महिला आरक्षण विधेयक पारित होने की आशा में गुजरात की महिलाएं

समाज का सच , , रविवार , 13-01-2019


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कलीम सिद्दीकी

अहमदाबाद। 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण बिल पास करने का वादा किया था। लोकसभा चुनाव जीत कर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और उनकी सरकार का कार्यकाल लगभग पूरा होने जा रहा है। जाते-जाते उन्होंने सवर्ण समाज को 10 प्रतिशत का आरक्षण का बिल दोनों सदनों में पास करा दिया। अंतिम वर्ष में एक और बिल पास कराया जो मुस्लिम महिलाओं को लेकर था ट्रिपल तलाक।  इन दोनों बिलों का मोदी ने कोई वादा नहीं किया था परंतु राजनैतिक गुणा गणित में फिट बैठने के कारण बिल को पास किया गया। महिला आरक्षण पर अब कोई आशा नहीं रही लेकिन हम कब सोचेंगे कि भारत की 100 प्रतिशत आबादी फ़िनलैंड की तरह इंटरमीडिएट पास हो या न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की तरह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगभग 50 प्रतिशत हो। भारत पुरुष प्रधान देश है लेकिन देश की आधी आबादी महिलाओं की है। पंचायत एवं निगम के चुनाव में बहुत से राज्यों में महिलाओं को 33 से 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। लेकिन वहां भी पुरुष महिलाओं को प्रॉक्सी उमीदवार बनाकर सत्ता अपने हाथ में ही रखते हैं। नरेंद्र मोदी गुजरात से आते हैं इसलिए 2019 आम चुनाव से पहले गुजरात की राजनीति में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी समझना जरूरी है।

पंचायतों में आदिवासी महिलाएं प्रॉक्सी सरपंच

आदिवासी बहुल दक्षिण गुजरात के नानी रासली गांव की सरपंच हंसाबेन राठवा हैं। उनका परिवार खेतीबाड़ी से जुड़ा है। हंसाबेन गृहणी हैं और महिला सीट पर चुनाव लड़कर सरपंच बनी हैं। लेकिन सरपंच की कुर्सी उनके पति अर्जुन भाई राठवा संभालते हैं वह केवल हस्ताक्षर तक सीमित हैं। इसी प्रकार से सिथोल गांव से कुंताबेन उदेशिंग भाई, हीरपरि जुथ ग्राम पंचाय से नैना बेन राजेंद्रभाई और लोढाण ग्राम पंचायत से मनीषा बेन छत्रसिंह सरपंच हैं। ये महिलाएं सरपंच हैं लेकिन पंचायत भवन में इन महिला सरपंचों का कामकाज इनके पति देखते हैं।

आनंदी बेन पटेल ने स्थानीय निकाय में दिया था 50 प्रतिशत महिला आरक्षण

गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं आनंदीबेन पटेल ने 2014 में गुजरात लोकल अथॉरिटीज लॉज़ (अमेंडमेंट) एक्ट-2009 में संसोधन कर महानगर एवं पंचायतों में 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी थीं फिर भी साधारण महिला के लिए कुछ खास नहीं बदला।

राजनैतिक परिवारों की महिलाओं को ही मिलती है राजनैतिक अहमियत

कल्पना बेन धोरिया सुरेंद्र नगर ज़िला पंचायत की अध्यक्ष हैं और उनके पति शिक्षक हैं। कल्पना बेन का कहना है कि, "मोदी सरकार ने महिला आरक्षण बिल अभी तक लोकसभा में पेश नहीं किया जबकि इनके मैनिफेस्टो में यह सर्वोच्च प्राथमिकता में था। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए महिला आरक्षण बिल पास होना ही चाहिये था।" ज़िला पंचायत के अलावा संगठन में भी काम कर रही हैं कल्पनाबेन बताती हैं "उनके पिता राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं, चाचा पूर्व सांसद और भाई चोटिला से विधायक है। परिवार राजनैतिक पृष्टभूमि वाला है।"   

