्ली) ने किताब की शक्ल में 2017 में छापा। गोरख जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के छात्र थे, तब उन्होंने पीएचडी डिग्री के लिए 1982 में यह थीसिस जमा की थी। यह जेएनयू में दर्शनशास्त्र की पहली थीसिस थी।

मूल अंगरेज़ी में इस थीसिस का शीर्षक क्या था और वह छपी कि नहीं, इसके बारे में अनुवादकों ने नहीं बताया है। एक बात पर ग़ौर करिये कि गोरख-जैसा कम्युनिस्ट चिंतक—और बेहद लोकप्रिय कवि व गीतकार—अस्तित्ववाद पर शोध कार्य कर रहा है, और वह भी मार्क्सवादी नज़रिए से! यह किताब गोरख की वैचारिक व दार्शनिक तैयारियों का जायजा देती है। इस किताब में गोरख मार्क्सवादी तर्कपद्धति से अस्तित्ववाद के विभिन्न दार्शनिकों के विचारों का आलोचनात्मक विश्लेषण पेश करते हैं, और कार्ल मार्क्स की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हैं।

नक्सलबाड़ी के क्रांतिकारी सशस्त्र किसान विद्रोह (1967) के पचास साल पूरे होने पर अंगरेज़ी में एक महत्वपूर्ण किताब आकार बुक्स से 2018 में आयी है। इसका शीर्षक है, ‘इंडिया आफ़्टर नक्सलबाड़ीः अनफ़िनिश्ड हिस्ट्री’ (नक्सलबाड़ी के बाद भारतः असमाप्त इतिहास)। इसके लेखक हैं, ‘ईपीडब्ल्यू’ पत्रिका से जुड़े रहे पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व मानवाधिकार कार्यकर्ता बर्नार्ड डिमेलो। इसे पढ़ा मैंने। यह किताब फ़ासीवादी हिंदुत्व राष्ट्रवाद के मौजूदा दौर में नक्सलबाड़ी के महत्व को सामने लाती है।

मैं भीमराव अंबेडकर की लिखी किताब ‘हिंदू धर्म की रिडल’ (गुत्थी) और उनका आत्मकथात्मक गद्य ‘वीज़ा का इंतजार’ (1935) पढ़ गया। स्कूली पाठ्यक्रम में ‘वीज़ा का इंतजार’ को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए, और ‘हिंदू धर्म की रिडल’ को हमारे सांस्कृतिक-राजनीतिक विमर्श का ज़रूरी हिस्सा बनाया जाना चाहिए। मैंने ज़ेल्दा काहन-कोट्स की लिखी जीवनी ‘कार्ल मार्क्सः जीवन और शिक्षाएं’ पढ़ी (अनुवादः अमर नदीम)। मार्क्स को समझने के लिए यह संक्षिप्त लेकिन उपयोगी पुस्तिका है। अंगरेज़ी में यह पहली बार 1918 में छपी थी।

पिछली शताब्दी के शुरुआती वर्षों में मुहम्मद अली जिन्ना ने बाल गंगाधर तिलक व भगत सिंह के बचाव में जो दलीलें दी थीं, जो बहस की थी, उन्हें मैं पढ़ गया। यह पढ़ते हुए जिन्ना के प्रति मेरा आदर भाव और बढ़ा। मैंने पंडिता रमाबाई की पुस्तिका ‘द हाई कास्ट हिंदू वुमन’ (सवर्ण हिंदू औरत) पढ़ी, जो पहली बार 1888 में छपी थी, और जिसने ब्राह्मणवादी-रूढ़िवादी हिंदी समाज में खलबली मचा दी थी।

इतिहासकार और स्त्रीवादी विचारक उमा चक्रवर्ती की पुस्तिका ‘पंडिता रमाबाईः ए लाइफ़ ऐंड ए टाइम’ पढ़ी। नक्सलबाड़ी आंदोलन और सीपीआई (एमएल) के नेता शिवकुमार मिश्र (1914-2007) की राजनीतिक आत्मकथा ‘काकोरी से नक्सलबाड़ी’  (2005: संपादक सुरेश सलिल) पढ़ गया। यह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। हिंदी अनुवाद में कांचा इलैया शेफ़र्ड की विचारपरक किताब ‘हिंदुत्व-मुक्त भारत’ पढ़ी। मैं भगतसिंह का लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ और भीमराव अंबेडकर का लेख ‘जाति का उन्मूलन’ फिर पढ़ गया। अंबेडकरवादी आंदोलन की जटिलता और वैचारिक विचलन पर हिंदी अनुवाद में आनंद तेलतुंबडे की किताब ‘उत्तर अंबेडकरः दलित आंदोलन- दशा व दिशा’ पढ़ी।

