कोबरापोस्ट फेम डीएचएफसीएल आडिटिंग डिटर्जेंट में धुल-पुछ कर फिर आ गयी बाजार में

पड़ताल , , शनिवार , 09-03-2019


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जनचौक ब्यूरो

मुंबई। मुंबई में दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी कि डीएचएफसीएल है। कुछ दिन पहले इनवेस्टिगेटिव पत्रकारिता करने वाली वेबसाइट कोबरापोस्ट ने खुलासा किया था कि दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड से जुड़ा रियल स्टेट कंपनियों का एक ग्रुप खुलेआम भारतीय जनता पार्टी को चंदा देता रहा है। पिछले दिनों स्टिंग ऑपरेशन करने वाली वेबसाइट कोबरा पोस्ट ने “दि एनॉटमी ऑफ इंडियाज बिगेस्ट स्कैम” जारी की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड के साथ काम करने वाली कंपनियां -जिनमें आरके डब्ल्यू डेवलपर्स, स्किल रिलेटर्स और दर्शन डेवलपर्स हैं, ये सारी की सारी शेल कंपनियां हैं और संदिग्ध कंपनियां हैं और इन्होंने 31000 करोड़ का घोटाला किया है। कोबरापोस्ट ने ये भी दावा किया था कि 2014 और 2017 के बीच इन कंपनियों ने कथित तौर पर बीजेपी को 20 करोड़ का चंदा दिया है। रिपोर्ट में प्लेसिड नोरोन्हा और भगवत शर्मा के नामों का जिक्र है। ये दोनों डीएचएफसीएल के प्रमोटर्स हैं और इनका नाम आरकेडब्ल्यू के प्रमोटर्स के तौर पर भी लिस्टेड है। डीएचएफसीएल के मुख्य प्रमोटर्स कपिल वाधवान, अरुणा वाधवान और धीरज वाधवान हैं। नोरोन्हा और धीरज आरकेडब्ल्यू डेवलपर्स और दर्शन डेवलपर्स के भी डायरेक्टर हैं।

इसमें से अधिकतर बातें आप सभी जानते होंगे। बहरहाल, कोबरापोस्ट के ऑपरेशन एनॉटमी के बाद बाजार में डीएचएफएल की हालत खराब हो गई। पिछले महीने यानी कि फरवरी में इसके सीईओ हर्षिल मेहता भी इस कंपनी को छोड़कर चले गए। डीएचएफएल भारत में होम लोन देने वाली दूसरी सबसे बड़ी कंपनी मानी जाती है। आगे की खबर ये है कि कोबरापोस्ट के इस खुलासे के बाद कंपनी को और भी बुरे दिन देखने पड़े। शेयर बाजार में कंपनी के शेयर लगातार गिरते गए और इस महीने की चार मार्च तक कंपनी की हालत ये हुई कि मार्केट में इसे कोई उधार देने को तैयार नहीं था। हो सकता है कि इस खुलासे के बाद लोगों को लगा कि उनका पैसा यहां फंस सकता है।

इसी बीच हमने राफेल की वो ऑडिट रिपोर्ट भी देखी जो कैग ने बनाई थी। हमने देखा कि कैसे एबीसीडी लिखकर सब कुछ सही बता दिया गया। हमने देखा कि ऑडिट करने और ऑडिट रिपोर्ट बनाने के बीच कितना बड़ा फासला होता है। जाहिर है कि ये खबर हर किसी ने देखी थी। कोबरापोस्ट के खुलासे के बाद अब लगता है कि डीएचएफएल के मालिक कपिल वाधवान ने मोदी जी से ही इसकी प्रेरणा ली और एक इंडिपेंडेंट ऑडिटिंग फर्म से इन आरोपों की ऑडिटिंग कराई। इस ऑडिटिंग का रिजल्ट और राफेल वाली ऑडिटिंग का रिजल्ट आश्चर्यजनक रूप से लगभग लगभग एक ही है। एक ही है का मतलब इन दोनों का नेचर एक जैसा है, बरताव एक जैसा है। इससे पहले कि हम राफेल की राह पर उड़ान भर चुके इन ऑडिटिंग रिजल्ट्स को जानें, फटाफट ये जान लेते हैं कि द एनॉटमी ऑफ इंडियाज बिगेस्ट स्कैम असल में है क्या। 

