चुनाव आयोग के बाहर सैंकड़ों टीवी सेट ले जाकर न्यूज चैनल ऑन कर दे विपक्ष

रवीश की बात , , रविवार , 19-05-2019


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रवीश कुमार

प्रधानमंत्री की केदारनाथ यात्रा मतदान के दिन प्रभावित करने के अलावा कुछ नहीं है। आज के दिन इस बहाने चैनलों पर लगातार कवरेज हो रहे हैं। ताकि मतदाता को मतदान के पीछे धार्मिक मेसेज दिया जा सके। हमारे देश में चुनाव आयोग तो है नहीं। नाम का रह गया है। वह पहले भी नहीं रोक सका है। यूपी चुनाव के समय प्रधानमंत्री जनकपुर चले गए थे।

विपक्ष टीवी के इस खेल को समझ नहीं पाया। मैं जानता था कि न्यूज़ चैनल यही करेंगे। एक साल पहले कहा था कि 2019 में विपक्ष को मीडिया से लड़ना होगा। विपक्ष के नेता इस उम्मीद में रहे कि उन्हें भी जगह मिल जाएगी। मिली भी लेकिन आप नरेंद्र मोदी और अमित शाह को मिले कवरेज़ की तुलना करें तो विपक्ष के सारे नेता मिलकर आधे तक नहीं पहुंच पाएंगे। अफ़सोस विपक्ष ने मीडिया को लेकर जनता के बीच बात नहीं पहुंचाई।

आज भी कम से कम विपक्ष के बड़े नेता चैनलों के न्यूज़ रूम में पहुंच सकते थे। उनके दरवाज़े के बाहर खड़े होकर निवेदन कर सकते थे कि हमें भीतर आने दीजिए। हम न्यूज़ रूम में घूम कर देखना चाहते हैं कि हेडलाइन कैसे मैनेज होती है। फ़्लैश कैसे बनते हैं। न्यूज रूम में एंकरों से पूछना चाहिए कि ये लगातार शिव पुराण क्यों चल रहा है। क्या ये पत्रकारिता है? मगर विपक्ष के लोगों के पास लोकतंत्र के लिए लड़ने का नैतिक बल नहीं है। बड़े नेता घर पर ही बैठे रहेंगे। नैतिक बल होता तो चुनाव आयोग के मुख्यालय के सामने सैंकड़ों टीवी सेट लेकर पहुंच जाते। टीवी सेट को आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरफ मोड़ कर चैनलों पर जो चला है और चल रहा है उसे दिखाते कि देखिए लोकतंत्र की हत्या हो रही है।

आप जो चैनलों पर देख रहे हैं वह भारत के लोकतंत्र की बची-खुची मर्यादाओं को नष्ट करने का कृत्य है। यह प्रतीक भी है कि अब कुछ नहीं बचा है। यह इशारा है कि आप समझ लें। सब कुछ सामने ही तो है। प्रधानमंत्री ने सबके सामने इंटरव्यू की मर्यादा ध्वस्त कर दी। पहले सवाल मंगाया फिर जवाब दिया। क्या पता अपना सवाल भिजवा दिया हो कि यही पूछना है। हम यही जवाब देंगे। आप नहीं समझ सके। मगर यह आप पर भारी पड़ेगा। आज न कल। इसकी क़ीमत आम जनता चुकाएगी।

इसलिए कहा था कि न्यूज़ चैनल देखना बंद कर दें। बहुतों ने मज़ाक़ उड़ाया। लेकिन मैं अपनी बात इस संदर्भ में कह रहा था। आज भी इस पर क़ायम हूं। चैनलों के इस खेल को समझे बग़ैर आप चुनाव आयोग से लेकर जांच एजेंसियों के खेल को नहीं समझ पाएंगे। क़ायदे से चैनलों के ख़िलाफ़ जन आंदोलन होना चाहिए था। टीवी न देखने का सत्याग्रह होना चाहिए था। मुझे पता है कि आप लोकतंत्र के मोल की जगह तानाशाही में ख़ूबी ढूंढ लेते हैं लेकिन मुझे पता है कि आप ग़लती कर रहे हैं।

हम चैनलों को बदल नहीं सके। न बदल सकते थे। मगर जो लगा वो कहा। जो देखा वो आपके बीच रखा। यह जानते हुए भी कि रहना इसी ख़राबे में है। 2007 से लिखा। आम जनता अब चैनलों के फैलाए झूठ में फंस चुकी है। चैनलों के मालिक और एंकर सरकार का खिलौना हैं। उन्हें बहुत लाभ भी मिला। इन लोगों ने साबित किया कि पत्रकारिता के व्याकरण को बदला जा सकता है। सब कुछ दांव पर लगाकर कहा कि आप न्यूज़ चैनल न देखें। कुछ हुआ या नहीं, यह शोध का विषय है लेकिन कहने की ज़िम्मेदारी पूरी की। सामने से कहा कि चैनलों पर पांच रूपया ख़र्च न करें। वहां पत्रकारिता हो ही नहीं सकती। उसका ढोंग होगा या फिर प्रोपेगैंडा होगा। चैनलों पर जो आप पांच रुपया ख़र्च करते हैं, कुलमिलाकर आप चार सौ पांच सौ ख़र्च करते हैं वो आप किसी ग़रीब को दे दीजिए। आपका पैसा सही काम आएगा। भारत के लोकतंत्र को बर्बाद करने के लिए आप अपनी कमाई से सब्सिडी न दें।

इसलिए आज फिर कहता हूं कि न्यूज़ चैनल बंद कर दें। वो आपके मताधिकार के विवेक के सामने झाड़ू घुमाकर तंत्र मंत्र करने लगे हैं। आपको मूर्ख समझते हैं। आप अगर देख भी रहे हैं तो देखिए कि कैसे डिबेट के नाम पर आपको जानने के लिए कुछ नहीं मिलता है। वही बकवास चलता रहता है और आप जानकारी के नाम पर उसके बकवास को दोहराते रहते हैं। रिपोर्टर का नेटवर्क ध्वस्त है। सरकारी पक्ष के सवालों पर बहस होती है। बहस के सवाल भी मोटा-मोटी फ़िक्स हैं। आप खुद से पूछिए कि क्या मिल रहा है देखने से। व्हाट्स एप की तरह चैनल भी रोग हो गए हैं। कुछ मिलता नहीं मगर लगता है कि पढ़ रहे हैं। जान रहे हैं। स्क्रोल करते रहते हैं। मेसेज आगे पीछे करते रहते हैं। आप चेतना और सूचना शून्य बनाए जा रहे हैं। सावधान हो जाइये।

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

 








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