आतंकियों के कामयाबी में मददगार बना छद्म राष्ट्रवाद

पड़ताल , , शुक्रवार , 22-02-2019


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डॉ. राजू पाण्डेय

पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के साथ निर्णायक युद्ध कर उसे नेस्तनाबूद करने की चीख-चीख कर वकालत करते राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और एंकरों के पाखंड को उजागर करने के लिए सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस के भव्य स्वागत के दौरान उन्हें गले लगाते प्रधानमंत्री की तस्वीर ही काफी है। पाकिस्तान को 20 बिलियन डॉलर की सहायता देकर और आतंकवाद से निपटने की उसकी कोशिशों की प्रशंसा कर भारत आए सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस का ऐसा जोशीला स्वागत अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलताओं और विवशताओं को दर्शाता है। प्रेस कांफ्रेंस में भी सलमान ने पुलवामा हमले की निंदा करना उचित नहीं समझा न ही उन्होंने पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के विषय में कोई प्रतिक्रिया दी।

बहरहाल सऊदी अरब की पाक फंडिंग इस्लामी कट्टरता, आतंकी संगठनों और वहाबी विचारधारा के प्रसार में हमेशा की तरह प्रयुक्त होगी। तमाम आदर्शवाद के बावजूद विश्व के सभी देश अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक-सामरिक लाभ के आधार पर अपनी विदेश नीति का निर्धारण करते हैं और भारत के प्रति उनका नैतिक समर्थन क्या आर्थिक-सामरिक प्रतिबंधों का रूप लेगा यह तो भविष्य ही बताएगा। इतना तो तय है कि युद्ध की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रुख भारत और पाकिस्तान के प्रति लगभग एक जैसा होगा। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय है। बांग्लादेश के 33 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार की तुलना में पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार केवल 9 अरब डॉलर रह गया है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे दक्षिण एशिया में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। पाकिस्तान की यह दीन दशा ही अमेरिका और चीन जैसे देशों को पाकिस्तान पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए ललचाती रही है और यही पाकिस्तान समय समय पर मिलने वाले अंतरराष्ट्रीय संरक्षण के लिए उत्तरदायी रही है। 

अनेक विश्लेषकों ने संभावित भारत-पाक युद्ध के  विनाशकारी आर्थिक प्रभावों का आकलन किया है। मोटे तौर पर इन आकलनों से यह ज्ञात होता है कि भारत-पाक युद्ध हमारे देश की अर्थव्यवस्था को करीब 10 वर्ष पीछे धकेल देगा। युद्ध के परिणामस्वरूप जीडीपी में भारी गिरावट आएगी। कंपनियों को घाटा होने लगेगा जिसे कम करने के लिए वे छंटनी, वेतन में कटौती आदि कदम उठाएंगी। नई नौकरियों का सृजन नहीं होगा। बेरोजगारी बढ़ेगी। विशेषज्ञ कहते हैं कि कारगिल के समय युद्ध का खर्च 5000 करोड़ रुपए प्रति सप्ताह था जो अब बढ़कर 5000 करोड़ रुपए प्रतिदिन हो सकता है। युद्ध के लम्बा खिंचने की दशा में सरकार पर पड़ने वाला बोझ जनकल्याणकारी योजनाओं के फण्ड में कटौती का कारण बन सकता है। महंगाई में भी आशातीत वृद्धि हो सकती है। आर्थिक विशेषज्ञ यह भी आशंका व्यक्त करते हैं कि युद्ध के बाद रुपए में गिरावट होगी और डॉलर की कीमत 100 रुपए प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकती है। इस कारण पेट्रोल-डीज़ल समेत हर वह वस्तु महंगी हो जाएगी जिसका भारत आयात करता है।

