आम चुनाव : " कुछ भी मुमकिन है "

साप्ताहिकी , , बृहस्पतिवार , 28-02-2019


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चंद्र प्रकाश झा

नई दिल्ली। भारत की 17 वीं लोकसभा के आगामी मई तक निर्धारित चुनाव,  पुलवामा में आतंकी हमला और उसके बाद के घटनाक्रम का ' बदला' लेने के लिए बढ़ते युद्धोन्माद के बीच स्थगित करने की कुछ हल्कों में उठी मांग पर निर्वाचन आयोग अथवा मोदी सरकार की ओर से अभी तक अधिकृत रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है। लेकिन जिस तरह से भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के क्षेत्र में कथित आतंकी अड्डों पर मंगलवार को बमबारी की और उसके दूसरे दिन  पाकिस्तान ने एक भारतीय युद्धक विमान के पायलट को गिरफ़्तार कर लिया उससे दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। ख़तरा यह भी है कि भारत में वाह्य अथवा आंतरिक कारणों से आपातकाल घोषित करने की नौबत न आ जाए। ऐसे में लोकसभा चुनाव के समय को लेकर जो संशय उठ खड़े हुए हैं वे अस्वाभाविक नहीं हैं।

पुलवामा में आतंकी हमले में सुरक्षा बलों के 40 से अधिक जवानों की मृत्यु पर देश में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा, जो सड़कों पर भी सामने आने लगा। ऐसी खबरें विभिन्न समाचार माध्यमों से देश के कई स्थानों से मिली है। जम्मू कश्मीर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक काफिले पर आतंकवादी फ़िदायी हमले में इस बल के जवानों की मृत्यु हो गई। आतंकी गुट, जैश-ए-मोहम्मद के एक आत्मघाती हमलावर ने पुलवामा जिले में विस्फोटकों से भरे अपने वाहन को सुरक्षाबलों के काफिले की एक बस से टकरा दिया था।

युद्धोन्माद के इस माहौल में गुजरात के वन,आदिवासी विकास एवं पर्यटन मंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ प्रांतीय नेता गणपत सिंह वसावा ने कहा है कि पुलवामा हमला का बदला लेने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ तत्काल जवाबी कार्रवाई जरूरी है, चाहे इसके लिए आगामी लोक सभा चुनाव विलंब से करानी पड़े। उन्होंने  सूरत में एक जनसभा में कहा कि यदि चुनाव में दो महीने की देरी होती है तो भी ठीक है। लेकिन पाकिस्तान को एक सबक सिखाया ही जाना चाहिए। वसावा ने गुजराती में कहा, ''अत्यारे चुनाव रोकी दो, अने पाकिस्तान ने ठोकी दो" (आगामी चुनाव को रोक दो और पाकिस्तान को ठोक दो)। सवाल स्पष्ट है कि क्या 'पुलवामा में आतंकी हमला का बदला'  लेने के लिए 17 वीं लोकसभा के चुनाव रोक दिए जाने की वास्तविक जरुरत पड़ गई है। यह इंगित करना जरुरी है इस आतंकी हमले के बाद से उसके आम चुनाव पर संभावित और असंभावित असर के बारे में मीडिया और ख़ास तौर पर टीवी चैनलों पर तीखी बहस शुरू हो गई।

गौरतलब है कि भारत को चुनाव के ऐन पहले युद्ध का सामना पूर्व में भी करना पड़ा है। बारहवीं लोकसभा में 21 मार्च,1999 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार लोकसभा में विश्वास मत एक वोट से हार गई तो राष्ट्रपति ने विधिवेत्ताओं के परामर्श से निर्वाचन आयोग को 13 वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव कराने के आदेश दे दिए थे। निर्वाचन आयोग  ने घोषणा कर दी थी कि चुनाव सितंबर- अक्तूबर में होंगे। लेकिन बीच में ही भारत और पाकिस्तान के बीच करगिल की लड़ाई शुरू हो गई। चुनाव कार्यक्रम में देरी हो गई। लेकिन निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव सितम्बर -अक्टूबर में कराने के कार्यक्रमों की घोषणा के साथ ही चुनाव प्रक्रिया फिर पटरी पर आ गई। परिणाम भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस गठबंधन के पक्ष में गए। एनडीए ने लोकसभा की 545 में से  303 सीटें जीती। ध्यान देने की बात है कि चुनाव कार्यक्रम, टीवी चैनलों को नहीं बल्कि निर्वाचन आयोग को तय करना है और उसने कारगिल की लड़ाई के बीच में आ जाने के बावजूद चुनाव की प्रक्रिया तनिक विलम्ब से ही सही, पूरी की।

