अब निगाहें टिकी हैं आम चुनावों की तैयारियों पर

साप्ताहिकी , , शुक्रवार , 14-12-2018


rahul-gandhi-cm-chhattisgarh-rajasthan-mp-highcoman

चंद्रप्रकाश झा

पांच राज्यों- मिजोरम, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में विधान सभा चुनाव के परिणामों को लेकर विभिन्न सन्दर्भ में सियासी और मीडिया हल्कों में  ही नहीं आम लोगों के बीच भी गहन चर्चा -विश्लेषण जारी है। इनमें सबसे ज्यादा सन्दर्भ, नई लोकसभा के लिए  2019 में निर्धारित आम चुनाव की तैयारियां हैं। चुनाव की तैयारियों के सन्दर्भ में अधिकतर जिक्र ,केंद्र में भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए ) की नरेंद्र मोदी सरकार की मौजूदा एवं भावी स्थिति और उसके खिलाफ विपक्षी महागठबंधन की अड़चनों और संभावनाओं का किया जा रहा है।  

यह प्रश्न अब लगभग दब गया है कि विपक्षी महागठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा। क्योंकि इन विधान सभा चुनाव के परिणामों से यह सन्देश निकल चुका है कि केंद्रीय सत्ता पर विपक्षी दावेदारी में कांग्रेस के नेतृत्व और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी की केन्द्रीयता को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। इन चुनावों से बहुत पहले राहुल गांधी कह चुके थे कि वह 17 वीं लोक सभा चुनाव में उनके पक्ष की जीत की स्थिति में प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभालने के लिए तैयार हैं। लेकिन इसे कांग्रेस के बाहर के विपक्षी खेमे में अपेक्षित स्वीकार्यता नहीं मिल रही थी। 

एनडीए और ख़ास कर भाजपा ने जनमानस में यह बात प्रस्थापित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी कि प्रधान मंत्री पद के लिए मोदी जी का कोई विकल्प नहीं है और राहुल गांधी ' पप्पू ' हैं।  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो यहां तक कहते रहे कि उनकी पार्टी केंद्र में अगले पचास बरस तक राज करेगी।  अब सत्तारूढ़ खेमे में यह बात गहरे पैठ गयी लगती है कि अगर वह अगला चुनाव नहीं जीत सकी तो नई सरकार का नेतृत्व राहुल गांधी को मिलने से रोकना संभव नहीं होगा। बहरहाल इन चुनावों के उपरान्त भाजपा और उसके समर्थकों ने अब राहुल गांधी को पप्पू कहना छोड़ दिया है।  

इन चुनावों में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ( सीपीएम ) की पहल पर  तेलंगाना और राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस , दोनों के खिलाफ ' तीसरा मोर्चा ' कायम करने के प्रयास विफल सिद्ध हुए।  मिजोरम और तेलंगाना के अपेक्षाकृत छोटे दो राज्यों में तो क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व कायम हुआ।  लेकिन छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश और राजस्थान के तीन बड़े राज्यों में सत्ता कांग्रेस के ही हाथ लगी।  ये दीगर बात है कि स्वतंत्र भारत के नवीनतम गठित राज्य , तेलंगाना की सत्ता में लौटी तेलंगाना राष्ट्र समिति ( टीआरएस ) के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री केसीआर भी भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ तीसरा मोर्चा के रूप में ' फ़ेडरल फ्रंट ' बनाने की बात करते रहते हैं।  लेकिन उन्होंने इस फ़ेडरल फ्रंट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस , दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और कुछेक अन्य दलों के भी शामिल होने की जो आश लगाए रखी थी वह पूरी होनी संभव नहीं लगती।  

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्र बाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी ने  अपनी धुर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के साथ पहली बार हाथ मिलाकर तेलंगाना के चुनाव में गठबंधन कर लिया। आंध्र प्रदेश विधान सभा के 2019 में ही निर्धारित चुनाव में भी इन दोनों का गठबंधन हो सकता है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस ( यूपीए ) की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा संसद के शीतकालीन सत्र की पूर्व संध्या पर विपक्षी दलों की बुलाई बैठक में चंद्राबाबू नायडू ही नहीं ममता बनर्जी  और अरविन्द केजरीवाल भी शामिल हुए।  

यह भी गौरतलब है कि इन पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में जहां एक तरफ भाजपा का किसी से कोई गठबंधन नहीं था। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को राजस्थान में पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल तथा वहाँ और मध्य प्रदेश पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव के नवगठित लोकतांत्रिक जनता दल को अपने गठबंधन में शामिल करने में सफलता मिली। कांग्रेस ने जिन तीन राज्यों में जीत दर्ज की है वहाँ वह उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने के लिए उत्सुक थी। बताया जाता है कि कांग्रेस ने शुरुआती बातचीत के बाद ऐसा गठबंधन करने के प्रयास इसलिए छोड़ दिए कि बसपा उसके तहत अपने लिए मध्य प्रदेश में 50 सीट और अन्य दो राज्यों में भी ज्यादा सीटों की मांग पर अड़ी रही।  

वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव के अनुसार राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव नतीजों ने काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का कद राजनीति के आकाश में कई गुना बढ़ा दिया है। उनका आत्मविश्वास देखने लायक है। यह आत्मविश्वास का ही नतीजा है कि उन्होंने एक ऐसा जोखिम लिया, जिसकी वजह से वे हार भी सकते थे या जीतते तो  इसका सेहरा उनके सिर कतई न बँधता। तब भाजपा विरोधी राजनीति के केंद्र में राहुल नहीं मायावती होतीं। इसमें शक नहीं कि तीनों राज्यों में महागठबंधन बनता तो भाजपा की बेहद बुरी हार होती। लेकिन यह मिथक और मजबूत होता कि कांग्रेस या राहुल गाँधी सीधी लड़ाई में भाजपा को हरा नहीं सकते।

नतीजे बता रहे हैं कि राहुल गाँधी का जोखिम उठाना काम आया। वरना गठबंधन से मिली जीत के बाद भाजपा और मीडिया उन्हें ‘पप्पू’ ही बनाए रहता। भाजपा यही बताने की कोशिश करती कि यह राहुल की नहीं मायावती की जीत है। राहुल जीत कर भी हार जाते। अब कांग्रेस राजस्थान और मध्यप्रदेश में बिना बसपा की मदद के भी सरकार बना सकती है , हालाँकि मायावती ने समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। बसपा को मध्यप्रदेश में  5 फीसदी वोट और दो सीटें मिलीं हैं। उसे पिछली बार 6.29 फीसदी वोट और चार  सीटें मिली  थीं। बसपा ने राजस्थान में  4 फीसदी वोट प्राप्त कर  छह सीटें जीती। 

बसपा ने छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी की जनता कांग्रेस (छत्तीसगढ़) के साथ गठबंधन कर दो सीटें जीती। छत्तीसगढ़ में इस गठबंधन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी लेकिन उससे कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। कांग्रेस ने वहां सभी चुनाव पूर्व सर्वे और मतदान बाद के एग्जिट पोल के अनुमानों को झुठलाते हुए बड़ी जीत दर्ज की। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की यह पहली चुनावी जीत है जहां भाजपा के डा. रमन सिंह 15 बरस से मुख्यमंत्री थे। मध्य प्रदेश से विभक्त कर गठित इस नए राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री जोगी जी बने थे जो तब कांग्रेस में थे और वहां की पहली विधान सभा के नियमित चुनाव में भाजपा ही जीती थी।  

इन चुनावों के बाद तेलंगाना में आशातीत सफलता दर्ज कर केसीआर गुरुवार को लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। उनकी पार्टी टीआरएस को 119 सीटों की विधानसभा में 88 सीटें मिली जबकि कांग्रेस -टीडीपी -भाकपा और अन्य के ' प्रजा कुटमी ' गठबंधन को 21 सीटें मिली।  वहाँ अपने दम पर चुनाव लड़ी भाजपा को सिर्फ एक सीट मिली है। गौरतलब  है कि तेलंगाना की नयी सरकार में विधान परिषद सदस्य मोहम्मद महमूद अली को फिर उप मुख्यमंत्री बनाया गया है।

मिजोरम की 40 सदस्यीय विधान सभा की 26 सीटें जीतने वाले मिज़ो नेशनल फ्रंट के अध्यक्ष ज़ोरमथंगा शनिवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। वह 1998 से 2008 तक दो बार मुख्यमंत्री रहे थे। एग्जिट पोल में वहाँ त्रिशंकु विधान सभा की संभावना व्यक्त की गई थी। भाजपा ने वहाँ पहली बार एक सीट जीती। वहाँ पिछले 10 बरस सत्ता में रही कांग्रेस को सिर्फ पांच सीट मिली। मुख्यमंत्री ललथनहवला दो सीट से चुनाव लड़े थे पर दोनों जगह हार गए। नवगठित ज़ोरम पीपुल्स मुवमेन्ट मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश और राजस्थान  में भी कांग्रेस विधायक दल के नेता के चुनाव -चयन में शुरुआती उहापोह के बाद नयी सरकार के गठन की औपचारिकताएं  पूरी होने वाली है।  

तय है कि इन सबके बाद सबका ध्यान अगले लोक सभा चुनाव की तैयारियों पर होगा जो मई 2019 के पहले निर्धारित है। लेकिन आम चुनाव के लिए गठबंधन के बिखरने -बनने के सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है।  

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई वर्षों तक प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसी यूएनआई में काम कर चुके हैं।)








Tagrahulgandhi election generalelection chhattisgarh rajasthan

Leave your comment