युद्ध के परिणामस्वरूप होने वाली जनहानि का आकलन करना कठिन है किंतु इतना निश्चित है कि बड़ी संख्या में सैनिक अपने प्राणों की आहुति देंगे। यदि युद्धोन्मादी और गैरजिम्मेदार पाकिस्तान आत्मघाती कदम उठाते हुए परमाणु हथियार का उपयोग करता है तो फिर जनहानि की कल्पना भी असंभव है। फिर भी मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों द्वारा यह नैरेटिव बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई देशद्रोही ही पाकिस्तान के साथ आरपार की लड़ाई का विरोध कर सकता है। उनका साथ कुछ सेवा निवृत्त सैन्य अधिकारी दे रहे हैं जिनके  विषय में न चाहते हुए भी यह आशंका होती है कि कहीं वे रिटायरमेंट  के बाद हथियार विक्रेता कंपनियों के लिए लॉबिंग का कार्य तो नहीं करने लगे हैं। पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान हमारे साथ छद्म युद्ध की रणनीति का प्रयोग करता रहा है। कश्मीर में आतंकियों और पत्थरबाजों को फंडिंग, ट्रेनिंग और संरक्षण, स्कूलों का जलाया जाना, हुर्रियत नेताओं का पालन-पोषण एवं उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करना, कश्मीरियों को आतंकवाद से जोड़ना आदि इस रणनीति के भाग रहे हैं। हाल के वर्षों में पाकिस्तान की यह रणनीति कश्मीर तक सीमित नहीं रही है। वह पूरे भारत में आतंकी गुटों और राष्ट्र विरोधी शक्तियों से संपर्क करने और उन्हें मदद देने में कामयाब रहा है। पिछले दशकों में पूरे देश में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों का नेटवर्क सक्रिय रहा है और इसने देश को आतंकी हमलों से क्षति भी पहुंचाई है। पाकिस्तान की यह रणनीति उसके लिए बहुत कारगर रही है।

कारगिल, आईसी-814 अपहरण प्रकरण, संसद पर आक्रमण, जयपुर और अजमेर में विस्फोट, मुंबई में 26/11 का आतंकी हमला जैसी घटनाओं को अंजाम देने के बावजूद पाकिस्तान विश्व के शक्तिशाली देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के गंभीर प्रतिबन्धों से बचने में किसी हद तक कामयाब रहा है। विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह ने यह स्वीकार किया है कि सन 2005 से 2012 तक कश्मीर में स्थिति सामान्य थी किंतु इसके बाद हालात बिगड़े हैं। अनेक मीडिया रिपोर्ट्स यह दर्शाती हैं कि कश्मीर में स्थानीय युवाओं का रुझान 2016 के बाद से तेजी से आतंकवाद की ओर बढ़ा है। हिजबुल मुजाहिदीन और लश्करे तैयबा जैसे आतंकी संगठनों से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या 2017 में 126 थी जो 2018 में बढ़कर 191 हो गई। जो युवा हथियार उठाने में झिझक रहे हैं उन्हें पत्थर थमाए जा रहे हैं। उच्च शिक्षित और उच्च पारिवारिक पृष्ठभूमि के युवा भी उसी तेजी से आतंकी गतिविधियों में लिप्त हो रहे हैं जैसे निर्धन और अशिक्षित युवा। पांच फरवरी को गृह राज्य मंत्री ने लोकसभा में जो आंकड़े पेश किए वह चिंतित करने वाले हैं। जम्मू कश्मीर में 2014 से 2018 के बीच शहीद होने वाले जवानों की संख्या में 94 फीसदी का इजाफा हुआ है जबकि आतंकी हमलों में एक सौ सतहत्तर प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2014 में 222 तो 2018 में 614 आतंकी घटनाएं हुईं। 2014 में 47 तो 2018 में 91 जवान शहीद हुए। राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल कश्मीर में देशी बमों तथा अन्य विस्फोटकों के प्रयोग की घटनाओं में 57 प्रतिशत इजाफा हुआ जो आतंकियों को मिल रहे स्थानीय समर्थन का प्रमाण है।

