मसूद मामले में चीनी हां के पीछे क्या है राज?

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 02-05-2019


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प्रेम कुमार

मसूद अजहर वैश्विक आतंकवादी है। इसे दुनिया ने मान लिया है। भारत की कोशिश 13 साल बाद रंग लायी है। भारत ने 19 साल पहले मसूद अजहर को अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के सुपर्द किया था और उसके बदले अपहृत यात्रियों की सकुशल रिहाई कराई थी। चुनाव के चार चरण बीत जाने के बाद बाकी बचे तीन चरणों में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बीजेपी को इस ख़बर से टॉनिक मिल गयी है। वे उम्मीद कर सकते हैं कि हिन्दी पट्टी में बचे चुनाव के दौरान इसका राजनीतिक फायदा उन्हें मिलेगा।

भारत के चुनाव में हस्तक्षेप तो नहीं कर रहा है चीन?

सवाल ये है कि चीन का रवैया अचानक क्यों बदल गया? जिस चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने की सभी कोशिशों पर चार बार वीटो लगाया, वह अचानक इस मुद्दे पर बदल क्यों गया? क्या भारत और चीन के बीच या यों कहें कि शी और मोदी के बीच कोई डील हुई है? कहीं चीन भारत के चुनाव में हस्तक्षेप तो नहीं कर रहा? 

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प को चुनाव में मदद पहुंचाने के आरोप रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर लगे थे। अभी अधिक समय नहीं हुआ है जब रूस ने अपने देश का सर्वोच्च सम्मान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया था। पुतिन और शी के बीच भी मुलाकात हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं। 

प्रस्ताव में बदलाव के बाद चीन ने हटायी आपत्ति

चीन ने ये साफ किया है कि मसूद अजहर के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र में लाए गये पुराने प्रस्तावों का उसने समर्थन नहीं किया है। ये प्रस्ताव फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका की ओर से अतीत में लाए गये प्रस्तावों से अलग हैं। गौर करने वाली बात ये है कि नया प्रस्ताव जो सुरक्षा परिषद में 1267 कमेटी के सामने लाया गया, उसमें क्या मिटाया गया या हटाया गया। 

मसूद अजहर पर कंधार विमान अपहरण, ओसामा बिन लादेन व अलकायदा से संबंध के आरोप तो प्रस्ताव में हैं। मगर, पुलवामा हमला और उसकी जिम्मेदारी लेने की बातों को हटा दिया गया। कश्मीर में आतंकवाद फैलाने के लिए मसूद अजहर को जिम्मेदार ठहराने वाली बातें भी हटा दी गयीं। ये बातें फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका की ओर से पेश किए गये पिछले प्रस्ताव में शामिल थीं।

चीन ने यह कदम पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बेल्ट एंड रोड फोरम यानी बीआरएफ की बैठक से लौटने के बाद उठाया। पाकिस्तान की कश्मीर संबंधी चिन्ता को मसूद अजहर से अलग किया। और, मसूद अजहर मामले में अपने तकनीकी विरोध को वापस ले लिया। 

बगैर डील के ही चीन ने लिया इतना बड़ा फैसला?

यह बात गले नहीं उतरती कि चीन इतना बड़ा फैसला किसी लेन-देन या डील के बगैर कर सकता है। फ्रांस और अमेरिका से हथियारों की बड़ी डील भारत करता रहा है। रूस बहुत पहले से भारत को हथियारों की आपूर्ति करता रहा है। मसूद अजहर मामले में इंग्लैंड समेत इन सभी देशों का भारत को समर्थन के पीछे यह बहुत बड़ी वजह रही है। अब क्या चीन भी मसूद अजहर के मामले में सतर्क समर्थन के बाद भारत से इसकी कीमत वसूलने वाला  है? 

बीआरएफ के प्रति बदलेगा भारत का रवैया?

जबसे पाकिस्तान अमेरिका से दूर हुआ है और चीन के करीब गया है वह हथियारों के मामले में चीन पर निर्भर होता चला गया है। अब क्या चीन भारत को भी अपने हथियारों का खरीददार बनाना चाहता है? क्या चीन भारत को अपना रणनीतिक साझेदार बनाकर बेल्ट एंड रोड फोरम से जोड़ने का लक्ष्य रख रहा है? अब तक भारत ने बेल्ड एंड रोड फोरम से खुद को दूर रखा है तो इसकी वजह सम्प्रभुत्ता का सवाल रहा है। कहीं भारत ने मसूद अजहर पर चुनाव के समय समर्थन के बदले अपने रुख में बदलाव को कबूल तो नहीं कर लिया है? 

ये सवाल और आशंकाएं इसलिए हैं कि बीते दिनों भारत और चीन के राष्ट्र प्रमुख बिना मुद्दे के भी एक-दूसरे से मिलते रहे हैं। उमर फारूख ने बड़ी बात कह दी है कि भारत सरकार ने पुलवामा हमले में शहीद हुए जवानों को भुलाकर और उनके मुद्दे को दरकिनार करते हुए मसूद अजहर से प्रतीकात्मक लड़ाई जीती है। मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित जरूर कर दिया गया है मगर उसे भारत में आतंकी गतिविधियों का गुनहगार बताते हुए ऐसा नहीं किया गया है। ऐसे में क्या वास्तव में भारत के लिए खुश होने की ज़रूरत है?

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल उन्हें विभिन्न चैनलों के पैनल में बहस करते देखा जा सकता है।)








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