छोटे कद की महिला का बड़ा कारनामा

शख्सियत , , शुक्रवार , 17-05-2019


modi-shah-mamta-banarjee-women-west-bengal-left-congress-bjp

सीमा मुस्तफा

ममता बनर्जी ने पहली बार अपनी उपस्थिति कम से कम दिल्ली में तब महसूस कराई, जब उन्होंने कांग्रेस के एक सांसद के रूप में खुद को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से जोड़ा। और शीघ्र ही खुद को कांग्रेस की "हल्ला बोल ब्रिगेड" के एक प्रमुख सदस्य के रूप में स्थापित किया, जैसा कि हम संसद को कवर करने वाले पत्रकार ऐसे सांसदों को कहते थे। जल्दी ही ममता की ऊंचे ही उठते स्वरों ने बाकी सभी आवाजों को कहीं बहुत नीचे डुबो दिया और किसी विपक्षी दल के सदस्य को कांग्रेस पार्टी पर हमला जारी रखना असंभव बना दिया। वास्तव में यह ऐसा हो गया कि जब भी ममता बनर्जी खड़ी होतीं, सभी विपक्षी दल के सदस्य अमूमन एक मूक कराह के साथ बैठ जाते। इसके बाद ममता बनर्जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

वह कमजोर छोटे कद की महिला जब खड़ी हुई तो अपने बल पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई। न कोई गॉड फादर था, ना ही कोई मेंटर, न पिता और ना ही कोई पार्टी थी खुद के पास। जुनून और दृढ़ ईच्छाशक्ति के बल पर 1998 में ममता ने तृणमूल कांग्रेस बनाई, अपने गृह राज्य की जनभावनाओं को अपने कब्जे में किया और आज केंद्र में आसीन दोनों बलशाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से दो-दो हाथ करने पर आमादा हैं, जिन्होंने अपनी समूची ताकत ममता बनर्जी को रोकने के लिए लगा रखी है। कोई भी एक ऐसा नेता नहीं, शायद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सिवा- जिसे प्रारंभ से ऐसे बर्बर हमले झेलने पड़े हों। इस चुनाव में उन्हें हर तरह के व्यंग्य बाण, गालियों का सामना करना पड़ा है क्योंकि इस चुनाव में न सिर्फ आरएसएस-बीजेपी की संयुक्त ताकत से मुकाबला था बल्कि कांग्रेस और लेफ्ट की ताकत भी ममता के खिलाफ थी। दशकों से ममता बनर्जी ने सामने से खड़े होकर अदम्य साहस का लगातार परिचय दिया है और कभी भी किसी के पीठ पीछे छुपकर अपनी लड़ाई नहीं लड़ी है।

अकेले अपनी पार्टी के दम पर जहां किसी भी छोटे और बड़े दल का कोई समर्थन नहीं है, यहां तक कि कांग्रेस और वामपंथी कैडरों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय भाजपा के गुंडों के साथ हाथ मिलाया है। किसी भी विपक्षी दल के नेता से पूछ लें। पिछले पांच वर्षों में मोदी-शाह से मुकाबला करना कत्तई आसान नहीं रहा, क्योंकि घृणा अभियान जिसका मुकाबला करना हमेशा मुश्किल होता है के अलावा, वे अपने विरोधियों के खिलाफ सरकारी तंत्र की ताकत का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकिचाते। 

केंद्रीय जांच ब्यूरो को एक कोड़े की तरह हवा में हर बार लहराया गया है, रास्ते में कई विपक्षी नेताओं को उकसाया गया। ममता की अपनी पार्टी नेताओं ने जेलों को अंदर से देखा है और उन खतरों को महसूस किया है। लेकिन अब वो उसे झुका नहीं सकतीं, उल्टा बीजेपी को अपनी शर्तों पर मुकाबले में आर पार की लड़ाई में खड़ा करने के लिए और तीक्ष्णता प्राप्त हुई है। पिछले दो दिनों में यह स्पष्ट था, जब अमित शाह ने एक विशाल रोड शो का आयोजन किया जिसे स्थानीय मीडिया ने जोर देकर बताया कि इस रोड शो में बाहर से लाए गए लोगों को भी शामिल किया गया था। इस रोड शो में हिंसा होकर रहेगी यह करीब करीब तय था, जो जब छलका तो चुनाव आयोग ने चुनाव के अंतिम चरण के मतदान के लिए प्रचार अभियान को समाप्त कर दिया। समूचा विपक्ष मुख्यमंत्री के साथ चुनाव आयोग के इस कदम के विरोध में शामिल हो गया है और उसके अनुसार, "चुनाव आयोग के इस फैसले के कारण यह एक आपातकालीन स्थिति पैदा हो गई है ... यह चुनाव आयोग का फैसला नहीं है, यह भाजपा का फैसला है। मोदी मुझसे भयभीत हैं और बंगाल के लोगों से भयभीत हैं।"

अमित शाह ने मंगलवार सुबह दबाव बनाया और आयोग को धमकी दी ... क्या यह आदेश उसी धमकी का परिणाम है? " माना ये जा रहा था कि इस हिंसा के कारण ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है, लेकिन कथित तौर पर तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने और राष्ट्रीय मीडिया के समर्थन के बावजूद भाजपा इसमें सफल नहीं हो पाई है। 

