मार्क्सवाद से आज भी क्यों आक्रांत हैं पूंजीवादी देश

विमर्श , , बुधवार , 12-06-2019


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रामशरण जोशी

(सोवियत संघ के पतन के बाद यह कहा जाने लगा कि अब मार्क्सवाद के दिन लद गए। लेकिन इसके बावजूद यूरोप-अमेरिका समेत शेष दुनिया के पूंजीवादी देश मार्क्सवाद से पहले ही जितने आक्रांत हैं। वे मार्क्सवाद से क्यों इतना भयभीत रहते हैं? क्या यह कभी राख के ढेर से निकल कर आ सकता है! क्या यह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों को भी तबाह कर सकता है? क्या उन्नीसवीं सदी के समान इक्कीसवीं सदी का राष्ट्र लुंज-पुंज है जिसे एक ही जन-ज्वार में परास्त किया जा सकता है? इसकी वजह है। यदि यह कोरा चिंतन होता, दर्शन पद्धति रहती, तो दुनिया के शासक वर्गों द्वारा इसे कभी का दफन कर दिया गया होता। 1989 में ‘बर्लिन वॉल’के पतन और पूर्वी व पश्चिमी जर्मनियों के एकीकरण के साथ ही मार्क्सवाद का पिंडदान कर दिया जाना चाहिए था। ऐसे में आज के संदर्भों में एक बार फिर से मार्क्सवाद पर मंथन की आवश्यकता है। क्या इस सदी का कोई नया कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो हो सकता है और दास कैपिटल की रचना की जा सकती है? वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पर वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी के लेख का पहला भाग-संपादक)  

क्या मार्क्स अंतिम क्रांतिकारी विचारक हैं? क्या मार्क्सवाद अंतिम चिन्तन और विचारधारा है? यदि इन प्रश्नों को विमर्श निष्कर्ष के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है तो न किसी के साथ संवाद की गुंजाईश रह जाती है, न ही नए विमर्श के लिए कोई स्पेस बचा रहता है। इस स्थिति को स्वीकार करने के बाद हम उन पूंजीवादी और उत्तर आधुनिकतावादी विचारकों के अवधारणात्मक मकड़जाल में फंस सकते हैं जिन्होंने पिछली आधी सदी में अंतवाद की घोषणाएं की हैं: सभ्यता का अंत, विचारधारा का अंत, इतिहास का अंत और सभ्यताओं का संघर्ष। इन घोषणाओं के परिप्रेक्ष्य में तो मार्क्सवाद अप्रासंगिक हो चुका है। सोवियत संघ व पूर्वी यूरोप की साम्यवादी सत्ताओं के पतन से तो मार्क्सवाद की मृत्यु की ओर भी शिनाख्त होती है। साम्यवादी चीन का आज जिस तेजी के साथ कायांतरण हो रहा है, इस घटनाचक्र ने मार्क्सवाद को एक बार फिर से सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है। नेपाल में राजशाही का अंत और साम्यवादी परचम तले परिवर्तन आए करीब एक दशक बीत रहा है, लेकिन गणतांत्रिक नेपाल में संपत्ति- संबंध चरित्र में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। उत्पादन संबंध आज भी परंपरागत हैं। तब क्या यह मान लें कि मार्क्सवाद चुक चुका है। अब इसे इतिहास के सफों में कैद कर देना ही ठीक रहेगा? 

मेरी दृष्टि में मार्क्सवाद मिथकीय पुराणशास्त्र नहीं और न ही कोई धार्मिक ग्रंथ। यह इतिहास की ठोस परिस्थितियों की कोख से जन्मा बहु आयामी विज्ञान है। जिस प्रकार शुद्ध विज्ञान कभी बासी नहीं होता है, उसमें निरंतर शोध-अविष्कार-परिष्कार की नई-नई परतें जुड़ती रहती हैं, उसी प्रकार मार्क्सवादी चिंतन सागर में भी नई-नई परिस्थितिजन्य-अनुभवजन्य- चिंतनजन्य धाराएं मिलती रहतीं हैं। इस प्रक्रिया में प्रकारांतर से मार्क्सवाद और समृद्ध होता जाता है,वैज्ञानिक चिंतन के महासागर का रूप लेता रहता है।

