बदलाव की राजनैतिक शक्तियों में न वह जज्बा दिखा और न ही उसकी कोई तैयारी

विमर्श , , सोमवार , 20-05-2019


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रविंद्र सिंह पटवाल

इस लोकसभा के चुनाव भी संपन्न हो गए। इस बीच कई परिचितों और फेसबुक मित्रों से भी लगातार बातचीत होती रही। दिल्ली में हम लोगों ने इस बीच कुछ सामूहिक पठन पाठन का काम भी किया, और दूर दराज के मित्र भी जुड़े और कई जगह यह क्रम भी चला। ये अधिकतर लोग वे थे, जो कभी वामपंथी आंदोलन से जुड़े थे, लेकिन इन 10-20 वर्षों से सिर्फ एक समर्थक के रूप में जुड़े थे और इसी समाज में अपनी जीविका से संबद्ध थे। लेकिन ध्रुवीकरण जब सत्ता के शीर्ष से हो रहा हो तो चीजें, खुद ब खुद दो ध्रुवों में बंटने को मजबूर होने लगीं। सबसे पहले लेखकों, बुद्धिजीवियों ने इसको आवाज दी। चेन्नई विश्विविद्यालय और FTII की स्वायत्तता से सामूहिक जन से जुड़ा सवाल हैदराबाद होते हुए JNU कैंपस तक जब जुड़ा तो बौद्धिक वर्ग के अंदर खलबली मचनी स्वाभाविक थी। समाज के विभिन्न हिस्सों में भी दमन तीव्र होने लगा, जो UPA के समय इक्का दुक्का घटना के रूप में देखी जाती थीं,  उसे अब विचारधारात्मक आधार मिल चुका था और वह सरकारी मशीनरी द्वारा कम बल्कि भीड़ की शक्ल में अल्पसंख्यकों, दलितों पर शारीरिक हमले और सोशल मीडिया से लेकर ऑफिस और चाय की दुकान से लेकर रेल के सफर में उग्र राष्ट्रवाद के समक्ष नतमस्तक होने की शक्ल में दिखने लगा।

ऐसे में सभी लोग अपनी जड़ों को तलाशने और वर्तमान सत्ता से मुकाबले में खड़ी शक्तियों की तलाश करने की कोशिश अवश्य किये होंगे। जो उथल पुथल समाज के मध्य वर्ग के एक हिस्से को इतना परेशान कर गई हो, जाहिर सी बात है यह प्रश्न उन सामाजिक, राजनैतिक दलों को भी अवश्य की होगी, जिनका अस्तित्व ही एक बुनियादी बदलाव और भारत के करोड़ों लोगों के मुस्तकबिल को बदलने के ही उद्देश्य से निर्मित था। जिसने दशकों से संघर्षों में तपे तपाये नेता दिए हों। लेकिन आश्चर्य की बात यह दिखी कि ऐसा कुछ नहीं था जमीन पर। स्थापित संसदीय वाम जो बंगाल में अपनी जमीन इस बीच खो चुका था, उसके पास ऐसा कोई एजेंडा नहीं था। त्रिपुरा के बारे में अख़बारों में रिपोर्ट आ रही थीं कि बीजेपी संघ किस प्रकार आक्रामक और सुनियोजित तरीके से इस बार त्रिपुरा में अपना राजनैतिक अभियान चलाएगा और उसने हूबहू वह काम किया। समूची कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को बीजेपी ने त्रिपुरा में अपने अंदर समेट लिया। पहले दो साल जिस मुख्यमंत्री के सादगी के कसीदे पढ़े जाते थे, देखते ही देखते मीडिया और सोशल मीडिया के संगठित प्रयास और मेहनत से बीजेपी ने त्रिपुरा में ऐतिहासिक जीत हासिल कर ली। इसकी मिसाल सिर्फ दिल्ली में AAP के चुनावी सफर से की जा सकती है।

