पूंजीपतियों के खिलाफ की गयी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बेहद गहरे हैं निहितार्थ

मुद्दा , , शनिवार , 27-04-2019


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। मुठ्ठीभर लोगों ने देश की व्यवस्था को इस तरह से अपने कब्जे में ले लिया है कि आम आदमी बस इसमें इस्तेमाल होने के लिए अभिशप्त हो गया है। ये लोग कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया पर तो कब्जा जमा ही चुके थे अब सुप्रीम कोर्ट को भी अपने कब्जे में लेने का दुस्साहस कर रहे हैं। यह बात अब देश की इस सर्वोच्च अदालत को भी भलीभांति समझ में आने लगी है।

 सुप्रीम कोर्ट का यह दर्द उस समय सामने आ गया जब मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न मामले की सुनवाई हो रही थी। इस मौके पर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति आरएफ नरिमन और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की विशेष पीठ ने कहा कि कुछ अमीर और ताकतवर लोग आग से खेल रहे हैं और न्यायपालिका को रिमोर्ट कंट्रोल की तरह चलाना चाहते हैं। उनका कहना था कि गत तीन साल से न्यायपालिका को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है जो किसी भी हालत में सफल नहीं हो सकता है। उन्होंने चेतावनी के लहजे में कहा कि अब इन लोगों को जवाब देने का समय आ गया है।

इसे देश की सर्वोच्च संस्था का देश के उन ताकतवर लोगों के खिलाफ ऐलान-ए-जंग माना जाना चाहिए जो जनता को कीड़े मकोड़े समझते हैं अपनी हर ऐय्याशी को उसके अरमानों की कब्रों पर पूरा करना चाहते हैं। ये लोग हर तंत्र को बिकाऊ बनाने में लगे हुए हैं। 

हालांकि इस बात को लेकर समय-समय पर आवाज उठती रही है कि देश के गिने चुने ताकतवर लोग जनता पर राज कर रहे हैं। मोदी सरकार में मॉब लिंचिंग समेत कई ऐसे मामले हुए जिससे लोग इनके खिलाफ आवाज उठाने से डरने लगे। जिन कुछ लोगों ने कोशिश की उनकी आवाज को हर तरीके से दबा दिया गया। बावजूद इसके भी अगर वह शांत नहीं हुआ तो उसके परिवार तक को परेशान किया गया। और बहुत सारे लोगों को तो मौत का शिकार होना पड़ा। 

जस्टिस लोया, पत्रकार गौरी लंकेश समेत कई सोशल एक्टिविस्ट इसकी खुली नजीर हैं। इसमें दो राय नहीं कि कुछ पूंजीपतियों और ब्यूरोक्रेट के साथ मिलकर लोकतंत्र की रक्षा करने वाले तंत्रों को कब्जाने का प्रयास काफी समय से होता रहा है। लेकिन मोदी सरकार में यह मामला पराकाष्ठा तक पहुंच गया।

मोदी ने काम करने की स्वतंत्रता के नाम पर ब्यूरोक्रेट्स को अपने साथ मिलाया। बाद में तरह-तरह के डर दिखाकर विधायिका को भी नियंत्रित कर लिया। यही वजह रही कि तमाम अराजकता के बावजूद विपक्ष भी मोदी सरकार के खिलाफ मौन रहा। उसका असर लोकसभा चुनाव तक में देखा जा सकता है। जब विपक्ष सहमा हुआ प्रतीत हो रहा है। और पीएम मोदी के खिलाफ खुलकर बोलने से बच रहा है।

लोकतंत्र में प्रहरी की भूमिका निभाने वाले मीडिया की हालत सबसे खराब है। गिने चुने पत्रकारों को छोड़ दें तो पूरा मीडिया मोदी सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है।

यह माना जाता है कि जब किसी सरकार की अराजकता बढ़ती है तो विपक्ष मीडिया के साथ मिलकर उसका सामना करता है। बुद्धिजीवी सरकार की खामियों को जनता तक ले जाते हैं। लेकिन यहां सब कुछ उल्टा हो रहा है। मोदी सरकार के सामने ये सभी नतमस्तक नजर आ रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार ने सरकारों के खिलाफ लड़ने वाले तंत्रों को कमजोर बनाया है। इसी का फायदा मोदी सरकार उठा रही है। 

