कांग्रेस घोषणापत्र: पुरानी भूलों को सुधारने की कवायद

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 04-04-2019


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मदन कोथुनियां

कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हुआ तो देश के मीडिया व सत्ताधारी पार्टी से लेकर कई आईटी सेल समूहों में एक बात जोर शोर से उठी है कि कांग्रेस राजद्रोह के केस की धारा 124A को खत्म करने जा रही है। कांग्रेस देशद्रोहियों के साथ है! इसी शोरगुल में कांग्रेस के घोषणापत्र की कई बातें छुप गईं जिसे नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है।

कांग्रेस पार्टी की तरफ से शिक्षा का बजट 6% करने की बात की गई है जो बहुत बड़े बदलाव की तरफ संकेत कर रहा है। अमूमन विकसित देशों का बजट 5%से ऊपर होता है। शिक्षित व विकसित नागरिकों से देश मजबूत होता है और उसके लिए सरकारी स्कूलों, कॉलेजों व शिक्षकों की व्यवस्था का इंतजाम करना एक बहुत बड़ा कदम है। ऐसे दौर में जब शिक्षा गरीबों के घरों से, सरकारी स्कूलों से निकलकर निजी कॉरपोरेट शिक्षा की दुकानों में सिमटने को बेताब हो और सरकार सार्वजनिक शिक्षा की तरफ वापस आये तो यह पूंजीवाद की नाकामियों का नमूना पेश करता है। कांग्रेस ने जो गलती की थी उसे स्वीकार किया है और खुद सुधार करना चाहती है। यह एक स्वागत योग्य कदम है।

कांग्रेस ने 5 करोड़ गरीब लोगों को हर महीने 6000 रुपये जीवनयापन के लिए देने का वादा किया है। एक परिवार में चार सदस्य माने जाएं तो लगभग 20करोड़ लोगों को सम्बल मिलेगा और भूख से निजात पाकर अपने बच्चों को स्कूल भेजने की हिम्मत जुटा पाएंगे। अशिक्षा व गरीबी का आपस मे गहरा संबंध है और कांग्रेस के घोषणापत्र की इन बातों को देखा जाए तो एक साथ अशिक्षा व गरीबी पर प्रहार करने की बात कही गई है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में अफ्सपा (Armed forces special power act) हटाने की बात कही है। दरअसल यह कानून में शक के आधार पर किसी को गिरफ्तार करने या गोली मारने की अनुमति देता है। यह ऐसे राज्यों में लागू है जहां अलगाववाद व स्वायत्तता की बातें ज्यादा उठ रही हैं। इस प्रावधान के तहत की गई कार्रवाई को बिना सेना की अनुमति के न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। यह कानून सैन्य हित में है और इसे हर हाल में जारी रखा जाए। ऐसे मामलों की भारतीय सेना खुद जांच करती है और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी करती है। गोली मारने के प्रावधान की जरूर समीक्षा की जानी चाहिए।

हकीकत में देखा जाए तो विभिन्न स्वरूपों में हर सरकारी विभाग के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए संबंधित  विभाग से अनुमति लेने के नियम हैं मगर हम सेना के नाम पर ज्यादा देशभक्ति के ढोंगी है इसलिए हम इस मुद्दे पर प्रैक्टिकल रूप से सोचना नहीं चाहते हैं। कांग्रेस को चाहिए कि हर विभाग से जांच के लिए पूर्वानुमति वाले कानूनों को खत्म करे। ऐसे कानून हटाने के चरण में सेना अंतिम सेक्शन हो।

कांग्रेस ने मनरेगा के रोजगार को 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन करने का वादा किया है। अच्छी बात है मगर मनरेगा की खामियों को दूर किया जाना चाहिए। मनरेगा का सबसे बुरा प्रभाव खेती के लागत मूल्य पर पड़ा है। 150 दिन खरीफ व रबी की फसलों के बीच का समय तय हो। उत्पादक कार्यों में श्रम खर्च किया जाए। इसको लचीला बनाकर ग्राम पंचायत स्तर पर श्रम की मांग के अनुरूप बदलाव की इजाजत दी जाए।

कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में 4 लाख से ज्यादा खाली पड़े सरकारी पदों को भरने की बात कही है। यह सरकारी तंत्र को विस्तार देने, मजबूत करने में महत्वपूर्ण कदम है। आउट सोर्सिंग व ठेकेदारी प्रथाओं द्वारा सरकारी सिस्टम को जिस तरह पिछले 20 सालों में ध्वस्त किया गया व सरकार पूंजीपतियों के लिए ही कार्य कर रही है, की छवि से बाहर आने की तरफ बड़ा कदम माना जा सकता है! सामाजिक न्याय अर्थात आरक्षण को निजीकरण के द्वारा खत्म करने का जो षड्यंत्र जारी था उसकी गति धीरे करने में मदद मिलेगी। निजी संस्थानों के खड़े होने को देश का विकास मानने के बजाय सार्वजनिक ढांचे को तवज्जो देना जनहित का कदम माना जाता है। निजी शोषण के अड्डों के दिहाड़ी मजदूर बनाने के बजाय स्वस्थ नागरिक बनाने का कार्य है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।

जिस प्रकार पिछले पांच साल की मोदी सरकार में सिर्फ चंद उद्योगपतियों के नाम  विकास  रूपी गूंज रहे थे और हर बुनियादी सुविधा बीमे के हवाले हो रही थी उससे जनता में बहुत बड़ा आक्रोश था जिसे कांग्रेस भांपने में सफल हुई है। बिना अस्पताल खोले प्रधानमंत्री जीवन आरोग्य योजना से देश स्वस्थ कैसे हो जायेगा? निजी अस्पतालों के आधे से ज्यादा बिस्तर अभी भी खाली पड़े रहते हैं मगर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित बिस्तरों पर गरीबों का इलाज नहीं किया जाता है। ऐसे में कोई कैसे मान लेगा कि लाखों के बिल बनाने वाले ये अस्पताल 1000-1200 रुपये से बीमित व्यक्ति को स्तरीय चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करा देंगे!

कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए मीडिया के दंश को महसूस किया है। जब आप सत्ता में होते हो और मीडिया आपकी वाहवाही करती है तो आप जनता की आवाज सुनने के रास्ते खो देते हो। आज जनता की आवाज कहीं खो गई है। इस चुनाव के माहौल को ही देख लिया जाए तो कोई भी टीवी चैनल जनता की बुनियादी जरूरतों को लेकर, मुद्दों को लेकर चर्चा नहीं कर रहा है। मीडिया का सत्ता के साथ मिलकर विपक्ष को खत्म करने का षड्यंत्र आज विपक्ष झेल रहा है। खुद के दर्द से ही सही कांग्रेस को याद तो आया कि मीडिया को ठिकाना बताना जरूरी है बाकी मजीठिया आयोग कब का बना हुआ पड़ा है मगर कांग्रेस ने इस तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया।

जब न्यूज़ 24 का मालिक कांग्रेस का राज्यसभा सांसद बना व कई अन्य चैनल के लोग कांग्रेस के टिकटों पर सांसद-मंत्री बने तब भी शरद यादव जी ने राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाया था मगर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के सिर पर जूं तक नहीं रेंगी थी! अब अम्बानी व सुभाष चंद्रा ने मीडिया पर लगभग कब्जा कर लिया तो कांग्रेस को इस बीमारी के परिणाम समझ मे आया है! जनता सदा विपक्ष होती है और अगर कांग्रेस को सत्ता देगी तो इस मुद्दे पर पैनी नजर भी रखेगी। अगर सोशल मीडिया न होता तो आज जनता की आवाज खामोश ही हो गई होती!

अंत मे आते हैं आईपीसी की धारा 124A पर। यह कानून औपनिवेशिक काल मे एक ब्रिटिश इतिहासकार ने 1837में ड्राफ्ट किया था और भारत मे अंग्रेज सरकार ने 1860 में इसे लागू किया था और पहली बार 1870 में बाल गंगाधर तिलक पर लगाया गया था। इस कानून की सजा महात्मा गांधी ने भी भुगती थी। इस कानून को हूबहू आजाद भारत की सरकार ने भी अपना लिया। हो सकता है उस समय कई रियासतों की नाराजगी के सुरों को दबाने के लिए अपना लिया गया हो मगर आज दुनिया के लोकतांत्रिक देशों ने इसे खत्म कर दिया है। यहां तक कि ब्रिटेन में भी यह कानून खत्म किया जा चुका है। भारत भी इस कानून को लेकर अन्तरराष्ट्रीय आलोचना का शिकार बनता रहा है।

सरकारों द्वारा 179 मुकदमे दर्ज किए गए और उनमें से 2 मुकदमे सही पाए गए बाकी मुकदमों में आरोपियों का बरी होना यह साबित करता है कि सत्ता ने राजनैतिक विरोधियों, उनकी आलोचना करने वालों व अपने हकों के लिए संवैधानिक मांग उठाने वालों की आवाज दबाने के लिए दुरुपयोग किया है। जिस कानून का इतने बड़े पैमाने पर राजनैतिक दुरुपयोग हो उस कानून की समीक्षा की जानी चाहिये या ऐसे कानून को खत्म करके नया व ज्यादा पारदर्शी कानून बनाया जाना चाहिए। कुडनकुलम परमाणु परियोजना का विरोध कर रहे 7000 हजार किसानों पर तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा इस कानून का उपयोग किया गया था जो कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता है।

सत्ता पक्ष भले ही पोलिटिकल माइलेज के लिए यह कहकर आलोचना करे कि कांग्रेस का हाथ देशद्रोहियों के साथ मगर सचाई यही है कि सरकार के पास पिछले पांच साल में किये कार्यों की कोई जमा पूंजी नहीं है इसलिए जनता को भावनाओं में बरगलाने की कोशिशें की जा रही हैं। कौन किसके साथ है इसका फैसला जनता खुद चुनावों में कर लेगी। सत्ता पक्ष का काम सिर्फ देशद्रोही घोषित करना, गद्दार घोषित करना ही रह गया है! मैं तो कहता हूं कि जो भी किसी समूह,जाति, धर्म ,संगठन को देशद्रोही/गद्दार बोले उसके पुख्ता इलाज का एक कानून जरूर बनना चाहिए व कांग्रेस अगर भूल गई है तो इसे घोषणा पत्र में सप्लीमेंट्री रूप में शामिल करना चाहिए!

हमारा काम जनता के सामने सचाई रखना है। भावनाओं के बीच बुनियादी मुद्दों की बहस कहीं खो न जाये इसलिए सावधान करने की कोशिश है। बाकी निर्णय जनता को अपने विवेक से करना है कि देश का विकास/नागरिकों का विकास भावनाओं से होता है या बुनियादी समस्याओं का समाधान खोजने से।

(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

 








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