कोबरापोस्ट की रिपोर्ट बताती है कि बीजेपी ने चुनाव आयोग को अपनी घोषणा में बताया है कि आरकेडब्ल्यू, दर्शन और स्किल रिलेटर्स ने पार्टी को 2014-17 के बीच 20 करोड़ रुपए का चंदा दिया है। ये सीधे सीधे कंपनी कानून 2013 के अनुच्छेद 182 का उल्लंघन है। कंपनी कानून का अनुच्छेद 182, कंपनियों द्वारा राजनीतिक पार्टियों को दिए जाने वाले चंदे के निषेध और प्रतिबंध से जुड़ा है। इसके मुताबिक किसी कंपनी ने पिछले तीन वित्त वर्षों में जो कमाई की है उससे हुए विशुद्ध फायदे का 7.5 प्रतिशत ही चंदे के रूप में दे सकती है। कोबरापोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक आरकेडब्ल्यू डेवलपर्स ने बीजेपी को 2014-15 में 10 करोड़ की रकम दी। ये रकम कंपनी को 2012-13 में हुए 25 लाख के घाटे के बावजूद दी गई। वहीं, कंपनी ने अगले तीन सालों में महज 18 लाख का शुद्ध मुनाफा दिखाया था।

एनॉटमी ऑफ इंडियाज बिगेस्ट स्कैम में ये भी दावा किया गया है कि स्किल रिलेटर्स ने 2014-15 में बीजेपी को 2 करोड़ दिए हैं। ये रकम बावजूद इसके दी गई है कि उस साल कंपनी ने महज 27000 रुपये का फायदा दिखाया था और इस हिसाब से कंपनी औसतन 4500 रुपये के करीब का अमाउंट चंदे में दे सकती है, जैसा कि कंपनी लॉ में लिखा हुआ है। दर्शन डेवलपर्स ने 2016-17 में फिर से 7।5 करोड़ रुपए का दान दिया और दान देते वक्त बिलकुल भी नहीं सोचा गया कि ये दान इंडियन कंपनीज लॉ को तोड़कर टुकड़े टुकड़े कर देती है। कंपनी ने 2013-14 में 5।13 लाख और 2014-15 में 4650 रुपए के घाटे दिखाए थे। हालांकि, 2016-17 में इसे 2।83 लाख रुपए का फायदा हुआ था। एनॉटमी ऑफ इंडियाज बिगेस्ट स्कैम का दावा है कि इसने जो दान दिया है वो साफ तौर पर कंपनी कानून का उल्लंघन करता है।

मैगजीन कारवां की रिपोर्ट है कि कंपनी कानून के अनुच्छेद 182 के मुताबिक हर कंपनी को “इसके फायदे और घाटे के अलावा ये साफ करना होता है कि इसने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है” और इसे “कुल रकम की डिटेल और चंदा पाने वाली पार्टी का नाम” भी बताना होता है। लेकिन आरके डब्ल्यू डेवलपर्स, स्किल रिलेटर्स और दर्शन डेवलपर्स में से किसी भी कंपनी ने अपने बैलेंस शीट में चंदे की जानकारी नहीं दी है। कंपनी कानून को तोड़ने पर जितना चंदा दिया गया है जुर्माने के तौर पर उसका पांच गुना वसूला जा सकता है। इसके अलावा कंपनी लॉ को तोड़ने वाला कंपनी का हर अधिकारी छह महीने की जेल की सजा भी काट सकता है।

डीएचएफसीएल नेशनल हाउसिंग बैंक के साथ रजिस्टर्ड है। ये पूरी तरह से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की सहायक है, जो भारतीय के हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों को रेग्युलेट करती है। ये ऐसी कंपनियां होती हैं जो मुख्य तौर पर उनको लोन देती हैं जो झुग्गियों का पुनर्वास, हाउसिंग डेवलपमेंट और बाकी के रियल स्टेट का धंधा करते हैं। दीवान हाउसिंग फाइनेंस कंपनी सन 1984 में अस्तित्व में आई और सन 2017-18 में इसकी नेट वर्थ यानी कुल मूल्य 8,795 रुपए की थी।  एनॉटमी ऑफ इंडियाज बिगेस्ट स्कैम का दावा है कि कंपनी ने अपने प्रमोटर्स के मालिकाना हक वाली कंपनियों को इस रकम से 10 गुणा ज्यादा बड़ी रकम लोन में दे दी। ये रकम कंपनी ने खुद लोन के तौर पर जुटाई थी।

