चुनाव नतीजों के रूप में सामने आया किसानों का गुस्सा

पड़ताल , , बृहस्पतिवार , 13-12-2018


farmer-crisis-sansad-march-msp-swaminathan-modi-election

जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार ने दिखा दिया कि मोदी सरकार से किसान कितने नाराज थे। अब ये बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि किसानों के हितों की अनदेखी भाजपा को ले डूबी। किसान समस्याओं को लेकर आंदोलन करते रहे और मोदी सरकार पूंजीपतियों को खुश करने में लगी रही।

भाजपा के घोषणा पत्र में भले ही किसानों के भले की बातें लिखी थीं पर सरकार बनने के बाद भाजपा ये भी भूल गयी थी कि उसने ऐसा कोई वादा भी किसानों से किया था। ऊपर से साढ़े चार सालों के कार्यकाल में मोदी सरकार ने किसानों के लिए कुछ और हवाई घोषणाएं कर डालीं। 

घोषणापत्र में अगले छह साल में किसान की आमदनी दोगुनी करने की बात करने वाली भाजपा का ये वादा भी जुमला ही साबित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बात फरवरी 2016 में कही थी। यह समय वह था जब उनकी सरकार के तीन साल बचे थे। काम के नाम पर सरकार ने मात्र कमेटी ही बनाई, जिसने 14 खंड की बड़ी रिपोर्ट दी है। कड़वी सच्चाई यह है कि सरकार के पास किसानों की आमदनी दोगुनी करने की योजना कागज पर भी नहीं है और न ही बजट में इसके लिए एक पैसा अलग से दिया गया है।

2023 तक किसान की आमदनी दोगुनी करने के लिए किसान की आय 10.4 फीसदी की सालाना रफ्तार से बढ़नी चाहिए थी, जबकि मोदी सरकार के गत चार साल में किसानों की आय मात्र 2.2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ी है।

पार्टी ने किसानों के साथ कोई एक धोखा नहीं किया है। उसकी लंबी फेहरिस्त है। 2014 के आम चुनाव में किसानों की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर लागत पर 50 फीसद मुनाफा दिलवाने का वादा किया था। चुनाव जीतने के बाद वो इस वादे से भी मुकर गयी। सरकार ने फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे दिया कि लागत का दोगुना दाम दिया तो व्यापारियों को भारी नुकसान हो जाएगा। ये हलफनामा सरकार के असली चरित्र को उजागर करने के लिए काफी था। जिसने दिखा दिया कि उसे किसानों से ज्यादा व्यापारियों की चिंता है।

किसानों के साथ इससे बड़ी गद्दारी और क्या हो सकती है कि खुद को किसान का बेटा बताने वाले कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने यहा तक कह दिया कि सरकार ने किसानो का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का कोई वादा ही नहीं किया था। और झूठ बोलने की इस प्रक्रिया ने बीजेपी नेताओं शर्म लिहाज के सारे पर्दे भी हटा दिए थे। और फिर 2018 में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अचानक कह दिया कि उन्होंने अपने वादे पूरे कर दिए हैं।

और फिर जो चीज जमीन पर कभी नहीं उतरी उसे कागजों पर लागत की परिभाषा बदलकर पूरी कर दी गयी। इन सज्जन ने सम्पूर्ण की जगह आंशिक लागत पर दोगुना दाम घोषित कर दिया। उदाहरण के तौर पर भाजपा के वादे के अनुसार धान की फसल पर जो न्यूनतम मूल्य ₹ 2340 प्रति क्विंटल घोषित करना चाहिए था, वह सिर्फ ₹ 1750 प्रति क्विंटल घोषित किया गया।

फिर मोदी सरकार ने ऐतिहासिक बढ़ोतरी का डंका पूरे देश में पीटना शुरू कर दिया। जबकि ये सब कुछ महज ढकोसला था। दरअसल किसान को इस बढ़ोतरी के नाम पर कुछ नहीं मिला। मोदी सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने में पहले 4 साल में जो कंजूसी बरती बस उसकी भरपाई मात्र किया। वैसे भी यह समर्थन मूल्य ज्यादातर मंडियों में नहीं मिल रहा है। सरकार का वादा था कि मूंग ₹ 6975, बाजरा ₹ 1950, मक्का ₹ 1700, ज्वार ₹ 2430, सोयाबीन ₹ 3399, मूंगफली ₹ 4890, रागी ₹ 2897 और धान ₹ 1750 प्रति क्विंटल मिलेगा।