चुनाव के परिणाम आने के बाद से ही जिस तरह त्रिपुरा में लेफ्ट समर्थकों पर हमले हुए, लेनिन की प्रतिमा तोड़ी गई, वह दृश्य कभी भुलाये नहीं भूला जा सकता। दो दिन बाद उसी बीजेपी के शपथ ग्रहण में भूतपूर्व मुख्यमंत्री का शामिल होना दिल को झकझोर गया। इतनी बुरी स्थिति? उन हजारों कार्यकर्ताओं के पास क्या विकल्प है? रातों रात वामपंथ से भगवाकरण में रूपांतरण करने को कौन मजबूर कर रहा है? इस सबके बावजूद भारत में फासीवाद पर शोध जारी है। यह किस प्रकार की कम्युनिस्ट पार्टियां हैं? मुझे लगता है यह किसी 16 साल के सामान्य विद्यार्थी से भी पूछेंगे तो वह इनके फेल होने की ही पुष्टि करेगा। यह हाल सबसे बड़ी और जिम्मेदार पार्टी का था, सीपीआई तो अब खुद को कहीं मानती भी है, और दावा करती है, मुझे ऐसा नहीं लगता। एक पार्टी है, उसका संगठन है, कई ट्रेड यूनियन हैं, जो ऐतिहासिक समय से चल रहे हैं, इसलिए जब तक हैं उसे खींच रहे हैं।  और तो और नक्सलबाड़ी की तपिश से पैदा हुए ML धड़ों में भी धीरे-धीरे आग ठंडी पड़ चुकी सी लगती है। कोई सपना हो जिसके पीछे इस विशाल, बेहद विभाजित आर्थिक, सामाजिक स्तर पर, जातियों धर्मों, राष्ट्रीयताओं, सामान्य और आदिवासी इलाकों और क्षेत्रीय अस्मिताओं में बंटे देश को एक सूत्र में पिरोने की ललक दिखती हो। ऐसा कतई नहीं है।

दिखी भी कहीं कहीं तो उसके पीछे भी मुख्य लक्ष्य संसदीय चुनाव की वैतरणी को पार करने का लक्ष्य। यह लक्ष्य अपने आप में ही किस तरह छोटे छोटे समझौतों पर विवश करता चला जाता है, और लक्ष्य धीरे धीरे आंखों से ओझल हो जाता है, पता ही नहीं चलता। और ऐसा नहीं कि इन 5 सालों में वामपंथ ने काम नहीं किया। बहुत किया, अकेले महाराष्ट्र में तीन तीन ऐतिहासिक लॉन्ग मार्च किया। महाराष्ट्र सरकार के पसीने हर बार छूटते देखे। सभी विपक्षी दलों का समर्थन, सभा में और रास्ते में आकर भाषण और मुंबई की जनता का प्यार इतना अपार मिला कि वो अपने आप में मिसाल है। लेकिन एक बात गहराई से महसूस की। राज्य सत्ता अब लाल झंडे से जरा भी नहीं घबराती। उसे मालूम है ये थोड़े से भी पुचकार से बहल जायेंगे, चाहे उसके बाद कुछ भी न करो। क्योंकि इनका विज़न बस मुल्ला की दौड़ की तरह है। इससे अधिक तो वे धनी किसानों ने आंदोलन से डरते देखे गए, जिन्होंने छप्पर फाड़ वोट से मोदी सरकार ही बनवाई थी, मुज़्ज़फ़्फ़रनगर दंगों में बढ़-चढ़ भूमिका निभाई होगी। लेकिन इसकी कोई व्याख्या आपको वाम आंदोलन में नहीं मिलेगी।

वाम आंदोलन से निकले मध्य वर्ग के बुद्धिजीवी समाज के नरेंद्र दाभोलकर, कलबुर्गी, पानसरे और गौरी लंकेश से उन्हें डर लगता है। उनकी हत्या हो जाती है। लेकिन संगठित वाम राजनैतिक दलों से उन्हें कोई डर नहीं लगता। शायद वे जानते हैं कि ये ही तो असली संसदीय परंपरा की पालकी ढोने वाले लोग हैं। हमने तो संविधान, संवैधानिक संस्थाओं को तोड़ना और उससे खेलना है। बचाने वाले तो अब ये लोग हैं। 1957 के सीपीआई के नारे को आज भी याद करता हूं जो शायद उस समय के लिए समय से आगे का नारा था, "देश की जनता भूखी है, ये आजादी झूठी है" और संविधान में बदलाव की मांग करते थे, उसे बदलने और मजदूर का राज स्थापित हुए बिना इस संविधान, संसद को झूठा करार देते थे, आज संविधान ही उनकी शरण स्थली नजर आती है, और जो इस संविधान की शपथ खा खा के मुस्टंडे हो गए, वे आज इसे नोच रहे हैं और हम चीथड़ों को समेटने का काम कर रहे हैं। कई मायनों में तो आज गांधी क्रांतिकारी नजर आते हैं। वो चाहे अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ने से लेकर हो या अंग्रेजों भारत छोड़ो हो, गांधी के नारे अहिंसात्मक होते हुए भी गुलाम देश में रहते हुए, कानून को तोड़ने की करोड़ों लोगों से मांग करते थे, और वे लगातार टूटते भी थे।