यदि भारत पाक के इस छद्म युद्ध का प्रतिकार करना चाहता है तो अब समय आ गया है कि वह हाइब्रिड वॉर की रणनीति पर गंभीरता पूर्वक विचार करे। पाकिस्तान को जैसे को तैसा उत्तर देने के लिए यह रणनीति उपयुक्त सिद्ध हो सकती है। हाइब्रिड वॉर में पारंपरिक तथा अपारंपरिक  एवं सैन्य व असैन्य गतिविधियों और साधनों का मिश्रण होता है। हाइब्रिड वार उग्रवाद, आतंकवाद, आपराधिक एवं अशांतिकारी गतिविधियों, जनसंघर्ष और गोरिल्ला युद्ध से परहेज नहीं करता। फोर्थ जनरेशन वारफेयर के अपारंपरिक तरीकों के प्रयोग द्वारा सैन्य आक्रमण जैसा परिणाम प्राप्त करना इसका ध्येय होता है। रूस ने यूक्रेन और क्रीमिया में हाइब्रिड वॉर की रणनीति का सफल इस्तेमाल किया है। रूस ने सूचना और साइबर युद्ध, ऊर्जा युद्ध, आर्थिक अस्थिरता पैदा करना, राजनीतिक और सामाजिक विद्रोह एवं असंतोष उत्पन्न करना आदि का प्रयोग इस दौरान किया।

पाकिस्तान की आंतरिक संरचना में जाति,धर्म,भाषा,कबीलाई संस्कृति आदि से संबंधित ऐसी बहुत सी बातें हैं जो गहन जन असंतोष और  विप्लव का कारण बन सकती हैं। बलूचिस्तान और सिंध में यह असंतोष उपस्थित है। पंजाबी वर्चस्व एवं राजनीतिक व सैन्य दृष्टि से अभिजन वर्ग की तानाशाही और दमन के कारण यह इलाके त्रस्त हैं। कृत्रिम धार्मिक आधार पर खड़ा किया गया पाकिस्तान अंदर से बहुत कमजोर और वल्नरेबल है। भारत हाइब्रिड वार के माध्यम से पाकिस्तान की पीड़ित-शोषित जनता को मुक्ति और राहत दे सकता है और उसे धार्मिक कट्टरता और सैन्य तानाशाही की जकड़न से मुक्त कर सकता है तथा वहां सच्चे लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। पाकिस्तान में घुस कर आतंकी अड्डों पर सीधी कार्रवाई की मांग करने वालों को ईरान, सीरिया और अफगानिस्तान में इसी ध्येय से प्रवेश करने वाले अमेरिका की फ़जीहत को नहीं भूलना चाहिए। भारत रूस द्वारा अपनाई गई हाइब्रिड वॉर की नीति से कुछ अमानवीय तत्वों का विलोपन कर इसका प्रयोग धर्मांधता के अंत और सैनिक दमन तथा शोषक घरानों के अत्याचार की समाप्ति हेतु कर सकता है।

चाहे वह हाइब्रिड वारफेयर ही क्यों न हो युद्ध और हिंसा की चर्चा हमेशा पीड़ाजनक होती है किंतु इतिहास ने समय समय पर यह दर्शाया है कि बातचीत का मार्ग खोलने के लिए और शांति स्थापित करने हेतु भी युद्ध और हिंसा का सीमित और संयमित उपयोग आवश्यक हो जाता है। दुर्भाग्यजनक बात यह है कि पुलवामा के आतंकी हमले के पीछे निहित आतंकियों के कुत्सित उद्देश्यों की प्राप्ति में हमारा मीडिया तथा कुछ दक्षिणपंथी संगठन एवं राजनीतिक दल अपना योगदान देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कई स्थानों पर कश्मीरियों पर हमले की कोशिशों की खबरें तो आ ही रही हैं, भारतीय मुसलमान को भी आतंकवाद का पर्याय और पाकिस्तान परस्त साबित कर साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने का प्रयास भी जारी है। यही आतंकवादियों की भी मंशा है- कश्मीरियों के मन में अविश्वास एवं असुरक्षा की भावना पैदा करना, देश के अन्य भागों के निवासियों में कश्मीरियों के लिए नफरत पैदा करना तथा देश में साम्प्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देना।