प्रधानमंत्री का ये दावा भी झूठा ही साबित हुआ। जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार ने कृषि पर पिछली सरकार की तुलना में दोगुना खर्च कर दिया है। दरअसल गत सरकारों की तरह ही मोदी सरकार ने भी बजट का सिर्फ 2 फीसदी और जीडीपी का 0.3 फीसदी कृषि पर खर्च किया। यूपीए सरकार ने अंतिम दो वर्षों में बजट का 2.1 फीसदी और जीडीपी का 2.0 फीसदी खर्च कृषि पर किया था तो मोदी सरकार ने इसे पहले साल में घटाकर 1.9 फीसदी कर दिया। उसके बाद के वर्षों में 2.0, 2.3 और इसके अगले साल भी 2.3 और इस वर्ष 2.4 कर दिया।

इस सरकार में मात्र इतना हुआ है कि कृषि लोन पर सब्सिडी को वित्त मंत्रालय के बजट से निकालकर कृषि मंत्रालय के बजट में डाल दिया गया। और ये लोग किसानों को यह कहकर बरगला रहे थे कि उन्होंने कृषि के बजट को बढ़ा दिया। और ये कटौती भी की गयी किसानों के ही एक दूसरे मद से। जिसके तहत राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का बजट 8,443 करोड़ रुपये से घटाकर 3,600 कर दिया गया।

मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को ऐतिहासिक बताते हुए किसानों के लिए रामबाण बताया था, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि पिछले 30 साल से चली आ रही फसल बीमा योजना का यह नया संस्करण मात्र है। और अब इसे एक बड़ा घोटाला करार दिया जा रहा है।

क्योंकि यह योजना बीमा कंपनियों के लाभ की योजना साबित हुई है। मोदी सरकार में फसल बीमा योजना का सरकारी खर्च 450 फीसदी बढ़ा है, जबकि लाभान्वित होने वाले किसान 10 फीसदी भी नहीं बढ़े। योजना लागू होने पर किसानों को मिलने वाला बीमा का क्लेम 21,608 करोड़ से घटकर 15,502 करोड़ हो गया है। बीमा कंपनियों को योजना लागू होने के पहले साल में 6,302 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ। जहां प्राकृतिक आपदा आई वहां भी कंपनियां मुनाफा कमा गईं। 2016 में उत्तर प्रदेश में 37,17 लाख किसानों ने बीमा कराया और खरीफ के मौसम में सूखे की मार झेल रहे इन किसानों में से सिर्फ 2,09 लाख यानी कि 6 फीसदी किसानों को ही मुआवजा मिला। बीमा कंपनी को 200 करोड़ का मुनाफा हुआ।

मोदी सरकार ने पिछली सरकारों की सिंचाई परियोजनाओं के अधूरे काम को पूरा कराने का जो दावा किया वह भी झूठ का पुलिंदा साबित हुआ। दरअसल अब तक सरकार ने न तो घोषित बजट को आवंटित किया है और न ही परियोजनाओं को पूरा करने का लक्ष्य हासिल किया है।

2019 तक त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के तहत 149 बड़ी और मझोली सिंचाई परियोजनाओं को पूरा होना था, पर वह सरकारी दावों में 50 फीसदी भी पूरी होने की ओर नहीं दिख रही है। घोषित 8,214 लघु सिंचाई परियोजना में से सिर्फ 849 का काम पूरा हुआ है। यानी कि 90 फीसद काम बाकी है। इस लघु सिंचाई परियोजना में 21 हजार 110 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है पर अब तक कैबिनेट ने सिर्फ 12 हजार करोड़ ही मंजूर किये हैं। तालाबों के जीर्णोद्धार के कार्यक्रम में पहले साल का लक्ष्य था 1.5 लाख हेक्टेयर, लेकिन पूरा हुआ 0.15 लाख हेक्टेयर ही।

