किसके पास है भारत का स्वामित्व ?

विशेष , , बृहस्पतिवार , 20-12-2018


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चंद्रप्रकाश झा

स्वतंत्र भारत संघ- गणराज्य है। यह हम सब जानते और मानते हैं। लेकिन इसका स्वामित्व किसके पास है ? यह सवाल 26 मई 2014 को मोदी सरकार के कायम होने के बाद से उठने लगे हैं। क्योंकि देश की आबादी के एक बहुत ही छोटे हिस्से की बढ़ती समृद्धि को भारत की आर्थिक स्थिति की सुदृढ़ता का सूचक बताया जाने लगा है। मोदी जी के शासन काल में भारत के विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने का ढिंढोरा पीटा जाने लगा है। इसकी शुरुआत स्वयं मोदी जी ने इस वर्ष भारत के 72 वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिल्ली में लाल किले की प्राचीर से दिए अपने भाषण में की थी । 

भारत को विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बन जाने का यह ' सौभाग्य ' देश में पिछले वर्ष के दौरान निजी संपत्ति में 1646 खरब डॉलर की वृद्धि के आधार पर मिला है। ऑक्सफैम की जनवरी 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार इस वृद्धि का 74 प्रतिशत हिस्सा , 101 खरबपतियों के पास है। इन खरबपतियों में से अनेक मोदी जी के बहुत करीबी हैं।  आर्थिक जगत में प्रतिष्ठित पत्रिका, फ़ोर्ब्स के अनुसार उद्योगपति, मुकेश अम्बानी की निजी संपत्ति 2017 में 67 प्रतिशत बढ़कर , 38 खरब डॉलर हो गयी।

मोदी जी के एक और बहुत ही करीबी माने जाने वाले  उद्योगपति , गौतम अडानी की निजी संपत्ति एक साल में तीन गुना बढ़कर 11 खरब करोड़ डॉलर हो गयी। मोदी जी के करीबी , बाबा रामदेव की पतंजलि लिमिटेड के साझीदार बालकृष्ण , खरबपतियों की सूची में ढाई खरब डॉलर की निजी संपत्ति के साथ दुनिया में 814 वें सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं। एक वर्ष पहले की फ़ोर्ब्स सूची में उनका नाम तक नहीं था।  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांचवे मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा 1639 में निर्मित लाल किले से अपने भाषण में इतिहास ही नहीं आर्थिक-वित्तीय बातों में भी गड़बड़ियां की। भारत की आर्थिक -वित्तीय समृद्धि के उनके दावे अर्थशास्त्र के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं । उनके भाषण में नोटबंदी जैसे बहुतेरे ज्वलंत आर्थिक मुद्दे लगभग गायब थे। किसी को भी उनकी आर्थिक बातों का कोई भी वस्तुनिष्ठ एवं सत्यपरक विश्लेषण  करते समय यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि मोदी सरकार ने अपने  मौजूदा शासनकाल के पांचवें और आखरी समझे जाने वाले बरस के आते -आते अपने स्वयंसिद्ध अर्थाभाव में लाल किले को ही वित्तीय ' देखरेख ' के लिए डालमिया उद्योग समूह की एक कम्पनी को ठेके पर दे दिया है ।

मोदी जी ने दम्भ में कहा कि पिछले 4 साल में देश बदलाव महसूस कर रहा है , दोगुने रफ्तार से हाइवे , रेलवे बना रहा है , चार गुना नए मकान बना रहा है ,  रेकॉर्ड अन्न उत्पादन कर रेकॉर्ड तोड़ मोबाइल फोन बना रहा है , ट्रैक्टर की रेकॉर्ड बिक्री हो रही है , हवाई जहाज की रिकॉर्ड खरीदारी हो रही है ,  नए -नए आईआईटी, आईआईएम,  एम्स बना रहा है ,  टायर-2 और टायर -3 नगरों में  में ' स्टार्टअप्स ' उद्यमियों की बाढ़ आ गई है , डिजिटल इंडिया योजना पर काम  बढ़ रहा है ,  बंद सिंचाई योजनाओं को शुरू किया जा रहा है , व्यापारियों के सहयोग से जीएसटी लागू कर दिया है।