स्थिति यह है कि लोकसभा चुनाव में जहां सत्ता पक्ष को विपक्ष को घेरना चाहिए वहीं विपक्ष खुद घिर जा रहा है। यही सब वजह है कि देश की व्यवस्था को अपने चंगुल में लेने वाली जमात अब सुप्रीम कोर्ट को भी अपने नियंत्रण में लेना चाहती है।

दलित एक्ट को प्रभावित करने का प्रयास भी इसी कड़ी का हिस्सा था। इसे देश की विडंबना ही कहा जायेगा कि न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों को प्रेस के बीच जाना पड़ा। 

दरअसल जब से रंजन गोगोई देश के मुख्य न्यायाधीश बने हैं तब से मोदी सरकार की अराजकता पर काफी हद तक शिकंजा कसा गया है। चाहे सीबीआई में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना का मामला हो या फिर राफेल सौदे का मामला सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है।

वैसे प्रभावशाली लोगों द्वारा यौन उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। पर जिन परिस्थितियों में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वभाविक है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई देश के कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाले थे या अभी करनी है। जिसमें राफेल मामला भी शामिल है।

जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने इन गिने चुने ताकतवर लोगों के खिलाफ मोर्चा खोला है। उससे अब इन लोगों के खिलाफ माहौल बनने की उम्मीद जगी है। यह बात अलग है कि अपने पर आंच आने पर सुप्रीम कोर्ट आक्रामक हुआ है पर असली मुद्दे पर अब आया है। इससे लोगों को हौसला मिलेगा। देश में भले ही लोग डरे हों पर इस सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा है। सुप्रीम कोर्ट का पूंजीपतियों पर किया गया हमला जनता में सकारात्मक संदेश ले जाएगा। 

इस पूरी प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट की छवि भी निखर कर सामने आएगी। देखने में आता है कि पूंजीपतियों और राजनेताओं के दबाव में सुप्रीम कोर्ट के मामले प्रभावित होने के आरोप लोग मौखिक रूप से लगाते रहते हैं। अब जब सुप्रीम कोर्ट खुद इन लोगों को ललकार रहा है तो देश में इस व्यवस्था के खिलाफ एक आंदोलन की भूमिका बनेगी।

 