इसलिए मौजूदा हालात में जब तक युद्ध की कोई वास्तविक स्थिति नहीं है आम चुनाव स्थगित करने का कोई औचित्य नज़र नहीं आता। वैसे भी जानकार लोग कहते हैं भाजपा का शीर्ष नेतृत्व चुनाव टाले जाने की मांग को लेकर शायद ही सहमत हो। क्योंकि युद्धोन्माद से उसे चुनावी फायदा हो सकता है। पुलवामा प्रकरण के बाद शनिवार को विपक्षी दलों की केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में बुलाई गयी बैठक में राष्ट्र के साथ पूर्ण एकजुटता व्यक्त की गई।  लेकिन बैठक में आम चुनाव स्थगित करने के बारे में किसी ने कोई विचार नहीं व्यक्त किया। पुलवामा आतंकी हमला के बाद सत्ता पक्ष की ओर से संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र बुलाने की भी चर्चा उठी थी जिसके बारे में और खुलासा नहीं किया गया है।  

इस बीच, केंद्रीय गृह मंत्रालय के सचिव राजीव गौबा और अन्य अधिकारियों की एक टीम ने पुलवामा में आतंकी हमला के बाद देश में और ख़ास कर जम्मू - कश्मीर की विध्यमान सुरक्षागत स्थितियों से हाल में निर्वाचन आयोग को से अवगत कराया। इस टीम ने निर्वाचन आयोग को देश में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति के साथ ही नई लोक सभा के चुनाव के लिए सुरक्षा बलों की उपलब्धता के बारे में भी अवगत कराया। लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की विधान सभा के भी नए चुनाव कराये जाने की संभावना है। सिक्किम विधान सभा का 27 मई, अरुणाचल प्रदेश विधान सभा का एक जून,ओडिशा विधान सभा का 11 जून और आंध्र प्रदेश विधान सभा का 1 मौजूदा कार्यकाल 8 जून को समाप्त होगा। जिन राज्यों की मौजूदा विधान सभा का कार्यकाल शेष है वहां की भी सरकारें अपने मंत्रिमंडल से प्रस्ताव पारित करवा कर नया चुनाव कराने की अनुशंसा कर सकती हैं। तत्काल स्पष्ट नहीं है कि किस राज्य में समय से पहले चुनाव कराने की संभावना है। गौरतलब है कि हाल में तेलंगाना में राज्य सरकार की अनुशंसा पर समय से कुछ पहले ही विधान सभा चुनाव मिजोरम, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ कराये गए।

जम्मू -कश्मीर विधान सभा के भी नए चुनाव लंबित हैं , जो नवम्बर  2018 से भंग है। उसकी विधान सभा को भंग करने के छह माह के भीतर यानि आगामी मई तक नए चुनाव कराये जाने है। जम्मू -कश्मीर की विधान सभा का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। इसलिए पिछले चुनाव के बाद गठित उसकी विधान सभा का कार्यकाल मार्च 2021 में समाप्त होना था। लेकिन राज्य में सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनज़र वहां नए चुनाव कराने में जटिलताएं है। मौजूदा लोकसभा में राज्य की अनंतनाग सीट पर उपचुनाव सुरक्षा कारणों से ही 2016 से ही लंबित है। अनंतनाग, जम्मू कश्मीर की छह लोकसभा सीटों में शामिल है। अनंतनाग लोक सभा सीट सीट जम्मू -कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती के इस्तीफा से रिक्त हुई थी, जो उन्होंने अपने पिता मुफ़्ती मोहम्मद के निधन के बाद उनकी जगह राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने के बाद दिया था। जम्मू -कश्मीर विधान सभा की 111 सीटों में से 24 पाकिस्तान अधिकृत हिस्से में हैं जहां राज्य के संविधान की धारा 48 के तहत चुनाव कराने की अनिवार्यता नहीं है। इसी बरस 16 जून को भाजपा की समर्थन वापसी से महबूबा मुफ्ती सरकार गिर जाने के बाद वहाँ पहले विधान सभा को निलंबित किया गया और फिर भंग कर दिया गया।

बहरहाल,संवैधानिक प्रावधानों के तहत लोक सभा के कार्यकाल के दौरान यदि आपातकाल लागू कर दिया जाता है तो संसद को उसका कार्यकाल  विधिक प्रक्रिया से एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ाने का अधिकार है। आपातकाल  समाप्त होने की दशा में उसका कार्यकाल किसी भी हालत में छ: माह से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है। कहते हैं कि मोदी जी ने हाल में प्रयागराज में अर्धकुम्भ के अवसर पर गंगा स्नान करने के दौरान संकेत दिए थे कि आपातकाल की भी निश्चित सीमा है। बहरहाल, 16 वीं लोक सभा की पहली बैठक चार जून 2014 को हुई थी। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार पांच वर्ष का उसका निर्धारित कार्यकाल, अन्य किसी उपाय किये बगैर तीन जून 2019 को स्वतः समाप्त हो जाएगा।

यह भविष्य के गर्भ में है कि चुनाव में विलम्ब होता है अथवा नहीं। अगर चुनाव वास्तव में टाले जाते है तो फिर वह किस संविधानसम्मत उपाय से होगा। गौरतलब यह भी है कि भाजपा ने इस बार चुनाव प्रचार के लिए अपना नया नारा "नामुमकिन अब मुमकिन है" अपनाया है। इसका सीधा अर्थ यह निकाला जा सकता है कि मोदी राज में कुछ भी मुमकिन है। 

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आप प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी यूएनआई में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।)

 








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