शहरों में भी महिलाएं प्रॉक्सी पार्षद हैं

शहरों में भी महिलाएं नगर निगम चुनाव में आरक्षण के कारण पार्षद तो बन जाती हैं लेकिन अहमदाबाद जैसे बड़े शहर में भी प्रभुत्व पुरुषों के हाथ में ही होता है। आफरीन पठान अहमदाबाद के गोमतीपुर से महिला पार्षद हैं । अहमदाबाद महा नगरपालिका में 50 प्रतिशत सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है। आफरीन 2015 म्युनिसिपल चुनाव में 23000 के बड़े अंतर से जीतकर पार्षद बनीं थीं । कांग्रेस ने टिकट भी आफरीन की राजनैतिक क्षमता देखकर नहीं बल्कि उनके ससुर मुख़्तार पठान की 40 वर्ष पार्टी में सेवा के बदले दिया था । चुनाव के बाद आफरीन फिर से घर के कामकाज में लग गईं। ससुर जो लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं आफरीन की जगह निगम से लेकर जनता संवाद सबकुछ खुद ही देख लेते हैं।

गुजरात विधानसभा में 10 प्रतिशत भी महिला नहीं

त्रिवेदी सेंटर फॉर पोलिटिकल डेटा के अनुसार 2017 गुजरात विधानसभा चुनाव में 22 महिलाओं को बीजेपी और कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया था जिसमे से 13 महिलें विजयी हुई थीं ।22 में से 14 महिलाएं राजनैतिक रूप से सक्रिय परिवार से थीं। गुजरात विधानसभा में महिलाओं की सबसे अधिक संख्या 16 रही है जो कुल सीट का 10 प्रतिशत भी नहीं है। यह संख्या 1985, 2007 और 2012 में रही हैं जब सर्वाधिक महिलाएं विधानसभा पहुची थीं। इसी प्रकार से लोकसभा में भी इनका प्रतिनिधित्व निराशाजनक रहा है।  

आंदोलनकारी महिलाओं को भी नहीं मिलता टिकट  

गुजरात में पाटीदार आंदोलन में महिलाओं की भूमिका सराहनीय थी। बेलन और थाल से किया गया प्रदर्शन प्रशासन के लिए चुनौती बन गया था । इस आंदोलन की अगुवा रही रेशम पटेल जो 2017 चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हो गई थीं तेज़ तर्रार भाषण और महिलाओं को घर से सड़क पर आंदोलन के लिए तैयार करने में बड़ी भूमिका अदा की थीं। वह  विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छुक थीं परन्तु पार्टी ने उम्मीदवार नहीं बनाया । रेशमा पटेल का कहना है "सभी दल पुरुष प्रधान हैं महिलाओं का शोषण करते हैं। महिलाओं को जी हुजूरी, गुलामी और समझौते से टिकट मिलता है। राजनैतिक क्षमता का कोई अर्थ नहीं होता।" रेशमा पटेल की तरह ऊना आंदोलन में निर्जरी सिन्हा, भावना बेन इत्यादि ने 10 दिन की अहमदाबाद से पैदल ऊना तक की यात्रा की थी।

बीजेपी ने महिला सशक्तिकरण के नाम पर धोखा दिया

2014 चुनाव के घोषणा पत्र में बीजेपी ने महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान देने एवं 33 फीसद महिला आरक्षण बिल को लोकसभा से पास करने का वादा किया था। महिला आरक्षण बिल 2010 में राज्यसभा से पारित हुआ था लेकिन अब केवल एक लोकसभा सेशन बचे हैं इसलिए बिल पारित होने की आशा कम ही बची है । इसी प्रकार से अखिल भारतीय महिला बैंक, पुलिस एवं अन्य वादे केवल वादे रह गए। 2010 पुलिस भर्ती में 4.2 प्रतिशत , 2014 में 6.1 प्रतिशत और 2017 में 7.28 प्रतिशत महिलाओं की भर्ती हुई जो संख्या के अनुपात में बहुत कम है। 2011के जनगणना   के अनुसार भारत में महिला साक्षरता दर 65.46 है। जबकि कुल साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है। इंडिया ग्रीन के संयोजक सुरेश नौटियाल का कहना है "महिला सशक्तिकरण के लिए साक्षरता ज़रूरी है। फिनलैंड में 100 प्रतिशत महिलाएं सेकेंडरी शिक्षा हासिल की हुई हैं। जिस कारण देश के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी 35 से 50 प्रतिशत तक है। जिससे वहां की महिलाएं शिक्षित हैं सशक्त भी हैं।" गुजरात विद्यापीठ के एक अभ्यास के अनुसार गुजरात की 42 प्रतिशत महिला सरपंच केवल प्राथमिक शिक्षण तक ही पढाई की हैं। वरिष्ठ पत्रकार बसंत रावत धार्मिक कट्टरता और जातिवाद को महिला सशक्तिकरण में बाधा मानते हैं।   










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