तवलीन सिंह भी मां हैं!

मुद्दा , , सोमवार , 13-05-2019


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भूपेश पंत

वैसे तो जो भी इस सृष्टि में जन्म लेता है उसका हर दिन उसकी मां का दिन होता है। फिर भी क्योंकि इस सृष्टि में सिर्फ़ इंसान ही औपचारिकताओं का गुलाम है तो मां के लिये कोई खास दिन ही सही। मां कोई शो पीस नहीं होती। लेकिन रिश्तों का कारोबार तो इंसान ही कर सकता है और किसी में इतनी कुव्वत नहीं। रिश्तों का अर्थशास्त्र और अर्थ का राजनीतिकरण आखिरकार हमें उदार बना ही रहा है। हर तरह की हिंसा और घृणा के प्रति उदार । लेकिन ये उदारता अक्सर स्व की सीमा पार नहीं कर पाती है। उस मां के लिये भी नहीं जो एक ओर तो नफ़रत के सौदागर के साथ ताल मिलाती नज़र आती है और दूसरी ओर उस पर कड़े प्रहार करने वाले अपने बेटे को डिफेंड करने पर मजबूर हो जाती है।

मातृ दिवस पर तवलीन सिंह समेत दुनिया की समस्त माओं को मेरा प्रणाम। उनकी ममता को सलाम। ये अजीब संयोग बना कि मुझे टाइम पत्रिका का मुखपृष्ठ बने आतिश सीकरी के लेख को लेकर उनकी हिंदुस्तानी मां की ममतामयी प्रतिक्रिया इसी दिन देखने को मिली। आतिश कौन हैं, उनके पिता कौन थे और हिंदुस्तान से उनका क्या रिश्ता है इस बारे में सब जानते हैं। जो नहीं जानते वो भी अब तक गूगल या सोशल मीडिया से जान चुके होंगे। आतिश की मां तवलीन सिंह हिंदुस्तान की जानी मानी पत्रकार और कॉलमिस्ट हैं और पीएम नरेंद्र मोदी की समर्थक हैं। इन्हीं मोदी को उनके बेटे आतिश देश के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और बौद्धिक विभाजन का ज़िम्मेदार मानते हैं। देश का एक बड़ा तबका भी कम या ज्यादा इन मुद्दों पर उनसे सहमत दिखता है। लेकिन कई दूसरे मोदीभक्तों की तरह तवलीन को भी लगता है कि मोदी कुछ गलत कर ही नहीं सकते।

तवलीन सिंह एक हिंदुस्तानी नागरिक के तौर पर भले ही सच्चाई से आँख चुरा लें लेकिन जब यही नफ़रत का तीर उनके कलेजे पर जा कर लगा तब उन्हें ये एहसास हुआ कि ऐसे बंटवारे के तीर जब भारत माता के कलेजे को चीरते होंगे तो उसे कैसा महसूस होता होगा? नफ़रत एक ऐसी आग है जिससे उसका घर भी नहीं बचता जो उससे नजरें फेर कर निकल जाता है। तवलीन को एक मां होने के नाते बहुत धक्का लगा जब कबीर बेदी ने ट्वीट कर आतिश को मोदी के खिलाफ़ लिखने के लिये पाकिस्तानी करार दे डाला। अभी तक मोदी विरोधियों को देशद्रोही और पाकिस्तानी ठहराने को मौन समर्थन दे रहीं तवलीन सिंह की ममता मातृ दिवस के दिन जाग उठी।

उन्होंने पलट कर जवाब दिया कि कबीर को आतिश के विचारों से असहमत होने का पूरा हक है लेकिन उसे पाकिस्तानी करार देने का नहीं। हे मां, इस देश का हर बेटा मोदी और उसकी भाजपा से असहमत होने का अधिकार रखता है और वो भी खुद को पाकिस्तानी या देशद्रोही नहीं कहलाना चाहता। वो भी कहता है कि उसकी मां को ऐसा सुन के पीड़ा होती है। क्या तवलीन सिंह इस मामले में आतिश की मां और मेरी मां में फ़र्क कर सकती हैं?

तवलीन सिंह का दर्द यहां पर कन्हैया की मां से क्यों नहीं जुड़़ता। वो रोहित वेमुला और नजीब की मां का दर्द क्यों नहीं समझ पातीं। देश के लिये लड़ने वालों और शहीद होने वाले लालों की भी तो मां रही होंगी। पिछले पांच सालों से देश को जिस राह पर ले जाने की कोशिश हो रही है उसका खुलासा आज क्यों एक मां पर भारी पड़ने लगा है?

इस देश के हर प्रगतिशील, तर्कवादी और मेहनतकश नौजवानों की माओं की पीड़ा की तुलना में आज उनको अपना दर्द इतना बड़ा लगने लगा कि वो बोल पड़ीं। काश उन्होंने अपनी पत्रकारिता से दूसरी माओं की आवाज़ गुम न की होती। मुझे गर्व है कि मेरी मां ने मुझे दूसरों के दर्द को महसूस करना सिखाया। यही वजह है कि मातृ दिवस के दिन एक मां की इस पीड़ा ने सहसा मुझे हर मां की पीड़ा से जोड़ दिया। जो भी विचारधारा एक मां की आँखों में आँसू लाती हो वो मेरे लिये त्याज्य है। खासतौर पर वो लोग जो विचारों की लड़ाई की सजा किसी को उसकी मां पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करके देते हैं। ऐसे लोग जीवन में किसी भी कोख के हकदार नहीं।

 (भूपेश पन्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)


 








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