बीजेपी की कमेटी में तब्दील हो जाएगी रिजर्व बैंक के बोर्ड की बैठक या बनाए रखेगी अपनी स्वायत्तता?

माहेश्वरी का मत , , शुक्रवार , 14-12-2018


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अरुण माहेश्वरी

आज रिजर्व बैंक के बोर्ड की बैठक है। रिजर्व बैंक गवर्नर, मोदी के खास शक्तिकांत दास की मौजूदगी में बोर्ड की पहली बैठक होगी। सब जानते हैं रिजर्व बैंक और मोदी सरकार के बीच अभी अस्वाभाविक तनाव चल रहा है जिसके कारण पूर्व-गवर्नर उर्जित पटेल को इस्तीफा तक देना पड़ गया है । सवाल है कि आखिर इस तनातनी का कारण क्या है ? मोदी चाहते हैं कि रिजर्व बैंक उनकी सरकार को अपने कोष से लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये तत्काल दे दे ?

कोई भी पूछ सकता है कि क्यों दे दे ? सिर्फ चार महीनों बाद इस सरकार को चुनाव में जाना है । इन चार महीनों में ही उसका ऐसा कौन सा काम है जो इन रुपयों के कारण अटका पड़ा है ? मोदी सरकार की इस अस्वाभाविक जिद को देख कर किसी को भी संदेह होगा कि मोदी इन रुपयों के बल पर चुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं। अर्थ-व्यवस्था को गति मिले, इससे किसी को भी ऐतराज नहीं होगा। न रिजर्व बैंक को। लेकिन किसी भी बहाने अगर कोई अपने निजी हित के लिये रिजर्व बैंक के कोष को लूटना चाहता हो तो इसकी कौन अनुमति देगा ! 

ऐन चुनाव के तीन महीने पहले इस कोष पर हाथ साफ करने की मोदी सरकार की नीयत पर भला क्यों कोई संदेह नहीं करेगा ? इस बैठक में मोदी की ओर से एक पावर प्वायंट प्रेजेंटेशन के जरिये मोदी सरकार इन रुपयों को लगाने के अपने प्रस्ताव पेश करेगी । इसमें संभव है कि पांच राज्यों से मिली चपत के बाद किसानों की कर्ज माफी का भी एक प्रस्ताव हो । लेकिन यह तय है कि यह सरकार एक बड़ी राशि बैंकों के जरिये अपने पूंजीपति मित्रों में और फिर उनसे बीजेपी के पार्टी फंड में हासिल करना चाहती है । बीजेपी के पास पहले से ही मोदी-शाह ने बेशुमार धन इकट्ठा कर रखा है । लेकिन फिर भी, वे आगामी चुनाव में जिस पैमाने पर रुपयों का खेल खेलना चाहते हैं, उसके लिये भारत का पूरा खजाना भी उनके लिये कम पड़ेगा । साम-दाम-दंड-भेद से सत्ता पर बने रहने के उनके फासीवादी खेल में एक साम अर्थात बुद्धि-विवेक का पहलू ऐसा है जिसमें बीजेपी शून्य है । 

इस कमी को वह बाकी तीन निंदनीय उपायों के अतिरेक से पूरा करना चाहती है । इसमें उसे पैसों की खुली छूट चाहिए । और इसीलिये वह रिजर्व बैंक के आरक्षित कोष को लूटने-खसोटने पर आमादा है । रिजर्व बैंक की आज की बैठक इसीलिये महत्वपूर्ण है कि यह बैठक 2019 के चुनावों के ठीक पहले क्या बीजेपी की अपनी चुनाव कमेटी की बैठक में तब्दील हो जायेगी या यह जनता के धन के संरक्षक भारत के केंद्रीय बैंक की मर्यादा को बनाये रखेगी । शक्तिकांत दास के अतीत के, खास तौर पर नोटबंदी के पागल दौर के रेकर्ड को देखते हुए किसी की भी यह आशंका और प्रबल हो जाती है ।

ऊपर से अभी बोर्ड में एक एस गुरुमूर्ति की तरह के उत्पाती भी बैठे हुए हैं, जिनके बारे में अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने कुछ दिन पहले ही कहा है कि अगर गुरुमूर्ति अर्थशास्त्री हैं तो मैं भरतनाट्यम करने वाला नर्तक हूं । देखना है, आज ये सारे तत्व मिल कर इस बैठक में क्या उपद्रव मचाते हैं। पांच राज्यों के चुनावों के बाद आगे मोदी की बुरी तरह से पराजय की संभावनाओं से भारत की अर्थ-व्यवस्था में स्थिरता के जो संकेत गये हैं, देखना है कि आज की रिजर्व बैंक की यह बैठक उन्हें बल पहुंचाती है या उन्हें उलटने की बलात कोशिश करती है! 

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)








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