कांकेर में बॉक्साइट बना सैकड़ों गांवों के आदिवासियों के लिए अभिशाप

कड़वा सच , , रविवार , 07-04-2019


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तामेश्वर सिन्हा

छत्तीसगढ़/ कांकेर। "मैं यहां जो महुवा सूखा रही हूं इसके नीचे लाल पत्थर है। वो दूर-दूर तक लाल-लाल पत्थर है। इसको खोदेंगे पहले भी खोदे हैं। मैं नहीं छोडूंगी अपना घर, मेरा देव यहां है। मै कैसे छोड़ूंगी? हटाएंगे तब भी नहीं हटूंगी! पूरा लाल जमीन है, पत्थर है मेरे घर के नीचे भी, इसी से कभी- कभी घर में पोताई कर लेती हूं।" उत्तर बस्तर के कांकेर शहर से तीस किमी की दूरी पर एक पहाड़ी पर स्थित गांव बुधियारमारी की महिला बुधनी ये बता रही थी।

बस्तर में रिपोर्टिंग के दौरान एक ऐसे ही गांव जाना हुआ जहां पूरा गांव पलायन कर पहाड़ी के नीचे बस चुका है। उस पहाड़ी में मात्र तीन घर बचे हुए थे। वो भी एक ही परिवार के लोग निवासरत थे। कुछ सुअर इधर-उधर चर रहे थे, मुर्गियां चूजों को लेकर दाना चुन रही थी।बुधियारमारी के पहाड़ी में बसे तीन घरों की मुखिया प्राकृतिक वन संपदा महुआ बिन कर अभी लौटी थी और उसे जमीन में सुखाते यह बात कह रही थी। 

उसके लाल पत्थर जमीन,खोदना बार-बार दोहराने से मन मे जिज्ञासा उत्पन्न हो गई थी कि ये आखिर लाल जमीन पत्थर है क्या? जिसको लेकर वह महिला अपना जमीन न छोड़ने की बात कह रही है। उसके घर से निकल कर मैंने जमीन को फिर देखा, पता चला वो तो बॉक्साइट है।और उसका घर उसी के ऊपर है। जो परिवार पलायन कर चुके हैं, उनके भी घर उसी बॉक्साइड के ऊपर रहे होंगे। 

कांकेर से बुधियारमारी जंगलों और घाटियों से होकर जाना होता है। रास्ते में बड़ी-बड़ी गाड़ियां सड़क निर्माण में लगी हुई थी। पेड़ों को काट कर, घाटी के पत्थरों को तोड़ कर रास्ता बनाया जा रहा था। एक समय लगा ग्रामीणों के आवागमन के लिए रास्ते बनाए जा रहे हैं। अंदर बीहड़ों में सड़के बन रही हैं। लेकिन जब रास्ते में रुके तो, एक ग्रामीण दशरू से पानी मांगने पर मैंने पूछा- अब तो मस्त सड़क बन रहा है? ग्रामीण ने सीधे जवाब दिया- "गाड़ी ही नहीं है तो कहां चलाबो"। उस ग्रामीण के कहने का अर्थ था कि उसके पास गाड़ी नहीं है तो इस नए सड़क का उसके लिए क्या इस्तेमाल है। वो तो जंगल वाले रास्ते से शार्ट कट मार के पहुंच जाता है। 

अब जब बुधियारमारी पहुंच कर उस महिला से बात कर रहे थे तो पता चला यह पूरा क्षेत्र बॉक्साइट से परिपूर्ण है। हालांकि बॉक्साइट खनन कार्य अभी नहीं हो रहा है, न किसी को ठेका दिया गया है। लेकिन एक नजर में प्रतीत हो रहा था कि ये विकास का रास्ता कहीं ग्रामीणों के विस्थापन से गुजर कर बॉक्साइट तक पहुंचने के लिए तो नहीं है।