मैगजीन कारवां की रिपोर्ट है कि इसके लिए लंबा गेम खेला गया और ये सब यूं ही एक दिन में नहीं हो गया। दरअसल डीएचएफसीएल और इसके प्राथमिक प्रमोटरों ने कथित तौर पर कई शेल कंपनिया बनाईं जिनकी अधिकृत पूंजी एक लाख तक थी। कोबरापोस्ट की जांच की जद में ऐसी 45 कंपनियां आईं जिन्हें 14282 करोड़ का लोन दिया गया है। इसमें 10493 करोड़ का ऐसा लोन भी शामिल है जो सिक्योर्ड नहीं है। इसे डीएचएफसीएल ने 34 शेल कंपनियों को दिया है जो वाधवां ग्रुप से जुड़ी हैं। बाकी 11 कंपनियां सहारा ग्रुप का हिस्सा हैं।

एनॉटमी ऑफ इंडियाज बिगेस्ट स्कैम के मुताबिक इन कंपनियों की मेल आईडी और रजिस्टर्ड एड्रेस भी एक ही है और डायरेक्टरों की शुरुआती लिस्ट में भी एक ही जैसे नाम हैं। और तो और, कई जगहों पर तो इनके फाइनेंशियल ऑडिटर्स भी एक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, बावजूद इसके दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बिना किसी सिक्योरिटी के इन कंपनियों को लोन की बड़ी रकम दी है। डीएचएफसीएल के प्रमोटर्स कपिल और धीरज कंपनी के फाइनेंस कमेटी के सदस्य भी हैं। ये कमेटी ही 200 करोड़ से ऊपर के लोन जारी करती है। दावा ये भी है कि इन दो प्रमोटरों ने कमेटी में अपनी स्पेशल पोजीशन का फायदा इस चीज को तय करने में उठाया है कि वो जिस कंपनी को चाहें उसे ही लोन मिले।

ये पैसे ज्यादातर मौकों पर एक किश्त में दिए गए हैं। एक किश्त पर पैसे दिए जाना उस नियम का उल्लंघन है जिसके तहत किसी प्रोजेक्ट में हो रहे काम के विकास के हिसाब से किश्तों में पैसे दिए जाते हैं। इसे ऐसे समझिये की होम लोन का जितना भी अमाउंट पास होता है, वो एक साथ इसीलिए नहीं मिलता, बल्कि जैसे जैसे बिल्डर घर बनाता जाता है, बैंक वैसे वैसे ही लोन की किश्त रिलीज करता जाता है। रिपोर्ट का दावा है कि कई कंपनियों ने बदले में इस लोन का इस्तेमाल डीएचएफसीएल के मालिकाना हक वाली कंपनियों के शेयर खरीदने में किया है। कोबरापोस्ट का दावा है कि उसके पास ऐसे दस्तावेज हैं जिससे पता चलता है कि लोन के सहारे इसे लेने वालों ने देश विदेश में संपत्ति भी खरीदी है। ज्यादातर शेल कंपनियों ने ये जानकारी छुपाई है कि उन्हें लोन देने वाला डीएचएफसीएल है। लोन देने और इसे लौटाने से जुड़ी जानकारी भी गायब है।

रिपोर्ट में आरोप है कि इस घोटाले को छुपाने के लिए महाराष्ट्र में झुग्गी विकास कार्यक्रम को फंड करने जैसी बातों का सहारा लिया गया । ऐसा करने वाली कंपनियों में वामिका रियल स्टेट और पृथ्वी रेसिडेंसी के नाम शामिल हैं। दोनों को ही कथित तौर पर 485-485 करोड़ की रकम मिली है। कायथा रियल स्टेट को 475 करोड़ और रिप डेवलपर्स को कथित तौर पर 725 करोड़ मिले हैं। रिपोर्ट का दावा है कि महाराष्ट्र के झुग्गी पुनर्वास प्राधिकरण के पास इनमें से किसी कंपनी ने अपने प्रोजक्ट का जिक्र नहीं किया है। यह भी खुलासा हुआ है कि डीएचएफसीएल ने शेल कंपनियों को गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले 1,160 करोड़ रुपए की ये रकम दी है। रिपोर्ट का दावा है कि इनमें से ज्यादातर प्रोजेक्ट्स या तो रोक दिए गए हैं या स्थगित कर दिए गए हैं और लोन एनपीए का रूप ले रहे हैं।