1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र जारी किया गया था। इस 176 वर्ष के काल में समय, इतिहास, राज्य का चरित्र,पूंजी की गतिकी, राजनीतिक आर्थिकी और टेक्नोलॉजी जड़ तो नहीं रहे हैं। इस लंबी यात्रा के घटना चक्र को देखे तो कई अकल्पनीय क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं;साम्राज्यों का अंत हुआ; क्रांतियां हुई; विज्ञान ने अंतरिक्ष में छलांगे लगाई; संचार- सूचना-परिवहन-टेक्नोलॉजी की क्रांति हुई; दुनिया सिमटी और विश्व ग्राम की अवधारणा ने जन्म लिया; कृत्रिम मेधा की उपस्थिति बढ़ रही है; दो- दो विश्वयुद्ध हुए व परमाणु बमों का इस्तेमाल हुआ; दो- दो खाड़ी जंग हुईं; शीतयुद्ध की समाप्ति से एकल ध्रुवीय शक्ति व्यवस्था का उदय हुआ; वैश्वीकरण का विस्फोट हुआ और कारपोरेट पूंजी का तांडव शुरू हुआ व विश्व व्यापार मंच अस्तित्व में आया। चरम व हिंस्र उपभोक्ता संस्कृति का विस्फोट हो चुका है।

आज की दुनिया में अमेरिका, रूस,चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया जैसे राष्ट्र परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। करीब सत्रह-अठारह हजार परमाणु बमों का जखीरा बताया जाता है। विनाश के कगार पर मानवता बैठी हुई है, इसकी आशंका अहर्निश है। तब क्या इस परिदृश्य में चिंतन-विज्ञान के रूप में मार्क्सवाद को जड़वादी होना ? तब क्या यह यथास्थितिवाद का दर्शन नहीं कहलाएगा? तब इसकी चिंतन आयु का अंत तो सोवियत सत्ता के पतन के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए ! क्यों नहीं? आज जब विश्व के सौ जीनियस की बात चलती है, उन पर डाक्यूमेंट्री बनाई जाती है, तो पहला स्थान मार्क्स का होता है। इसका कोममेंटटेर कहता है, मार्क्स से प्रेम या नफरत किए बगैर नहीं रह सकते। यानि इसकी प्रासंगिकता अपरिहार्य है।

इसकी वजह है। यदि यह कोरा चिंतन होता, दर्शन पद्धति रहती, तो दुनिया के शासक वर्गों द्वारा इसे कभी का दफन कर दिया गया होता। 1989 में ‘बर्लिन वॉल’के पतन और पूर्वी व पश्चिमी जर्मनियों के एकीकरण के साथ ही मार्क्सवाद का पिंडदान कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन क्या बात है,यूरो-अमेरिका समेत शेष दुनिया के पूंजीवादी देश मार्क्सवाद से पहले ही जितने आक्रांत क्यों हैं? क्यों इससे भयभीत रहते हैं? क्या यह कभी राख के ढेर से निकल कर आ सकता है! क्या यह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों को भा तबाह कर सकता है? क्या उन्नीसवीं सदी के समान इक्कीसवीं सदी का राष्ट्र लुंज-पुंज है जिसे एक ही जन-ज्वार में परास्त किया जा सकता है? क्या उन्नीस सौ पैतीस-छत्तीस के लॉग मार्च की पुनरावृत्ति हो सकती है? क्या इस सदी का कोई नया कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो हो सकता है और दास कैपिटल की रचना की जा सकती है? इन सवालों पर मंथन की जरूरत है। 