प्रधानमंत्री नीम कोटेड यूरिया की योजना की शुरुआत किसान कल्याण के लिए बता रहे हैं जबकि नीम कोटेड यूरिया योजना की शुरुआत 2002 में की गई थी। मोदी सरकार से पहले यह योजना 35 फीसदी यूरिया उत्पादन पर लागू होती थी, अब वह सौ फीसदी कर दी गई है। इस योजना का उद्देश्य किसान को बचाना नहीं बल्कि सरकार के खर्चे को घटाना है। मिलावट खोर इसका इस्तेमाल दूध में करने लगे थे तो सरकार ने सोचा कि नीम कोटेड यूरिया से उत्पादन में कोई लाभ अब तक नहीं हुआ। खपत भी मामूली घटी। इसलिए यह भी नहीं पता चलता कि ऐसा करने से तस्करी घटी है या नहीं।

मोदी सरकार दावा करती रही है कि उसने पिछली सरकारों के मुकाबले प्रभावितों को बेहतर राहत और मुआवजा पहुंचाया। इसमें कितनी सच्चाई है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगातार दो साल के राष्ट्रव्यापी सूखे में मोदी सरकार ने बेरुखी ही दिखाई।

अदालत में साबित किया जा चुका है कि देश के 52 करोड़ लोग सूखे की चपेट में हैं और सरकार सूखा प्रबंधन संहिता का उल्लंघन कर रही है। सरकार के पास तो बुंदेलखंड में गांव व अन्य जानवरों के लिए पैदा हुई अकाल की स्थिति से निपटने की न्यूनतम व्यवस्था तक नहीं थी। मनरेगा के तहत जरूरी फंड नहीं दिया। सरकार बेरुखी और बदइंतजामी की दृष्टि से वह साठ के दशक के भयंकर सूखे के बाद देश का सबसे दारुन सूखा था।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कहा कि सूखे से निपटना उसकी जिम्मेवारी नहीं है। कोर्ट ने सरकार के शतुरमुर्ग रुख की आलोचना की फिर भी सरकार ने कोर्ट के आदेशों की अवहेलना की।

मोदी सरकार ने नोटबन्दी करने के पीछे तर्क दिया था कि उसने इसे भ्रष्टाचार कालाबाजारी, आतंकवाद और नकली नोट खत्म करने के लिए किया था। तो फिर क्या इस ओर कुछ खास सफलता हासिल हुई। परिणाम न के बराबर हैं। सरकारी संस्थाए और आंकड़े बता रहे हैं कि ये सब तो खत्म नहीं हुआ पर किसान की रीढ़ जरूर टूट गई। 8 नवंबर 2016 को जब आधी रात को नोटबन्दी का फैसला प्रधानमंत्री ने लिया तब किसानों की रबी की फसल की बुवाई का वक़्त था। खरीफ की फसल बाजार में किसान लेकर आया ही था कि उसके हाथ से पैसा गायब हो गया।

कृषि मंत्रालय ने खुद माना कि नोटबन्दी के काऱण बीज की बिक्री गिर गई। आलू के दाम रातों रात आधे हो गए। सहकारी और ग्रामीण बैंक, जिनके सर्वाधिक ग्राहक किसान थे, उनसे नोट बदलने का अधिकार छीन लिया गया। नोटबन्दी की मार आज भी किसान झेल रहा है। अब तक इसके काऱण फसलों के बाजार में मंदी चल रही है। 

यह अपने आप में हास्यास्पद है कि सरकार खेती की लागत कम कर किसान को यूरिया उपलब्ध कराने की बात कर रही है। दरअसल एक साल में डीएपी का दाम 280 रुपये और पोटाश का 350 से 400 रुपए प्रति बोरी बढ़ा। डीजल का दाम 57 रुपये प्रति लीटर से 75 रुपए प्रति लीटर हो गया। मोदी राज के दौरान दुनिया में कच्चे तेल की कीमत एक चौथाई घटी है लेकिन हमारे यहां डीजल की कीमत एक तिहाई बढ़ी है। मोदी सरकार ने खेती बाड़ी के उपकरणों पर जीएसटी लगा दी। खेती की लागत इतनी बढ़ी है कि गेहूं उगाने वाले किसान की खेती की लागत प्रति एकड़ 3 हजार रुपये बढ़ गई है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमने किसान को यूरिया उपलब्ध कराई मगर, 2018 में फिर से यूरिया की किल्लत जारी है।