रिपोर्ट का दावा है कि अपने संदिग्ध लेन-देन से डीएचएफसीएल और वाधवा ग्रुप ने मिलकर शेल कंपनियां बनाईं और सेबी की जानकारी साझा करने से जुड़े नियम, जोखिम-प्रबंधन दिशा-निर्देश, एनएचबी के निर्देश, कॉरपोरेट गवर्नेंस के मानदंडों और फेमा का उल्लंघन किया है। अगर डीएचएफसीएल “बैड लोन” का हवाला देकर डूब जाती है तो वो पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर बैंक मुश्किल में आ जाएंगे जिन्होंने इसे लोन दिए हैं। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि छोटी शेल कंपनियों के पास ना तो इतने पैसे होंगे और ना ही ऐसी संपत्ति कि फिर जिसे गारंटी के तौर पर दिखाया जा सके। उनके किसी एसेट पर भी लोन वापसी तक रोक नहीं लगाई जा सकेगी क्योंकि उनके पास ऐसा कुछ होगा ही नहीं।

कोबरापोस्ट के इस खुलासे के बाद कंपनी के शेयर गिरने शुरू हो गए। फरवरी 2019 यानी कि खुलासे के बाद इसके सीईओ हर्षिल मेहता ने भी इस्तीफा दे दिया। हालांकि इसके पीछे उन्होंने व्यक्तिगत दिक्कतों का हवाला दिया। इसी महीने की शुरुआत में चार मार्च को बिजनेस स्टैंडर्ड ने खबर दी कि डीएचएफएल की क्रेडिट रेटिंग भी गिर गई है। चूंकि इस कंपनी ने बैंकों से कैश लेकर उसे फर्जी कंपनियों को लोन के रूप में दे दिया और कोबरापोस्ट के मुताबिक ये पैसा सीधे बीजेपी के खाते में गया। इसी बीच कंपनी के मालिक कपिल वाधवान ने चाटर्ड अकाउंटेंटों की एक प्राइवेट फर्म पकड़ी और उससे कोबरापोस्ट के आरोपों के हिसाब से कंपनी की ऑडिटिंग कराई। अभी तक कंपनी ने ये खुलासा नहीं किया है कि उसने कोबरापोस्ट के कौन-कौन से आरोपों की ऑडिटिंग कराई है, लेकिन इस ऑडिटिंग में जैसा कि पहले से ही एकदम राफेल मामले की ही तरह क्लीन चिट का मिलना तय माना जा रहा था, तो डीएचएफएल को थोड़ा सा संदेह जारी करते हुए क्लीन चिट दे दी गई है। 

डीएचएफएल ने ये ऑडिटिंग मुंबई की टीपी ओस्तवाल एंड एसोसिएट्स एलएलपी ने की है। इस फर्म में कुल छह लोग पार्टनर हैं और सभी छहों लोग पेशे से चाटर्ड अकाउंटेंट हैं और नेशनल से लेकर इंटरनेशनल टैक्सों के हिसाब किताब में विशेष महारत रखते हैं। टीपी ओस्तवाल इसके मैनेजिंग पार्टनर हैं जो कि केंद्र सरकार में कई अहम कमेटियों में सदस्य भी रहे हैं। ऑडिटर साहब ने डीएचएफएल को क्लीन चिट तो दे दी है, लेकिन कंपनी को क्लीन चिट मिलती हुई दिख नहीं रही है। दरअसल इस ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन चार कंपनियों को झुग्गी पुनर्वास के लिए कर्ज दिया गया था, उससे दूसरी रियल इस्टेट कंपनी के शेयर खरीद लिए गए। और जिसने लोन दिया वह भी कपिल वाधवान की कंपनी थी और उनपर आरोप था कि उन्होंने चार शेल कंपनियों को लोन दिया। ऑडिटर साहब ने कहा है कि नहीं, चार शेल कंपनियों को लोन नहीं दिया गया, बल्कि उन्होंने अपनी ही कंपनी को लोन देकर अपनी ही दूसरी कंपनी के शेयर खरीद डाले। कपिल की ये जो अपनी कंपनी है, उसका नाम दर्शन डेवलपर्स है और ये भी एक तीसरी कंपनी की कंपनी है जिसका नाम कायटा एडवाइजर्स है। इन तीनों कंपनियों के प्रमोटर कपिल वाधवान हैं और इनके रजिस्टर्ड एड्रेस यानी तीनों के पते भी एक ही हैं। 

ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि डीएचएफएल ने नोशन रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड, ईयरलीन रियल एस्टेट डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, प्राशुल रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड, एडवीना रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड को एसआरए डेवलपमेंट के लिए परियोजना कर्ज के तौर पर 2,000 करोड़ रुपये दे दिए। लेकिन फिर से इस पैसे का इस्तेमाल वाधवान साहब ने अपनी कंपनी कायटा से अपनी ही कंपनी दर्शन के शेयर खरीदने में किया।

बिजनेस स्टैंडर्ड की सात मार्च की खबर है कि डीएचएफएल की ऑडिट रिपोर्ट में माना गया है, दर्शन डेवलपर्स के शेयरों में हेरफेर हुई थी और मुमकिन है कि चार कंपनियों को दी गई उधारी में से 1,424.16 करोड़ रुपये में कायटा एडवाइजर्स से दर्शन डेवलपर्स का शेयर खरीदा और  299.28 करोड़ रुपये की दूसरी सीक्योरिटीज खरीद डालीं। अपनी पोजीशन का फायदा उठाने के बारे में कोबरापोस्ट के आरोप ऑडिटर्स रिपोर्ट में सही पाए गए हैं। ऑडिटर की रिपोर्ट में कहा गया है कि कपिल वधावन, धीरज वधावन और एक स्वतंत्र निदेशक वाली वित्त समिति ने 200 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज एलॉट किया। रिपोर्ट में माना गया है कि ये लोग जो दो सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का लोन एलॉट किया करते थे, उस प्रॉसेस में इनका बड़ा इम्पैक्ट हो सकता है। कोबरापोस्ट ने कहा था कि प्रमोटस डायरेक्टर्स का इस प्रॉसेस पर इम्पैक्ट यानी कि प्रभाव है। 

न्यूज पोर्टल ने आरोप लगाया था कि डीएचएफएल के प्रमोटर्स ने शेल कंपनियों का इस्तेमाल रकम की हेराफेरी में किया। टीपी ओस्तवाल एंड एसोसिएट्स की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी या इसके मालिक ने न तो 26 शेल कंपनियों का प्रमोशन किया और न ही इन कंपनियों के निदेशक एकसमान हैं। लेकिन ऑडिट रिपोर्ट से अलग बात कोबरापोस्ट के ऑपरेशन की करें तो उसकी जांच के दायरे में कुल 45 कंपनियां थीं, जिनमें से कपिल एंड कंपनी की कुल 34 शेल कंपनियां थीं। बाकी की 11 कंपनियां सहारा ग्रुप की थीं। ऑडिटर्स रिपोर्ट बाकी की इन सभी कंपनियों पर खामोश है। ब्लूमबर्ग की इसी ऑडिटिंग रिपोर्ट की खबर में कहा गया है कि ऑडिटिंग फर्म ने कोबरापोस्ट के 64 में 39 आरोपों की ही ऑडिटिंग की है। 

इस ऑडिटिंग रिपोर्ट से हाल ही में आई राफेल की ऑडिटिंग रिपोर्ट की याद ताजा हो जाती है जिसमें आनन फानन में क्लीन चिट देने के लिए कैग ने इतनी गलतियां कर दीं कि आम आदमी तक उसपर उंगली उठाने लगा। इस ऑडिटिंग रिपोर्ट में भी कुछ एक छोटे मोटे आरोपों की जांच की गई है, जिनका कुल अमाउंट दो हजार करोड़ रुपये से ऊपर का नहीं है। कोबरापोस्ट के एनॉटमी ऑफ दि इंडियाज बिगेस्ट स्कैम में 31 हजार करोड़ रुपये के हेर-फेर का खुलासा किया गया था। अभी भी तकरीबन 29 हजार करोड़ रुपयों से अधिक का कोई हिसाब नहीं मिला है। इसी बीच इस ऑडिटिंग रिपोर्ट से मिली क्लीन चिट को कपिल एंड कंपनी ने भुनाना शुरू कर दिया है। इस बीच जब हम सभी भारत पाकिस्तान कर रहे थे, देश के खाते से 29 हजार करोड़ रुपये का हिसाब गायब हो गया है और जिस पर गायब करने के आरोप हैं, उसकी कंपनी के शेयर लगातार गिरने के बाद पहली बार 7 मार्च से बढ़ने शुरू हो चुके हैं। और हां, जिस पैसे का लेनदेन बतौर लोन हुआ है, उनमें से किसी ने किसी को कुछ वापस किया हो, इस ऑडिटिंग रिपोर्ट में उसका भी कोई जिक्र नहीं है। 

 

 








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