इससे आतंकित होने की मुख्य वजह है इसकी रचनात्मक क्रांतिधर्मिता। यह जग की व्याख्या ही नहीं करता है, उसे बदलने का आह्वान भी करता है। एक वैकल्पिक समाज-राज व्यवस्था के निर्माण के लिए ललकारता भी है। एक नया मानव और वर्ग मुक्त समाज का विराट स्वप्न जगाता है। किसी समाज का भौतिक विकास और विकास अवस्था मनुष्य की चेतना का निर्माण करती है,उसे एक आकार देती है। मार्क्सवाद की गतिकी को इस भौतिक अवस्था से मुक्त नहीं किया जा सकता है। कह सकते हैं, मार्क्सवाद का संपूर्ण अस्तित्व इस पर टिका हुआ है। यह दर्शन उन तमाम पड़ावों और उससे उत्पन्न द्वंदात्मक क्रियाओं को रेखांकित करता है जिसमें मानव सभ्यता के इतिहास सफर में निर्णायक भूमिका निभाई है और आगे भी यही प्रक्रिया जारी रहेगी। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। 

हां देखना सिर्फ यह है कि क्या इस प्रक्रिया का चरित्र ‘यांत्रिक’है या परिवर्तनशील है? यदि यह मान लें कि इसका चरित्र यांत्रिक है, अपरिवर्तनीय है,स्थिर है तब हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि समाज और उसे जन तथा राज्य, तीनों भौतिक प्रभावों से सापेक्ष नहीं, निरपेक्ष होते हैं। दूसरे शब्दों में, भौतिक परिवर्तन व घटनाओं का मनुष्य से स्वतंत्र अस्तित्व है। द्वंदों और अंतर्विरोधों का कोई अस्तित्व नहीं है।

पूंजी की भी कोई भूमिका नहीं है। इतिहास में आदिम साम्यवाद, सामंतवाद, साम्राज्यवाद,पूंजीवाद और समाजवाद की इतिहास में कोई भूमिका नहीं रही है। इस तरह के निष्कर्ष निकलेंगे। यह यथास्थितिवाद है। मार्क्सवाद इसके विरोध में खड़ा है और खड़ा रहेगा। दिक्कत उन कठमुल्लाओं के साथ है जो इस दर्शन को संकीर्ण दृष्टि से देखते हैं और मार्क्स के शब्दों को ‘ब्रह्म वाक्य’समझने लगते हैं। मार्क्स के कोटेशनों से बाहर जाकर देखने से डरते हैं या देखना नहीं चाहते। वे इसके शुचिता के स्वयंभू पहरेदार बन बैठते हैं। 

वास्तव में, मार्क्स के जीवन काल मे ही कम्युनिस्ट घोषणापत्र और साम्यवादी दर्शन पर तीखी बहसें होती रहती रही हैं। बीसवीं सदी में लेनिन, ट्रोटस्की, स्टालिन, माओ, हो ची मिन्ह, कास्त्रो, चे सहित बड़ी संख्या में ऐसे चिंतक हुए और रणनीतिकार हुए हैं जिन्होंने मार्क्सवाद की व्याख्या अपने देश की भौतिक स्थितियों,विकास अवस्था और सामाजिक- सांस्कृतिक जरूरतों के मुताबिक की है और उसे अपनाया है। क्या माओ के नेतृत्व में हुई क्रांति को लेनिन की क्रांति की कार्बन कापी कहा जा सकता है? यही सच क्यूबा की कास्त्रो-चे क्रांति का है। इटली के प्रखर मार्क्सवादी बुद्धिजीवी व राजनीतिकर्मी अंतोनियो ग्राम्शी ने भी कई मामलों में मार्क्सवादी व्याख्याओं से असहमति जाहिर की थी।

