सियासी हवा के रूख़ को पहचानने से इन्कार करता एक सियासी बयान

बयान पर बवाल , , शनिवार , 21-07-2018


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उपेंद्र चौधरी

नई दिल्ली।“अगर भाजपा दोबारा लोकसभा चुनाव जीतती है,तो हमें लगता है कि हमारा लोकतांत्रिक संविधान नहीं बचेगा। वो संविधान के बुनियादी सिद्धांतों को तहस-नहस करके एक नया संविधान लिखेंगे,उनका नया संविधान ‘हिंदू राष्ट्र’ के सिद्धांतों पर आधारित होगा, अल्पसंख्यकों को मिलने वाली बराबरी खत्म कर दी जाएगी और भारत ‘हिंदू -पाकिस्तान’ बन जाएगा।” कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर के इस बयान के बाद सियासी हलकों में खलबली मच गयी है। बीजेपी ने बिना देर किये थरूर के इस बयान को हाथोंहाथ लपक लिया। इस बयान के ज़रिये कांग्रेस पर निशाना साधा गया।प्रतिक्रिया के ज़रिये जनता को इस बात की याद दिलायी गयी कि यही वह कांग्रेस है, जिसने भगवा हिन्दुत्व की धारणा गढ़ी है,यह वह कांग्रेस है, जिसने भारत का टुकड़ा करते हुए एक अलग देश पाकिस्तान बनाया है, यही वह कांग्रेस है, जो गाहे-ब-गाहे हिन्दुओं को बदनाम करती है, यही वह कांग्रेस है,जिसने मुसलमानों को हिन्दुओं के मुक़ाबले प्राथमिकता दी है। 

इन आरोपों के बीच कांग्रेस अपने ही नेता थरूर के साथ खड़े होने के बजाय, उनके बयान से ही पल्ला झाड़ लिया और साथ ही कांग्रेस के नेताओं को आगाह भी कर दिया कि वे ऐसे बयानों से बाज आयें। इस चेतावनी के पीछे कांग्रेस का तर्क है कि ‘भारत का लोकतंत्र बेहद मज़बूत है, सरकारें आती जाती रहेंगी, लेकिन यह देश कभी पाकिस्तान नहीं बन सकता, भारत एक बहुभाषी और बहुधर्मी देश है।’ 

कांग्रेस के इस वक्तव्य के बावजूद शशि थरूर अपने बयान पर क़ायम हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने वही कहा है, जो इस समय की सचाई है। उनका तर्क है कि यदि भाजपा हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास नहीं करती है, तो उसे यह बात सार्वजनिक रूप से कह देनी चाहिए कि वह हिंदू राष्ट्र में नहीं,बल्कि धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में विश्वास करती है। शशि थरूर,बीजेपी और कांग्रेस के इस त्रिकोणीय बयानबाज़ी के सियासी मायने समझने से पहले ज़रूरी है कि सबसे पहले इस बात कि पड़ताल करें कि आख़िर सच में ऐसी परिस्थितियां हैं कि मुस्लिम पाकिस्तान की तरह भारत एक हिन्दू पाकिस्तान बनने की राह पर है !

पहला सवाल तो यही है कि पाकिस्तान का मतलब आख़िर क्या है कि शशि थरूर को पाकिस्तान जैसे मुल्क को एक रूपक की तरह पेश करना पड़ा है। पहली बात तो दोनों ही मुल्कों के आज़ादी से पहले का इतिहास एक ही है। विरासत और पुरखे साझे हैं,आज़ादी के लिए लड़ी गयी लड़ाई,स्वतंत्रता सेनानी और नारे भी साझे हैं। मगर,आज़ादी मिलने के बाद दो मुल्कों के न सिर्फ़ इतिहास अलग है,बल्कि राजनीतिक-सामाजिक संस्कृति भी अलग-अलग हो गयी है। दोनों देशों की नीतियों के कारण,दुनियां की नज़रों में भारत-पाकिस्तान की न सिर्फ़ घरेलू छवि अलहदा है,बल्कि इनकी विदेश नीतियों के रंग भी जुदा-जुदा है। भारत की उदार छवि के मुक़ाबले पाकिस्तान की छवि धर्म आधारित एक कट्टर इस्लामिक मुल्क की है। भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता का समन्वयवाद यानी सबको साथ-साथ लेकर चलने की ऐतिहासिक सामाजिक-सांस्कृतिक शैली,पूरी व्यवस्था में एक संतुलन वाली लय देती है।

भारतीय विविधाता के ठीक उलट पाकिस्तान की इकहरी चाल,उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक उदारता की गुंजाइश को तार-तार करती है।जम्मू कश्मीर को छोड़कर भारत में अभी तक किसी संगठित आतंकवाद की संभावना कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखायी देती है,लेकिन पाकिस्तान का संगठित आतंकवाद इतना ताक़तवर है कि वह वहां की शासन प्रणाली का मुंह चिढ़ाता है,जब-तब घुटने के बल खड़ा कर देता है, बल्कि कई बार तो ऊंगली पकड़ाकर अपनी राह ले चलता है। पाकिस्तान की सेना का वहां की प्रणाली पर एक तरह से कब्ज़ा है,लेकिन भारत में इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है।

