नॉर्थ ईस्ट डायरी: राष्ट्रीय पार्टियों का अखाड़ा बना पूर्वोत्तर

राजनीति , , सोमवार , 01-04-2019


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दिनकर कुमार

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के लिए विधानसभा या लोकसभा चुनाव का मतलब महज प्रतिनिधियों को चुनना नहीं होता, बल्कि इसके जरिये वे अपनी आशाओं-आकांक्षाओं को भी व्यक्त करते हैं। हो सकता है कि उनके मन में इस तरह की चुनाव प्रणाली के प्रति क्षोभ का भाव हो, लेकिन इस बात पर उनका पक्का यकीन है कि चुनाव में भागीदारी के जरिये ही उनके लिए रोजगार और जीविका का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। आज़ादी के बाद से ही जिस अंचल के लोगों को जातीय हिंसा, उग्रवाद और भ्रष्टाचार के साये में जीने के लिए मजबूर होना पड़ा है, उनके लिए सरकारी नौकरी या नई सरकार का गठन होना उम्मीद की किरण की तरह है। यही वजह है कि देश की मुख्यधारा से अलग-थलग रहने वाले और आर्थिक विकास से पूरी तरह वंचित पूर्वोत्तर के लोग चुनाव की प्रक्रिया में शामिल होना जरूरी समझते हैं। 

17 वें लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान जैसे-जैसे तेज होता जा रहा है देश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने उत्तर पूर्व के राज्यों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। अगर पीछे मुड़ कर देखा जाए तो साफ पता चलता है कि कभी भी लोकसभा चुनाव के दौरान पूर्वोत्तर राज्यों की सीटों के लिए राजनीतिक दलों ने इतनी गहरी दिलचस्पी नहीं दिखाई थी जिस तरह इस बार दिखा रही हैं। पहले ऐसा होता था कि बड़ी पार्टियों के वरिष्ठ नेता एक या दो चुनावी रैली को संबोधित करते थे और इसी के साथ प्रचार अभियान समाप्त हो जाता था। इसके पीछे यही कारण था कि राजनीतिक पार्टियां देश के बड़े राज्यों पर अपना ध्यान केंद्रित करती थीं, जहां लोकसभा सीटें ज्यादा हैं। जिन राज्यों में 1 या 2 सीटें हैं उनकी तरफ ध्यान देना जरूरी नहीं समझती थीं।  

पहले के चुनावों में अगर थोड़ा बहुत ध्यान पूर्वोत्तर का कोई राज्य आकर्षित करता था तो वह असम था, क्योंकि इस राज्य में लोकसभा की 14 सीटें हैं। मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर व अरुणाचल प्रदेश में लोकसभा की दो-दो सीटें हैं और इनकी तरफ प्रमुख राजनीतिक पार्टियां कोई खास तवज्जो नहीं देती थीं। ऐसे कई लोकसभा चुनाव के उदाहरण हैं जब अखिल भारतीय राजनीतिक पार्टी के किसी नेता, अध्यक्ष, प्रधानमंत्री ने नगालैंड, मिजोरम या सिक्किम का दौरा करने की जरूरत नहीं समझी क्योंकि इन राज्यों में लोकसभा की एक एक  सीट हैं।  

लेकिन समय गुजरने के साथ राजनीतिक पार्टियों ने महसूस करना शुरू कर दिया है कि उनके लिए एक-एक सीट की भी काफी अहमियत है। पिछले दिनों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जो विधानसभा के चुनाव हुए उनमें मतदाताओं ने भाजपा को सत्ता से हटा दिया। इस तरह की शिकस्त की वजह से लोकसभा चुनाव में एक-एक सीट भाजपा के लिए काफी अहमियत रखती है। एक और बड़े राज्य तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल एक ही सीट पर जीत हासिल हुई। पूर्वोत्तर राज्यों में शुरू से ही अधिकतर लोकसभा सीटों पर कांग्रेस जीत हासिल करती रही है। अब जबकि देशभर में भाजपा की लोकप्रियता घटती जा रही है वह पूर्वोत्तर राज्यों की सीटों पर जीत हासिल करने के लिए जोर लगा रही है। 

पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में लोकसभा की कुल 25 सीटें हैं जो भाजपा के लिए काफी अहमियत रखती हैं। असम में लोकसभा की कुल 14 सीटें हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सात सीटों पर जीत हासिल की थी। उस समय असम में कांग्रेस की सरकार थी। इस समय राज्य में भाजपा की सरकार है और पार्टी उम्मीद कर रही है कि वह 12 सीटें जीतने में सफल हो जाएगी। पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में भी भाजपा अपने सहयोगी दलों की जीत की उम्मीद रख रही है और उसका मानना है कि वह 25 में से 19 या 21 सीटें हासिल कर लेगी।

भले ही भाजपा 21 सीटें जीतने का दावा कर रही है, लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर भाजपा के खिलाफ लोगों के मन में आक्रोश है और इसका खामियाजा चुनाव में उसे भुगतना पड़ सकता है। इस विधेयक के विरोध में समूचा पूर्वोत्तर सुलग उठा था और पूर्वोत्तर में भाजपा के सहयोगी दलों ने उसका साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। तीव्र विरोध को देखते हुए भाजपा ने आखिरकार इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया, लेकिन वह बार-बार घोषणा कर रही है कि फिर सत्ता में आने पर वह इस विधेयक को जरूर पारित करेगी। इस बात को लेकर स्वाभाविक रूप से पूर्वोत्तर के लोग आशंकित हैं और चुनाव में वे भाजपा को प्रत्युत्तर दे सकते हैं। 

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पूर्वोत्तर राज्यों में कई चुनावी रैलियों को संबोधित किया है और आने वाले दिनों में भी करने वाले हैं। ये बड़े नेता छोटी-छोटी जगहों पर भी जाकर चुनावी रैली को संबोधित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर अरुणाचल प्रदेश के आलो और बूमरा जैसे स्थान को इन्होंने चुनावी रैली के लिए चुना। ऐसा सिर्फ भाजपा ही नहीं कर रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, जो उस समय पार्टी के उपाध्यक्ष थे, ने अपना चुनावी अभियान अरुणाचल प्रदेश के जीरो नामक स्थान से शुरू किया था।

हालांकि उस चुनाव में कांग्रेस को कोई खास फायदा पूर्वोत्तर में नहीं हुआ। माना जा रहा है कि अगले हफ्तों में पूर्वोत्तर के लोग राष्ट्रीय स्तर के कई नेताओं को चुनावी रैली करते हुए देखेंगे। ये नेता दिलफरेब वायदे कर पूर्वोत्तर के मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश करेंगे। इससे साफ पता चलता है कि पूर्वोत्तर का इलाका आखिरकार राष्ट्रीय पार्टियों और उसके नेताओं का ध्यान आकर्षित करने में सफल हो रहा है।  

पहले जब वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री थे तब राष्ट्रीय पार्टियों का ध्यान इस क्षेत्र की तरफ आकर्षित हुआ था क्योंकि उनके कार्यकाल में गठबंधन की सरकार बनी थी और सरकार को बनाने में पूर्वोत्तर क्षेत्र के सांसदों का भी योगदान रहा था।उस समय कोई भी पार्टी सदन में अपना बहुमत अपने बलबूते पर सिद्ध करने में सक्षम नहीं थी। भाजपा ने भी संभवत: यह सबक सीखा है कि बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में छोटे राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां सरकार बनाने में मददगार साबित हो सकती हैं। भले ही 1 या 2 सीट ही क्यों न हो लेकिन समय आने पर इस तरह की सीटों का उपयोग किया जा सकता है।

(दिनकर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और सेंटिनेल के तकरीबन 14 वर्षों तक संपादक पद पर काम कर चुके हैं। आप आजकल गुवाहाटी में रहते हैं।) 

 








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