कई कविता संग्रह पढ़े मैंनेः उषा राय का ‘सुहैल मेरे दोस्त’, सुभाष राय का ‘सलीब पर सच’, सुरेश सलिल का ‘कोई दीवार भी नहीं’, पवन करण का ‘स्त्रीशतक’, नरेंद्र पुंडरीक का ‘इन हाथों के बिना’, वेणु गोपाल का ‘और ज़्यादा सपने’, प्रेमलता वर्मा का ‘दो सरहदों के बीच’, कात्यायानी का ‘कवि ने कहा’, कौशल किशोर का ‘वह औरत नहीं महानद थी’, तरुण निशांत का ‘एंटीलिया और आदमी’ और तेलुगू कवि वरवर राव का ‘हमारा सपना दूसरी दुनिया’ (अनुवादः आर शांतासुंदरी)। ये कविता संग्रह कविता की समृद्ध, सतरंगी दुनिया से हमारा परिचय कराते हैं।

मैं राजेश कुमार का नाटक ‘तफ़्तीश’, अंजली देशपांडे का उपन्यास ‘महभियोग’, रामशरण जोशी की आत्मकथा ‘मैं बोनसाई अपने समय का’, और तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की नेता, स्त्रीवादी विचारक व लेखक अलेक्जेंड्रा कोलंताई (1872-1952) का उपन्यास ‘एक महान प्रेम’ (अंगरेज़ी अनुवाद से हिंदी अनुवादः लालबहादुर वर्मा) पढ़ गया। मूल रूसी में यह उपन्यास 1923 में छपा था, और इसके लिए कोलंताई को आलोचना और व्यक्तिगत जीवन में दिक़्क़तें झेलनी पड़ी थीं। अलेक्जेंड्रा कोलंताई के नाम और काम से मेरा परिचय ‘समयांतर’ पत्रिका (संपादक पंकज बिष्ट) के 2018 के एक अंक में छपे चंद्रकला के एक लेख से हुआ,और किरण सिंह ने ‘महान प्रेम’ उपन्यास मुझे उपलब्ध कराया। यह उपन्यास पढ़ा जाना चाहिए।

मैं फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी की आलोचना पुस्तक ‘हिंदी का लोकवृत्तः 1920-1940’ (मूल अंगरेज़ी से हिंदी अनुवादः नीलाभ), दिनेश कुमार प्रियजन का लेख संग्रह ‘समय, समाज और सृजन’, अजीत प्रियदर्शी की आलोचना पुस्तक ‘आधुनिक काव्य परिदृश्य’ और वीरेंद्र यादव की आलोचना पुस्तक ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ पढ़ गया। फ़्रांचेस्का की किताब बताती है कि 1920-1940 के दौर में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद की धारणा और ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ की भावना ने किस तरह हिंदी-जैसी धड़कती भाषा को एक घेरे में क़ैद कर दिया, और रामचंद्र शुक्ल-जैसे लेखकों का इसमें क्या रोल था।

कुछ किताबें मैं दोबारा पढ़ गया। जैसेः शोभा सिंह का कविता संग्रह ‘अर्द्ध विधवा’, किरण सिंह का कहानी संग्रह ‘यीशू की कीलें’, मोहन थपलियाल का कहानी संग्रह ‘छज्जूराम दिनमणि और अन्य कहानियां’, मनमोहन पाठक का उपन्यास ‘गगन घटा घहरानी’, पंकज बिष्ट का उपन्यास ‘उस चिड़िया का नाम’, भाषा सिंह की अध्ययन रिपोर्ट ‘अदृश्य भारतः मैला ढोने के बजबजाते यथार्थ से मुठभेड़’, राना अय्यूब की खोजी पत्रकारिता‘गुजरात फ़ाइल्स’, कौसल्या बैसंत्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’, नीलाभ का कविता संग्रह ‘शब्दों से नाता अटूट है’ और संस्मरण पुस्तक ‘ज्ञानरंजन के बहाने’, पंकज सिंह का कविता संग्रह ‘जैसे पवन पानी’, मंगलेश डबराल का कविता संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’, आलोकधन्वा का कविता संग्रह ‘दुनिया रोज़ बदलती है’, वीरेन डंगवाल का कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में’, विष्णु खरे का कविता संग्रह ‘लालटेन जलाना’, असद ज़ैदी का कविता संग्रह ‘सामान की तलाश’, और मेरी टाइलर की आपबीती ‘भारतीय जेलों में पांच साल’ (1977: मूल अंगरेज़ी से हिंदी अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा)। ये किताबें आज भी तरोताज़ा हैं।

मैंने अंगरेज़ी में सुजाता गिडला व मलिका अमर शेख की संस्मरण पुस्तकें, मीना कंदासामी का उपन्यास और तेरेसा रहमान की आख्यानमूलक इतिहास किताब पढ़ी। किताबें और भी हैं, लेकिन फ़िलहाल इतना ही!

(अजय सिंह कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)








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