पाकिस्तान का लोकतंत्र,उसकी सेना और वहां का संगठित आतंकवाद, तीनों ही धर्म के ताने-बाने के साथ जुड़े हैं, लेकिन भारत की पूरी बनावट समानता-स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों के ताने-बाने से निर्मित है। इतिहास और समाज की सदियों की साझी विरासत वाले दोनों देश,अपनी-अपनी आज़ादी के बाद अलग-अलग रूपक गढ़ते भी हैं और बनते भी हैं।

अब सवाल उठता है कि क्या वाक़ई भारत के मौजूदा हालात ऐसे हैं कि इसके लिए ‘हिन्दू पाकिस्तान’ जैसा रूपक गढ़ा जाय।इसके लिए ज़रूरी है कि हाल-फिलहाल के घटनाक्रम पर सरसरी निगाह डाली जाय। शशि थरूर के इस बयान के आस-पास घटे एक वाक़ये ने वाक़ई ठहरकर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।यह घटनाक्रम सिर्फ़ सियासी नहीं है,बल्कि समाज की दशा-दिशा की ओर भी एक गंभीर इशारा करता है।

देशभर से मॉब लिंचिंग की घटनाओं की ख़बर आ रही हैं। इस मॉब लिंचिंग के शिकार अनपढ़ और पढ़े लिखे लोग भी हो रहे हैं, लेकिन ज़्यादातर वो लोग हो रहे हैं, जो सामाजिक रूप से हाशिये पर हैं। सत्ता का पहला फ़र्ज़ यही बनता है कि वह अपने नागरिकों को सुरक्षा का अहसास दिलाये। मगर केन्द्र सरकार में नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने कुछ ही दिन पहले उस शख़्स का माला पहनाकर सार्वजनिक रूप से स्वागत किया है,जिस पर झारखंड में रामगढ़ मॉब लिंचिंग का आरोप है।मॉब लिंचिंग की घटनाओं के बीच डरे हुए नागरिकों को सुरक्षा का अहसास दिलाने के बजाय,सरकार में एक ज़िम्मेदार मंत्री ने असुरक्षा के वातावरण को और गहरा करने का संकेत दे दिया है।

इससे पहले केन्द्र सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह ने नवादा जाकर वहां के दंगे के आरोपियों से मुलाक़ात की थी।इसी सिलसिले में जम्मू-कश्मीर में हुये कठुआ बलात्कार कांड के आरोपियों के समर्थन में निकाली गयी रैली को भी याद किया जा सकता है,जिसमें राज्य सरकार में बीजेपी के दो मंत्रियों ने हिस्सा लिया था। गोमांश के बहाने दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के इलाक़े में उग्र भीड़ द्वारा दिया गया अखलाक़ हत्याकांड,राजस्थान के पहलू ख़ान हत्याकांड, राजस्थान का ही अफ़राजुल हत्याकांड जैसे अनेक सिलसिले हैं,जिसे समाज के समन्वय के बिखर जाने के ख़तरे के तौर पर देखा जा सकता है।

इन सभी हत्याकांड में एक सामान्य बात देखी गयी है कि आरोपी को एक हीरो की तरह पेश किया गया है,जबकि विविधता वाले किसी भी समाज के लिए ये शर्मनाक घटनायें हैं।कोई शक नहीं कि इसमें पाकिस्तान बनने की आशंका का बीज जैसा कुछ दिखायी पड़ता तो है,भले ही यह आशंका निर्मूल साबित होती रहे।

मगर आख़िरी सवाल यह कि थरूर के बयान के ख़िलाफ़ बीजेपी का ताल ठोककर फ़्रंटफुट पर आ जाने और कांग्रेस का उस बयान से अपने आपको बचाने की जुगत में बैकफुट पर आ जाने के सियासी मायने क्या हैं।इसकी वजह हाल ही में हुए चुनाव परिणाम और बीजेपी विरोधी पार्टियों के बीच महागठबंधन के आसार में छुपी हुई है। अपने तमाम बड़े चुनावी वायदों के मोर्चे पर असफल महसूस करती बीजेपी ने भांप लिया है कि उन बड़े वायदों को दोहराकर सत्ता में वापसी संभव नहीं है।लिहाज़ा बीजेपी स्पष्ट ध्रुवीकरण चाहती है।थरूर के बयान उस ध्रुवीकरण को पुरज़ोर हवा देता दिखता है।दूसरी तरफ़ कांग्रेस,बनती हुई इस हवा को बवंडर बनने से किसी भी क़ीमत पर रोकना चाहती है।लेकिन इन दोनों ही सियासी दांव-पेंच से अलग थरूर ने वह बातें कह दी है,जो बौद्धिक रूप से तो किसी हद तक करेक्ट हो सकती है,मगर सियासी तौर पर पूरी तरह अनकरेक्ट है। 


 






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