वामपंथी इतिहासकार एरिक होब्सबाम ने अपनी पुस्तक ‘दुनिया को कैसे बदलें? में मार्क्स, मार्क्सवाद, समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद से हुई ऐतिहासिक बहसों का विचारोत्तेजक विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण से यह निष्कर्ष जरूर निकलता है कि मार्क्सवाद एक गतिशील जीवन दर्शन है। इसे यांत्रिक ढंग से समझना औऱ लागू करना, मार्क्सवाद से विचलित होना होगा। यदि मार्क्सवाद जड़ और ठस होता तो क्रांति के अनेक रूप- संस्करण दिखाई नहीं देते; पूर्वी यूरोप,रूस,एशिया,अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में मार्क्सवाद के भिन्न-भिन्न ब्रांड रहे हैं। इतना ही नहीं, एक ही देश में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद पर आधारित पार्टियों की व्याख्या ओर रणनीति अलग-अलग होती हैं। क्यों? उत्तर है: यह एक जीवंत दर्शन है। निरंतर विमर्शों-व्याख्याओं से समृद्ध होता रहता है।

लेकिन, हमें इस सच्चाई को भी मुक्त भाव-विचार से स्वीकार करना होगा कि साम्यवादी राज्यव्यवस्था की तुलना में पूंजीवादी राज्यव्यवस्था में जिजीविषा बला की है। यह समय की चुनौतियों को ध्यान में रखकर स्वयं को लगातार पुनराविष्कृत करता रहता है;  महाजनी पूंजीवाद, मुक्त अर्थव्यवस्था, मिश्रित अर्थव्यवस्था, जन कल्याणकारी राज्य, सामाजिक सुधार, एकधिकारवादी पूंजीवाद, बहुराष्ट्र निगम पूंजीवाद, संभावी कॉरपोरेट स्टेट,भूमंडलीकरण, उपभोक्तावाद,दलाल पूंजीवाद, कृत्रिम आर्थिक संकट, युद्ध, मानवीय व संवेदनशील पूंजीवाद और निजी सार्वजनिक सहभागिता (PPP)जैसे नकाब समय-समय पर बदल  कर पूंजीवाद राज्यसत्ता के मंच पर जाम हुआ है। इसे बनाए रखने के लिए विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, गेट, विश्व व्यापार मंच, नव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था आदि शक्तिशाली माध्यमों (या हथियारों) का देश, काल, समय, परिस्थिति और आवश्यकता को ध्यान में रख कर प्रयोग किया जाता है।

पूंजीवाद का नवीनतम शस्त्र है: आतंकवाद। आज इसे विश्व मानवता और विकास का सबसे बड़ा शत्रु माना जा रहा है। इससे पहले पूंजीवादी सत्ताओं और सिद्धांतकारों ने साम्यवाद को मानवता औऱ विकास का एक मात्र शत्रु घोषित किया था। धार्मिक सत्ताओं की दृष्टि में भी मार्क्सवाद ईश्वर, धर्म, समाज और मानवता का एकमात्र शत्रु रहा है।

अब कोई यह बताए कि आतंकवाद को जन्म किसने दिया? क्या तालिबान, ओसामा बिन लादेन शून्य में पैदा हो गए? क्या इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया को किसी दैवीय ताकत ने पैदा किया। आज पूरा पश्चिमी एशिया या मुस्लिम देश पूंजीवादी देशों का रंगमंच बने हुए हैं। उन्हें अपने हथियारों के कारखाने औऱ कारोबार जिंदा रखने हैं। वैश्विक आतंकवाद का आख्यान (नैरेटिव) इस सदी में पूंजीवाद को जिंदा रखने का नया हथियार है या नई लाइफलाइन है। जिसे उसने शीत युद्ध और साम्यवादी सत्ताओं के अंत के बाद इजाद किया है। पूंजीवाद अपनी जीवन अवधि को दीर्घ करने के लिए समय-समय पर नई-नई लाइफलाइनों का अविष्कार करता आया है।