विद्यासागर की मूर्ति को तोड़ते हुए वीडियो में भगवा पहने लोगों की तस्वीरें अमित शाह के दावों की पोल खोल चुकी हैं, और अब दोष तृणमूल कांग्रेस से हटकर भाजपा पर शिफ्ट हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विद्यासागर की भव्य प्रतिमा बनाने के आह्वान के और अमित शाह के तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा मूर्ति तोड़ने के दावों पर जोर देने के बावजूद यह दाग बंगाल में नहीं छूट रहा है। प्रतीक सिन्हा ने AltNews में फर्जी ख़बरों के निर्माण की ओर इशारा किया है, और पर्याप्त सबूत जुटाए हैं कि हिंसा के इस विशेष खंड के पीछे भाजपा कार्यकर्ता ही शामिल थे। चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित समय सीमा से पहले पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार पर रोक लगाने की घोषणा का विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया है और पूछा है कि एक दिन बाद शाम 5 बजे के बजाय रात 10 बजे से प्रतिबंध क्या सिर्फ इसलिए लगाया गया है ताकि पीएम मोदी की चुनावी सभाओं को समायोजित किया जा सके? हालांकि, ममता बनर्जी ने इसका जवाब केवल शब्दों के साथ नहीं दिया है, बल्कि स्पष्ट तौर पर घोषणा कर दी है कि - "चुनाव आयोग भाजपा के हिसाब से काम कर रहा है" - लेकिन चुनाव आयोग ने कार्रवाई के तौर पर मोदी की चुनावी सभा के हिसाब से नया टाइम टेबल बनाई है।

खबरों के मुताबिक, एसपीजी ने चिंता व्यक्त करते हुए पत्र जारी किया है। समूचा विपक्ष आज पश्चिम बंगाल के सीएम के साथ खड़ा है। मायावती ने इसे मोदी और शाह का बनर्जी पर "सुनियोजित हमला" करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि यह "देश के प्रधान मंत्री पद को गिराना है।" उन्होंने आगे कहा, चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन आज रात 10 बजे से सिर्फ इसलिए क्योंकि पीएम की दिन में दो रैलियां पूर्व निर्धारित हैं। फिर आज की सुबह से क्यों नहीं? यह अनुचित है और चुनाव आयोग दबाव में काम कर रहा है। ” अहमद पटेल सहित कांग्रेस नेताओं ने भी बयान जारी कर कहा कि यह निर्णय पीएम की रैलियों को समायोजित करने के लिए था। पार्टी ने इसे "संविधान के साथ अक्षम्य विश्वासघात" करार दिया है।  और चुनाव की आदर्श आचार संहिता "मोदी आचार संहिता" में बदल चुकी है। 

ममता बनर्जी हिंसा और पीएम मोदी द्वारा सीधे अपने ऊपर किए गए हमले के बावजूद, जिन्होंने अपनी बाद की सभी चुनावी रैलियों में ममता को निशाना बनाया, सहम कर नहीं बैठीं। वह हिंसा की जगह पर तुरंत गईं, एक प्रतिवाद रैली आयोजित की, और मथुरापुर में प्रधानमंत्री की निर्धारित बैठक से कुछ किलोमीटर दूर एक सार्वजनिक बैठक आयोजित करने की घोषणा की। मुख्यमंत्री अचना में एक सभा कर रही हैं, जिसके कारण SPG को संभावित झड़प की आशंका है। कोलकाता से मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों मीटिंग का समय भी करीब करीब एक था। विपक्षी नेताओं ने स्वीकार किया है कि ममता बनर्जी कड़ी टक्कर दे रही हैं। "वह एक मानव डायनेमो हैं," एक कांग्रेस नेता ने कहा। कांग्रेस पार्टी उनके खिलाफ पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ रही है, लेकिन उनकी ऊर्जा ने बंगाल में प्रशंसा अर्जित की है। जितना उन्हें मिल रहा है बदले में वे उतना ही दे रही हैं, और पार्टी समर्थक शांति पूर्वक उनके हर जवाब की सराहना कर रहे हैं।

पिछले कुछ दशकों से चुनावी हिंसा पश्चिम बंगाल के परिदृश्य का हिस्सा रहा है, इसलिए स्थानीय स्तर पर यह उतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितना यह दिल्ली और मीडिया को दिख रहा है। इस प्रचार और कु प्रचार से "दीदी" पर दबाव नहीं डाला जा सकता है और गृहराज्य में उनकी लोकप्रियता बरकरार है। शाह और प्रधानमंत्री द्वारा बोले गए हर शब्द का जवाब ममता बनर्जी ने लगातार दिया है जो पश्चिम बंगाल को एकछत्र शासक के रूप में चला रही हैं। एक बीजेपी कार्यकर्ता को मेमे के लिए गिरफ्तार करने से लेकर --- जिस एक्शन के लिए उन्हें अपने कुछ बौद्धिक समुदाय की आलोचना भी सुनने को मिली से लेकर योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं को सभा ने करने देने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हुए, हर मोर्चे पर भाजपा को एक टांग पर खड़ा रखने पर मजबूर कर दिया है - छोटे कद की इस महिला ने स्पष्ट कर दिया है कि वह उस चालबाजी के आगे झुकने के लिए मजबूर नहीं की जा सकती जिसने पूरे भारत में कई राजनीतिज्ञों को सर झुकाने पर मजबूर कर दिया। "ममता असहिष्णु हैं" पीएम मोदी गरजते हैं। लेकिन ममता कहती हैं, यह जनता तय करेगी।

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफा ने लिखा है और इसे दि सिटीजन वेबसाइट से साभार लिया गया है। अग्रेंजी के इस मूल लेख का अनुवाद स्वतंत्र टिप्पणीकार रविंद्र सिंह पटवाल ने किया है।)

रविंद्र सिंह पटवाल।








Tagmamtabanarjee women westbengal left congress

Leave your comment