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Umesh Chandola :: - 04-27-2019
नोटा का एक वैकल्पिक उम्मीदवार... भारत के चुनाव छोटे हो या बड़े बिना अपवाद हर चुनाव में पैसे का बोलबाला नजर आता है पैसे की ताकत से ही अखबार, चैनलों यहां तक कि स्वयं पार्टी के कार्यकर्ताओं को तमाम पार्टियां खरीद लेती हैं। अगर वर्तमान संसदीय चुनाव की ही बात करें तो इस चुनाव में भी यही देखने में आ रहा है। लेकिन चुनावों में कई ऐसे व्यक्ति, संगठन ,पार्टियां भी चुनाव लड़ते हैं जो मुश्किल से चुनाव में कुछ लाख ही खर्च कर पाते हैं। विगत 11 अप्रैल को नैनीताल उधम सिंह नगर लोकसभा सीट से एक उम्मीदवार 71 वर्षीय साथी प्रेम प्रसाद आर्य चुनाव लड़ रहे थे ।वह प्रगतिशील लोक मंच के प्रत्याशी थे जिसका चुनाव चिन्ह तुरहा बजाता आदमी था । लोकमंच को इंकलाबी मजदूर केंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ,परिवर्तनकामी छात्र संगठन तथा क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का समर्थन था। रुद्रपुर, लालकुआं काशीपुर आदि में कार्यकर्ता पुरानी साइकिलों मे चैलेंजर्स बांधे ,सीने पर फ्लेक्सी लगाए प्रचार कर रहे थ।फ्लेक्सी में लिखा था देश को पूंजीवाद नहीं समाजवाद चाहिए, जनभागीदारी से नीतियां बनाओ आदि ।साथ में कार्यकर्ता 10 ₹20 का चंदा भी जनता से मांगते जा रहे थे। यहां तक तो बहुत अनूठा प्रचार नहीं कहा जा सकता पर चुनाव का पर्चा बड़ा अलग था जिसका शीर्षक ही था 'चुनाव का तमाशा तो चंद रोज का है असली सवाल तो हमारी मुक्ति का है ।" पर्चे का लब्बोलुआब यही था कि 70 सालों से देश में टाटा बिरला की सरकारें रही हैं ।इनके द्वारा, खासकर 2014 के बाद मजदूरों ,किसानों ,छात्रों में महिलाओं ,आदिवासियों आदि पर शोषणकारी हमले बेतहाशा बढ़ चुके हैं ।इसमें इस लोकतंत्र पर, सरकार चुनने के सवाल पर ही बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा किया गया था ।पर्चे में कहा गया था कि असली सरकार विधायिका नहीं बल्कि कार्यपालिका होती है जिसमें डीएम ,एसपी तहसीलदार, मुख्य सचिव सचिव और मंत्री आदि आते हैं जिन्हें हम चुनते ही नहीं हैं। इसमें सोवियत संघ की ही तर्ज पर न्यायपालिका के साथ विधायिका ,कार्यपालिका के भी चुने एवं वापस बुलाने के अधिकार की मांग की गई थी साथ ही उत्पादन के साधनों की निजी स्वामित्व के स्वरूप को नष्ट करने ,हर सरकारी योजना के बनाने ,क्रियान्वयन करने तथा अनुश्रवण करने में जनता की व्यापक भागीदारी पर जोर था। इस नजरिए से आर्य नोटा के वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में नजर आते हैं ।लेकिन अब सुनिए। क्या आपने सुना है कि कभी, कहीं ,किसी चुनाव में जनता को लोकतंत्र ,पार्टियों व सांप्रदायिकता के ऊपर विस्तृत वैज्ञानिक जानकारी देने वाली पुस्तिकाएं किसी दल ने कभी बांटी ह? यहां ₹20 की सहयोग राशि लेकर 4 पुस्तिकाएं जनता में वितरित की जा रही थीं। पहली थी --आम चुनाव और राजनीतिक दल यानी कौन सा दल पूंजीपति वर्ग के किस हिस्से की नुमाइंदगी करता है भले उसका वोटर कोई भी हो ।दूसरी पुस्तक है आम चुनाव और सांप्रदायिकता --इसमें बताया गया है कि गरीब मुसलमान, गरीब ब्राह्मण, गरीब दलित आदि का वर्ग एक ही है अतः इनके हित भी एक ही हैं । एक गरीब हिन्दू मजदूर को हिन्दू पूजीपति क्या दुगुना वेतन देता है ?दूसरी और मुसलमान और हिंदू पूंजीपतियों आदि का एक ही है वर्ग तथा हित है। तीसरी पुस्तक घोषणा पत्र है जिसमें लोकतंत्र के तीनों अंगों के चुनाव व वापसी तथा मुफ्त चिकित्सा, शिक्षा आदि दर्जनभर आमूलचूल बदलावों के कार्यक्रम का जिक्र है। चौथी और बेहद महत्वपूर्ण पुस्तिका है--- पूंजीवादी लोकतंत्र बनाम समाजवादी लोकतंत्र ।इसमें बताया गया है कि इतिहास में पूंजीपति वर्ग ने ही राजाओ- सामंतों की सत्ता उल्टी और लोकतंत्र की स्थापना की ।पर यह 1% मात्र का लोकतंत्र था और आज तक बना हुआ है यहां तक कि स्वयं भारत में भी 400 प्रतिनिधियो की जो संविधान सभा बनी वो मात्र 13% संपत्तिशाली वर्ग के नागरिकों के वोट से बनी थी जिसने बाद में संविधान की रचना की। मात्र 1917 की बोल्शेविक क्रांति ही थी जिसने व्यापक जनता को वोट का अधिकार दिया यहां तक कि महिलाओं को भी पहली बार तभी वोट का अधिकार दिया गया। यह 1% पूजीपतियों पर 99% की तानाशाही थी यानी अधिकतम संभव लोकतंत्र। संदर्भ हेतु देखें :. pachhas1998.blogspot.com/ साहित्य/...