उन्होंने यह भी कहा कि 2014 से पहले दुनिया कहती थी कि भारत की अर्थव्यवस्था में जोखिम है, लेकिन आज दुनिया कहती है भारत ' मल्टी ट्रिल्यन ' डॉलर निवेश का गंतव्य बन गया है , हमारे  नौजवानों ने ' नेचर ऑफ जॉब ' को बदल दिया है ,  13 करोड़ मुद्रा लोन दिया गया है। इनमें 4 करोड़ लोग ऐसे हैं , जिन्होंने पहली बार लोन लेकर स्वरोजगार शुरू किया है , हम किसानों की आय दोगुना करना चाहते हैं ,  हम बीज से लेकर बाजार तक का आधुनिकीकरण करना चाहते हैं ,  कृषि उत्पाद निर्यात नीति तैयार करने जा रहे हैं,  शहद का निर्यात दोगुना हो चुका है, इथेनॉल का उत्पादन तीन गुना हो गया है , खादी की बिक्री डबल हो गई है , हैंडलूम का रोजगार बढ़ा है।

उनका कहना था ,  " मैंने इसी लाल किले से स्वच्छता की बात कही थी तो कुछ लोगों ने मजाक बनाया था।  लेकिन डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वच्छता की वजह से भारत में तीन लाख लोगों की जिंदगी बची है। पिछले 2 साल में भारत में पांच करोड़ लोग , गरीब रेखा से बाहर आए। हमने गरीबों के लिए कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन बिचौलिए गरीबों का लाभ उस तक पहुंचने नहीं देते ,  बाजार में गेहूं की कीमत ( प्रति किलो ) 24-25 रुपये है। सरकार इस दर पर खरीदकर केवल 2 रुपये में गरीब को देती है।

चावल 30-35 रुपये में लेकर 2 रुपये में गरीब तक पहुंचाती है। प्रत्यक्ष टैक्सदाताओं की संख्या 2013 तक 4 करोड़ थी , आज पौने 7 करोड़ है, अप्रत्यक्ष कर 70 सालों में 70 लाख था, जीएसटी के बाद एक साल में यह आंकड़ा 1 करोड़ 16 लाख पहुंच गया। करीब 3 लाख फर्जी कंपनियां बंद कर दी गईं। 2013 की रफ्तार को यदि हम आधार मान लें तो सबके लिए शौचलय निर्माण में दशकों लग जाते , बिजली पहुंचाने में 1-2 दशक और लगते , एलपीजी गैस कनेक्शन देने में 100 साल लगता। ऑपटिकल फाइबर बिछाने में पीढ़ियां लग जातीं।

लेकिन उनके भाषण के अर्थशास्त्रीय विश्लेषण से उनके दावे में छुपा कड़वा सच जाहिर हो जाता है। मोदी जी की आर्थिक घोषणाओं में कुछ सत्यातीत हैं और अधिकतर यथार्थ से परे हैं । मसलन उन्होंने कहा कि भारत वर्ष 2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजेगा। सब जानते हैं कि भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा 1984 में ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और पूर्ववर्ती सोवियत संघ के इंटरकॉसमॉस कार्यक्रम के संयुक्त अभियान में आठ दिन तक अंतरिक्ष में रहे। उन्होंने अंतरिक्ष से ही भारत की तत्कालीन  प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बातचीत भी की थी।

मोदी जी ने देशवासियों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए ' प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ' को पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जन्मदिन पर 25 सितंबर 2018 से लागू करने का ऐलान किया। इस योजना के तहत देश के सवा सौ करोड़ से अधिक आबादी के 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपये के वार्षिक बीमा योजना की कलई पहले ही खुल चुकी है। यह दोहराने की जरुरत नहीं है कि फसल बीमा योजना की ही तरह यह योजना भी भारत में लोक कल्याण  के लिए नहीं बल्कि बीमा कंपनियों के अधिक से अधिक मुनाफे के लिए ही है।

सवाल है कि भारत संघ - गणराज्य की अर्थव्यवस्था को राजकीय अथवा सार्वजनिक नहीं बल्कि चंद लोगों की निजी संपत्ति के आधार सुदृढ़ करने वाली व्यवस्था कैसे माना जा सकता है ?  भारत के संविधान के अनुसार इस संप्रभुता सम्पन्न गणराज्य का स्वामित्व , ' हम भारत के लोग ' के पास है। ' हम भारत के लोग ' पदबंध  देश के लोगों को सर्वोपरि उद्घोषित करता है। ऐसा पदबंध संभवतः विश्व के किसी देश के संविधान में नहीं है। निश्चय ही देश के संवैधानिक संसदीय लोकतंत्र में सर्वोपरि तंत्र नहीं बल्कि लोक है। इसलिए अगर भारत में लोकसंपत्ति की जगह निजी संपत्ति बढ़ने से उसकी अर्थव्यवस्था के सम्बल में वृद्धि का गुमान होने लगे तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत में लोक पर तंत्र काबिज है ?  क्या भारत विदेशी औपनिवेशिकता से स्वतंत्र होने के 72 वें वर्ष में ' आंतरिक उपनिवेशवाद ' की तरफ बढ़ रहा है?

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और बहुत सालों तक प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी यूएनआई में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके हैं।)     








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