क्षेत्र में वन अधिकार पर कार्यरत समाजिक कार्यकर्ता केशव शोरी कहते हैं, "10 से 15 साल पहले बुधियारमारी में बॉक्साइट खनन का ठेके पर कार्य किया जा रहा था। जो पहाड़ी के दूसरे तरफ उसेली गांव से होकर परिवहन किया जा रहा था। पहले इस गांव में बहुत से घर थे। अचानक सब धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे और गांव वीरान हो गया। अब वहां तीन घर ही शेष हैं जो एक ही परिवार के लोगों के हैं।"

बुधियारमारी की आदिवासी महिला बुधनी बोलती है- “गांव लोग नीचे जा कर टोडामरका नामक एक गांव में बस गए हैं। एक-एक कर सब नीचे चले गए। यहां पानी भी नहीं है वो जंगल में 2 किमी दूर एक झरना है, वहीं से पानी लाती हूं मैं, नहीं यहीं रहूंगी।” 

बुधियारमारी गांव छोड़कर लगभग 30 परिवार टोडामरका गांव में बस चुके हैं। जो मुरागांव पंचायत के अधीन आता है। मुरागांव पंचायत के अधीन बुधियारमारी गांव भी आता है।लेकिन बुधियारमारी गांव विकास के लिए आया पैसा मुरागांव में लगाया जाता है। बुधियारमारी में बनाए जाने वाला स्कूल मुरागांव में बनाया गया, बुधियारमारी में बनाए जाने वाला नल मुरागांव में बनाया गया। सरकार यह भूल गई कि जिस बुधियारमारी से बॉक्साइट निकाल रहे थे या निकालेंगे वहां ग्रामीणों की जरूरत की बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं?

बुधियारमारी में 1986 के करीब ठेके से बॉक्साइट निकाला जा रहा है, कांकेर से आमाबेड़ा मार्ग में उसेली गांव के सड़क से परिवाहन किया जा रहा था। उसी साल से बुधियारमारी के ग्रामीण पलायन कर नीचे आना शुरू कर दिए। 2 साल ठेके से लगातार बुधियारमारी में बॉक्साइट निकालने के दौरान उस क्षेत्र में नक्सलियों की धमक चालू हुई। नक्सली बुधियारमारी में बॉक्साइट खदान बिल्कुल नहीं चाहते थे। 5 साल लगातार बॉक्साइट दोहन के बाद नक्सली गतिविधियों के चलते ठेकेदार काम छोड़ के भाग गया। 

बुधियारमारी पहाड़ी के नीचे बसा भैसगांव की पहाड़ी में भी बॉक्साइट है। भैंसगांव में बसे रमाकुमार बताते हैं कि, “हमर लाइका मन ह नक्सलाइट नाम सुने है, हमन तो बाप जन्म जानत घलो नही रेहेन।” वह छत्तीसगढ़ी में कह रहा था -उस समय नक्सली नहीं थे नक्सलियों के बारे में सुना भी नहीं था।10 साल पहले अचानक चहल-पहल बढ़ी, फिर अचानक पता चला कि सबसे ऊंचे पहाड़ी पर स्थित बुधियारमारी में बॉक्साइट खदान खुल रहा है। पहले खदान शुरू हुआ, बाद में नक्सली आए। रमाकुमार आगे कहते हैं कि खदान खुलना अभिशाप हो गया बुधियारमारी उझड़ गया। 

इसके बाद प्रशासन के लोगों का आना जाना भी बन्द हो गया और राशन पानी के लिए बहुत दिक्कत होने लगा। अब उस क्षेत्र में नक्सलियों की किसी प्रकार की मौजूदगी नहीं है।ग्रामीण खुद कहते हैं कि पिछले 6 सालों से नक्सली इस क्षेत्र में नहीं हैं।   

सोचनीय है कि सरकार जब 1986 के करीब पहाड़ से बॉक्साइट परिवहन के लिए सड़क निर्माण कर सकती है। वो गांव वालों के लिए पानी,स्कूल अस्पताल नहीं दे पाई थी, जो अब भी नहीं दे पाई है। ग्रामीणों को विकास के नाम पर सड़क दिया जा रहा है जो बॉक्साइट उत्खनन करने को लेकर संदेह के दायरे में आता है?