कश्मीर को कानून व्यवस्था की समस्या मानकर उसका हल करने की कोशिशों से हालात और बिगड़े हैं। कश्मीर के सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ साथ कश्मीरी नौजवानों को यह विश्वास दिलाने की आवश्यकता है कि पूरा देश उनका है और हर भारतवासी उनके साथ है क्योंकि वे भी उतने ही भारतीय हैं जितने देश के किसी अन्य भाग में रहने वाले लोग। उन्हें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन और वहां के निवासियों की दुर्दशा के बारे में बताना होगा और यह समझाना होगा कि अलगाववादी दृष्टिकोण और स्वतंत्रता की मांग उनके लिए आत्मघाती सिद्ध होगी।

सुरक्षा बलों द्वारा मानवाधिकार हनन की बात करते समय हमें उस कठिन चुनौती को ध्यान में रखना होगा जिसका सामना सुरक्षा बल कर रहे हैं। वे अंततः देश की रक्षा के लिए देश की सरकार के निर्देश पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे होते हैं। जब हिंसा होती है तो दोनों पक्षों द्वारा सीमाएं लांघी जाती हैं। आम जनता की ओट में छिपे आतंकवादियों की बर्बरता और अमानवीयता का वैसा ही उत्तर दिया जा सकता है। कोशिश हिंसा के दुष्चक्र से से बाहर निकलने की होनी चाहिए।

पुलवामा हमला न केवल खुफिया तंत्र की नाकामी का मामला है बल्कि यह हमारे सुरक्षा बलों के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है। सुरक्षा बलों के मूवमेंट के समय निर्धारित स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का पालन न करना, खुफिया एजेंसियों और जम्मू कश्मीर पुलिस के इनपुट की अनदेखी तथा खराब मौसम के कारण एक सप्ताह से फंसे सुरक्षा बलों को एयरलिफ्ट करने की अनुमति न देना यह दर्शाते हैं कि सरकार इस तरह की वारदात को मानो आमंत्रित कर रही थी। पुलवामा हमले को राष्ट्रवाद के संकीर्ण और अस्वीकार्य दक्षिणपंथी पाठ के प्रचार हेतु इस्तेमाल किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है जिसमें विरोध और असहमति के लिए कोई स्थान नहीं है। 

प्रधानमंत्री प्रारंभ से ही यह परसेप्शन बनाने की कोशिश में रहे हैं कि वे निर्णायक फैसले लेने वाले मजबूत नेता हैं।किंतु आज सत्ता में आने के 56 महीने बाद उनके पास अपने विरोधियों का उत्तर देने के लिए कोई ठोस उपलब्धि नहीं है। उनकी विफलता का आलम यह है कि अपने दक्षिणपंथी समर्थकों को बताने के लिए भी उनके पास कुछ नहीं है। जनता में लार्जर दैन लाइफ छवि के निर्माण द्वारा शायद चुनाव तो जीते जा सकते हैं किंतु देश चलाने के लिए यथार्थ की बुनियाद पर आधारित ठोस, प्रायोगिक और सर्वसहमति पर आधारित सर्वस्वीकार्य निर्णय लेने की आवश्यकता पड़ती है। उम्मीद है प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के अंतिम महीनों में अपने जोशीले संवादों द्वारा खुद पर निर्मित दबाव के वशीभूत होकर कोई निर्णय नहीं लेंगे।

  (डॉ.राजू पाण्डेय राजनीतिक विश्लेषक हैं और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)










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bhupesh :: - 02-22-2019
There is some typo error. How come 5000 crore remains 5000 crore even after increasing?