दमन भी होता था, लेकिन हर बार गांधी अपने वर्ग हित के कारण दो कदम पीछे और फिर कुछ समय बाद कानून तोड़ते देखे जा सकते थे। लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि लेफ्ट विचारधारा दुनिया से सिमट रही है। दुनिया में उग्र राष्ट्रवाद और फासीवाद देखने को मिल रहा है, आप लोग भावनात्मक तरीके से सोचते हो। जबकि हमें उल्टा दिखता है। बर्नी सैंडर्स के नारे हमारे देश के वामपंथी नारों से अधिक धारदार और स्पष्ट हैं। ब्रिटेन सहित यूरोप में जहां फासीवाद की आहट आ रही है, उसके प्रतिरोध की आवाज भी सुनाई दे रही है। नेपाल तक में पहली बार वामपंथ की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है, वो उसका करता क्या है यह उन पर निर्भर करता है। अपने ही देश में कन्हैया कुमार इस ब्राह्मणवादी राज्य सत्ता जिसे मोदी सत्ता कह सकते हैं के खिलाफ वैचारिक आधार की धुरी बनता है। वह अकेला ही लेफ्ट के बिना उस द्वन्द का केंद्र बन जाता है और उसके पक्ष में ऐसी-ऐसी जगहों से समर्थन आने लगता है कि चुनाव के कुछ हफ्ते तो देश और सोशल मीडिया में कन्हैया के समर्थन और विरोध में ही सब कुछ देखने सुनने को मिलता है देश को। लेकिन यहां भी कोई कम्युनिस्ट पार्टी नहीं खड़ी दिखती इस विमर्श को समेटने के लिए।

उसे सिर्फ एक बेगूसराय की सीट की दरकार है। उसके पास कुछ भी पाने को नहीं रहा, सिर्फ एक सीट का आसरा है रे बाबा। दूसरे दलों ने भी अपने उम्मीदवार इसी गणित के हिसाब से फिट किये लगते हैं, जैसे राजद को खुश किया जा सके। यह दो कदम भी नहीं चलने वाला। लड़ाई दो सीट या 20 सीट की है ही नहीं। देश आखिर किसकी इच्छा पर चलेगा? उसका एजेंडा कौन निर्धारित करेगा? जिस तेजी से कॉर्पोरेट, क्रोनी कारपोरेट की लूट जारी है उसकी तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर से ही की जा सकती है। इस निर्मम शोषण जिसकी मिसाल आज सिर्फ अफ्रीका को रौंदते हुए ही देखा जा सकता है, का मुकाबला करने की जिम्मेदारी लोकतान्त्रिक जनवादी दलों की थी। वे कहां हैं? इस विषय पर बेहद गंभीरता से सोचना होगा। जो देखा और आशा की वो नहीं मिलता दूर-दूर तक मौजूद विकल्पों में। या तो उन्हीं को उन्हीं की रैंक को यह कार्यभार लेना होगा,या फिर उन्हें बाहर की लौ पकड़कर उसे प्रकाशमान करना होगा।

लूट का यह सिलसिला अब जिस रफ़्तार को पकड़ चुका है, उसे रोकने के लिए ताकत पुरानी नहीं लग सकती। वर्किंग क्लास के बीच विश्वास भी टूटा फूटा मिलेगा। क्योंकि इस बीच वे खुद काफी टूट फूट चुके हैं। छोटी सी भी सुधारवादी प्रक्रिया भूखे को तृप्त करने के लिए काफी होती है। अब उसी मंजिल को प्राप्त करने के लिए कई गुना मेहनत करनी पड़ेगी। समाज में विघटनकारी, साम्प्रदयिक शक्तियां सत्ता में भले ही न आ पाएं, उनकी ताकत में कई गुना वृद्धि ही हुई है। वे आपको अब एक एक इंच के लिए खून पसीना एक करवाकर ही पीछे हटेंगी, इसके लिए पूरे ओवरहालिंग की जरुरत है, करीब-करीब पूरे संगठनों को ही अंदर से बदलने की। सिर्फ डेंटिंग पेंटिंग से खुद को ही मूर्ख बनाया जा सकता है।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 








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