सरकारी रिकॉर्ड में बुधियारमारी गांव और जमीन के बॉक्साइट को कोंडागांव जिले के केशकाल में बताया गया है। यही नहीं आस-पास लगातार अवैध तरीके से बॉक्साइट खोदा गया है। जिसके गड्ढे वाले निशान अब भी जिंदा हैं। बुधियारमारी पहाड़ी से निचे उतरने पर 3 किमी चलने के बाद मुरागांव आता है। गांव में ही एक समय मे बॉक्साइट डंपिग यार्ड बनाया गया था, जो अब भी वहां मौजूद है। 

क्षेत्र में आदिवासी युवा प्रभाग से काम कर रहे योगेश नरेटी बताते हैं "बस्तर के केशकाल ब्लाक का कुएमारी पहाड़ी से लेकर बुधियारमारी पहाड़ी तक बॉक्साइट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह पूरा पहाड़ी बेल्ट बॉक्साइट से भरा है। बीते सालों में कुएमारी से भी बॉक्साइट उत्तखनन किया जा रहा था। योगेश आगे बताते है कुए और मारी गोंडी शब्द है जिसका अर्थ ही टीला में सम्पन्नता है। शायद क्षेत्र के बुजुर्गों को पहले से मालूम था कि यह अमूल्य चीज है इसीलिए ऐसा नाम रखा हो। 

बुधियारमारी से लौटते हुए टोंडामरका पहुंचे। वहां हाल ही के दिनों में जेल से रिहा हुए एक ग्रामीण से मुलाकात हुई। ग्रामीण के जेल जाने का कारण नक्सल संपर्क था। वह बुधियारमारी गांव का मुखिया भी है। वह कहता है कि "मैं जेल क्यों गया था इसका पता एक साल बाद चला, मुझे अंदर वालों से संपर्क रखने के कारण जेल भेजा गया था। पांच साल बाद अभी छूटा हूं। जब मैं छोटा था तभी बुधियारमारी से नीचे उतर गए थे। उस समय बॉक्साइट निकालने वाला ठेकेदार कहता था तुम्हारे घर के अंदर-अंदर से पाइप डाल के निकालेंगे जिससे घर भसक जाएगा।

उसी समय मेरे बाप दादा उसी समय नीचे आ गए, अब सब यहीं बस गए हैं। वहां हमारे परिवार का राजस्व का पट्टा था, यहां वन अधिकार वाला है 3 एकड़ का मिला है। मेरे बच्चे को बंटवारा में क्या मिलेगा समझ में नहीं आता।" मुखिया आगे बताता है यह पानी है स्कूल भी है लेकिन बुधियारमारी में कुछ भी नही था। मुखिया आगे कहता है बुधियारमारी में खेती भी है हम खेती करने वहीं जाते हैं। 

टोडामरका में ही रैमी बाई से मुलाकात हुई। वो कहती हैं,"हम बुधियारमारी छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन मजबूरी भी था वहां पानी नहीं था। मैं अपने बच्चों को पढ़ाना भी चाहती थी स्कूल नहीं था। क्या करते इसीलिए नीचे आ गए।" 

आपको बता दूं कि गांव आदिवासी संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण होता है। लेकिन सरकार आदिवासी संस्कृति से जुड़ी भावनाओं को उजाड़ने में उफ तक नहीं करती है।आज उस क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य जोरों पर चल रहा है,लेकिन क्षेत्र के युवा कहते हैं कि सड़क बॉक्साइट के लिए है! खैर बुधियारमारी से नीचे आ चुके 30 गांव के ग्रामीण अब बुधियारमारी को भुलाने की कोशिश कर रहे हैं। मुरागांव-टोडामरका और आस-पास जहां बक्साइट है, पास के खसगांव में मेला जाने की तैयारी में लगे हुए थे। सभी ग्रामीण मेला चले गए और हम वापस हो गए। 

 

 








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Samnath Kashyap piplawand :: - 04-08-2019
Vilas ke name par khanij lutane ka paka irada hai .

Samnath Kashyap piplawand :: - 04-07-2019
Danywad