उत्तर साम्यवादी सत्ता के पतन से एक नया परिदृश्य पैदा हुआ है। इस परिदृश्य में अब मंच पर पूंजीवाद अकेला नायक है। वह पटकथा लेखक, निर्देशक औऱ अभिनेता है, शेष दर्शक बने रहने के लिए अभिशप्त हैं। वह जानता है, लंबे समय तक उसका यह एकल नाटक चलने वाला नहीं है। इसलिए, उसे साम्यवाद से स्थान पर अपने लिए नए-नए शत्रु चाहिए। उनमें से आतंकवाद नवीनतम है। जब यह लाइफलाइन चुकने लगेगी तो कोई नया इसका स्थान ले लेगा। इस मामले में ‘एप्लाइड मार्क्सवाद’ पिछड़ा साबित हुआ। साम्यवादी सत्ताएं पूंजीवादी सत्ता के खेलों, उससे उत्पन्न नए अंतरविरोधों और हथकंडों को उनके समुच्च में नहीं समझ सकीं। परिणाम, उत्तर 1991 का इतिहास है। पूर्व सोवियत संघ के राष्ट्रपति गोर्बाचोव की ‘पेरोस्त्रीका’ में इस बात के पुख्ता संकेत हैं कि पूंजीवाद ते टक्कर लेने में जो दबाव पैदा हो रहे हैं उनका सामना करने में साम्यवादी राज्य अपनी अंतर्निहित संरचनात्मक सीमाएं महसूस कर रहा है। इस पुस्तक पर स्वतंत्र विमर्श की दरकार है।

दरअसल, इस सदी के वर्ग संरचना उन्नीसवीं सदी की वर्ग-संरचना से नितांत भिन्न है। दोनों में कोई तुलना नहीं है। वर्ग विभाजन की रेखाएं दिग्भ्रमित करती हैं। उनकी वर्ग-वफादारी भी स्पष्ट नहीं है। सुपर व मिडिल सुपर रिच को छोड़ दें तो शेष वर्ग काफी गडमड रहते हैं। मध्य वर्ग, निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के अंतर्संबंध भी भ्रामक औऱ मिश्रित रहते हैं। शत्रुतापूर्ण अंतर्विरोध और मित्रतापूर्ण अंतर्विरोध पारदर्शी नहीं रहते हैं। भारत जैसे देश में तो वर्ग संरचना और वर्ग संबंधों में जाति व्यवस्था महत्वपूर्ण, काफी हद तक निर्णायक भूमिका निभाती है। परिणाम, तस्वीर धुंधली उभरती है। पूंजी के विभिन्न अश्व (मीडिया, मनोरंजन, राजनीति आर्थिकी, शिक्षा व्यवस्था,संस्कृति आदि) पूंजीवाद के अश्वमेध को आगे बढ़ाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में बीती सदियों के नक्शेकदम पर वर्ग संघर्ष की रणनीति बनाने में दिक्कत पेश होती हैं। जाति प्रथा के कारण भारत की स्थिति और भी जटिल हो जाती है। इसलिए, उन्नीस व बीसवीं सदी के प्रभाव से मुक्त होकर नए ढंग से सोचना पड़ेगा। एक प्रायोगिक मार्क्सवाद की जरूरत है। 

जारी.............

( प्रो.रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार और मार्क्सवादी चिंतक हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

 








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Umesh Chandola :: - 06-12-2019
क्या यह खुद मार्क्स नहीं थे जिन्होंने कहा था कि कोई अगर मार्क्सवादी है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूं बल्कि मार्क्सवाद शब्द ही मार्क्स के विरोधियों ने गढ़ा था । ऐसे में कोई मार्क्स को रूढ़िवादी ढंग से समझेगा तो उससे बड़ी मूर्खता क्या होगी ?