मोदी सरकार का दावा है कि वह कृषि निर्यात को बढ़ाकर 7 लाख करोड़ करने वाली है। मोदी सरकार इस लक्ष्य की समय सीमा भी अपने कार्यकाल से परे 2023 को रखी है। वास्तव में मोदी राज में देश के कृषि निर्यात में हो रही बढ़ोतरी रुक गई है। आयात के मुकाबले में निर्यात का सरप्लस 2013-14 में 1 लाख 69 हजार करोड़ था जो 2016-17 में घटकर 48 हजार करोड़ रह गया। 2013-14 में निर्यात 2 लाख 68 हजार करोड़ रुपये था और 2008 से वह उत्तरोत्तर बढ़ रहा था। वर्ष 2016-17 में निर्यात घटकर 2 लाख 33 हजार रुपये रह गया, जबकि आयात 1 लाख 85 हजार करोड़ हो गया । सरकार ने अपने किसानों से 50 रुपए प्रति किलो के भाव से दाल नहीं खरीदी। पर विदेश से 70 से 90 रुपये प्रति किलो  दाल की खरीद की।

गोरक्षा के नाम पर इस सरकार में बड़ा ड्रामा रहा। सरकार गोरक्षा के लिए बड़े कदम उठाने की बात कर रही है। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि गोरक्षा औऱ गोचर जमीन बचाने के लिए सरकार ने एक भी कदम नहीं उठाया। अगर हर साल 1 करोड़ गाय बैल को कटने से बचाना है तो सिर्फ चारे पर 10 हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा। पर इसका कोई बजट ही नहीं बनाया गया है। मोदी सरकार को गोरक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं है। दरअसल इसके जरिये वो हिंदू मुस्लिम झगड़ा करवाना चाहती है। गाय तो बची नहीं किसान जरूर तंग हो गया। आवारा पशुओं की समस्या अलग से खड़ी हो गई। गोरक्षा के आतंक के कारण पशु व्यापार में भारी गिरावट आई है। 2017 में गाय का एक लीटर दूध 25-28 रुपये था, जो 2018 में 17-23 रुपये हो गया 

भाजपा के घोषणा पत्र में वादा था कि कृषि योग्य जमीन का अधिग्रहण नहीं होगा। जबकि मोदी सरकार 120 साल के संघर्ष के बाद बने सन 2013 के जमीन अधिग्रहण क़ानून को अध्यादेश लाकर खत्म करने की कोशिश में जुटी रही। उद्योगपतियों के फायदे के लिए चार बार अधिग्रहण कानून बदलने की कोशिश हो चुकी है। इसमें असफल होने के बाद कानून को ठेंगा दिखा केंद्र सरकार एनएचएआई से अधिग्रहण करा रही है। राज्य सरकारें इस कानून को चोर दरवाजे से बदल रही हैं। इन सब परिवर्तनों का उद्देश्य है कि जमीन अधिग्रहण से पहले किसान से पूछना न पड़े , अधिग्रहण के असर की जांच न हो। कई जगह लैंड पुलिंग हो रही है, मगर किसान से बिना पूछे।

जंगलों की रक्षा करने और देश का पर्यावरण संतुलन बनाए रखने का दंभ भरने वाली मोदी सरकार आदिवासी किसानों से वनाधिकार छीनने में जुटी है। पर्यावरण के नियम कानून ढीले किये जा रहे हैं। मार्च 2018 में सरकार ने राष्ट्रीय वन नीति 2018 का मसविदा जारी किया। यह नीति वनों को पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप के नाम पर कंपनियों को सौंपने का रास्ता साफ करती है। 2015-18 के बीच 300 खानों को पर्यावरण मूल्यांकन या आदिवासी समुदाय की सहमति के बगैर सौंपा गया। समुद्र तट से 200 मीटर के भीतर भवन निर्माण की पाबंदी को ढीला किया गया, जिससे मछुआरों की जगह होटल उद्योग को बढ़ावा मिले।

राष्ट्रीय लैंड अथारिटी बनाने की दिशा में एक कदम भी नहीं उठाया गया।कृषि उपज मंडी समिति कानून के किसान विरोधी हिस्सों में कोई बदलाव नहीं हुआ । बुज़ुर्ग किसानों और खेतिहर मजदूरों को बुढ़ापे में सहारा देने के लिए कोई प्रभावी कल्याण योजना नहीं बनी । आर्गेनिक फार्मिंग एंड फेर्टिलिसेर कारपोरेशन का नामोनिशान तक नहीं ।








Tagfarmer crisis modi election msp

Leave your comment