कश्मीर में ख़त्म हो गयी है हिंदुस्तान की साख!

फुटपाथ , , रविवार , 23-12-2018


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अजय सिंह

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले में 15 दिसंबर 2018 को भारत की सेना ने गोली चला कर 7 निहत्थे नागरिकों को मार डाला। ये लोग मुठभेड़ स्थल के पास सेना के ख़िलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे, जैसा कि कश्मीर में होता रहा है। सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियों की बौछार कर दी। मारे गये नागरिकों में दो बच्चे शामिल हैं। जिन्हें मार डाला गया, उनके सिर, गले व सीने में गोलियां गली हैं। जाहिर है, मार डालने के समझे-बूझे गये इरादे से ही गोलियां चलायी गयीं, न कि प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के इरादे से।

इस घटना पर सेना ने कहा, जैसा कि एक हज़ार बार वह पहले भी कह चुकी है, कि सैनिकों ने आत्मरक्षा में गोलियां चलायीं। पूछा जाना चाहिए, जैसा कि एक हज़ार बार पहले भी पूछा जा चुका है, कि हर बार बंदूक से गोली मार डालने के इरादे से ही क्यों चली? हर बार सिर व सीने को ही निशाना बना कर गोली क्यों चलायी जाती हैं? पिछले दो सालों के दौरान मुठभेड़ स्थलों के पास ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें कई निहत्थे नागरिक मारे जा चुके हैं।

सेना के हाथों 7 कश्मीरी नागरिकों की बर्बर हत्या को अलगाववादियों और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (महबूबा मुफ़्ती) व नेशनल कांफ़्रेंस (उमर अब्दुल्ला) ने जनसंहार कहा है। इस घटना ने एक बार फिर कश्मीरियों के दिलोदिमाग़ में यह धारणा और पुख़्ता की है कि हिंदुस्तान के लिए कश्मीरियों की जान की कोई अहमियत नहीं है। कश्मीर में सेना की कोई जवाबदेही नहीं है, उसे हर तरह की छूट व कानूनी सुरक्षा मिली हुई है, और उसे हत्या, बलात्कार, अपहरण, मनमानी गिरफ़्तारी, यातना देने, लोगों को गायब कर देने- जैसे आपराधिक कृत्यों के लिए किसी भी अदालत में नहीं घसीटा जा सकता।

लोगों को शायद पता हो, सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (अफ़्स्पा) के तहत कश्मीर में सेना को किसी भी कानूनी कार्रवाई से पूरी तरह मुक्ति और हर तरह की कार्रवाई करने की छूट मिली हुई है। जिस तरह की छूट सेना को मिली है, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए आतंककारी और अमान्य है। कश्मीर में सेना ही कानून है। और इस चीज़ ने कश्मीर में हिंदुस्तान की साख को ख़त्म कर दिया है।

कश्मीर की इस घटना पर बाक़ी हिंदुस्तान में ख़ामोशी पसरी हुई है। जैसे कि यह कोई मसला ही न हो! किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया, न कश्मीरी जनता के साथ अपनी एकजुटता का इज़हार किया। सेना की इस कार्रवाई की राजनीतिक स्तर पर कड़ी भर्त्सना होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई। क्या इसलिए कि यह मामला कश्मीर का और कश्मीरी जनता का है! जब यह कहा जाता है कि कश्मीर भारत का हिस्सा है, तब इसका मतलब वहां की ज़मीन से है या जनता से है? दिखायी तो यह दे रहा है कि हिंदुस्तान कश्मीर की जनता को गंवा चुका है और उसने बतला दिया है कि उसे कश्मीरी जनता के सुख-दुख, ज़िंदगी व भविष्य से कोई सरोकार नहीं। कश्मीर में हिंदुस्तान का मतलब सिर्फ़ सेना है।

ज़रा कल्पना कीजिये, सेना की गोलीबारी में अगर इसी तरह नागरिक आरा, देवरिया, मंदसौर, नांदेड़, भावनगर, नागपट्टिनम, सबरीमला, जम्मू, रोहतक, दिल्ली या बंगलोर में मारे गये होते, तब क्या होता? पूरे देश में राजनीतिक बवाल आ गया होता। राजनीतिक कार्रवाइयां सरगर्म हो रही होतीं और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया होता। चूंकि मामला कश्मीर का है, मारे गये लोग कश्मीरी हैं, इसलिए ‘राजनीतिक समझदारों’ ने इस मुद्दे पर चुप्पी अख़्तियार करना ही बेहतर समझा है।

पुलवामा की घटना इस राजनीतिक आख्यान की एक बार फिर पुष्टि करती है कि कश्मीर व कश्मीरी जनता के प्रति हिंदुस्तान का नज़रिया दमन व क्रूरता का है।

(अजय सिंह वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

 








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