Umesh Chandola :: - 06-12-2019
  कहते है परिर्वतन प्रकृति, मानव समाज का नियम है। विगत 6 हजार सालों में दुनिया ने दास व्यवस्था से सामंत-राजाओं की व्यवस्था फिर पूंजीवादी व्यवस्था और समाजवादी व्यवस्था देखी। इन सब कालों में कुछ सौ हजार लोगों ने करोड़ों-अरबों के श्रम का शोषण किया, उत्पीड़न किया। पर 1917 में लेनिन के नेतृत्व में दुनिया ने पहली बार समाजवाद देखा, वहां मेहनतकशों की पूंजीपतियों पर तानाशाही अर्थात् अधिकतम संभव लोकतंत्र स्थापित किया गया। पूंजीवाद में अडाणी-अम्बानियों और बाकी पूंजीपतियों की जनता पर तानाशाही होती है। फिर 1949 में चीनी क्रांति हुई एवं समाजवादी खेमे के सहयोग के कारण बीस सालों में ही 104 देश आजाद हुए। लेनिन ही भगतसिंह के गुरू थे जिन्होंने अपनी रचनाओं में बता दिया था कि भारत का देशी पूंजीपतिवर्ग अपनी पार्टी, कांग्रेस के माध्यम से सीमित आजादी चाहता है जिसमें टाटा-बिड़ला और उनके द्वारा पोषित पूंजीवादी पार्टियों के नेता, नौकरशाह राज करेंगे। 70 सालों से यही हो रहा है। फरवरी 1931 में भगत सिंह ‘‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा’’ लिख चुके थे यानी मृत्यु से एक माह पूर्व ही।     हालांकि 1956 में ही सोवियत संघ में ख्रुश्चोव राज ने पूंजीवादी पुनर्स्थापना की नींव रखकर पूंजीपतियों की सेवा की थी पर इसका बिखराव 1990 में जाकर हुआ। चीन में यह 1976 में ही हो चुका था। समाजवाद की मौत की घोषणा पूंजीवादी मीडिया, साहित्य में खूब हुई। पर लोग भूल जाते हैं कि यह पहले-पहले दो वैज्ञानिक प्रयोग थे जो लम्बे समय चले। रूस में कम से कम 40 वर्ष, चीन में 27 वर्ष। क्या हमें इसकी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए। कि पहली बार में ही लेनिन की पार्टी ने कैसी सफलता रच दी। क्या हवाई जहाज बनाने से पहले दर्जनों बार फेल नहीं हुआ? क्या सफल प्रयोग हजारों, लाखों बार फेल हुए बिना दुनिया के सामने आ सके।     और नई आर्थिक नीतियों का बाजा तो 8 सालों यानि 1998 में ही बज गया- एशियाई बाजारों का संकट फिर 2008 की महामंदी तो जिससे आज 11 साल बाद भी निजात नहीं है। यानी मात्र 28 सालों में नई आर्थिक नीतियों की ऐसी तैसी हो गई?     इसलिये पूंजीवाद दुनिया भर में मोदी, ट्रम्प और उन जैसी फासिस्ट पार्टियों को सत्ता में बिठाने हेतु जी जान से जुटा है। लेकिन भारत ही नहीं फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका, ग्रीस, स्पेन आदि के वैश्विक संघर्षों ने समाजवाद को जनता में पुनः प्रासंगिक बना दिया है। मोदी के बड़े भाई, गुरू ट्रम्प को एक ऐतिहासिक बयान देना पड़ गया है कि ‘‘अमेरिका में कभी समाजवाद नहीं हो सकता। शायद उन्हें शिकागो की’’ हे मार्केट’’ की घटना याद आ रही है जब अमेरिकी मजदूरों ने अपने खून से सनी कमीजों को अपना लाल झंडा बना दिया था।     आज दुनिया की ज्यादातर कम्युनिस्ट पार्टियां भारत की सी.पी.एम. आदि की तरह पूंजीवाद की डोली उठाये हैं। याद रहे नंदी-ग्राम सिंगूर रचने वाली, 30 सालों से औद्योगिक मजदूरों के और छोटे भूमिहीन किसानों के संघर्षों को त्यागने वाली ये पार्टियां किसी काम की नहीं हैं। हां, पूंजीपति वर्ग की अंदरूनी रक्षा-पंक्ति जरूर हैं।     भारत की जनता को अब रोज ब रोज सड़क पर उतरना पड़ेगा। अपने नये, अनुशासित, लोकतंत्रात्मक संगठन शहर-शहर गांव-गांव खड़े करने होंगे। मेहनतकशों की राजनीति यानी भगत सिंह की राजनीति करनी होगी ताकि पूंजीपतियों की राजनीति करने वाली पार्टियों को माकूल जवाब दिया जा सके।    http://www.enagrik.com/news.php?n=1904160701