चैनलों ने तो पत्रकारिता की कंट्रोल लाइन ही उड़ा दी!

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 07-03-2019


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डॉ. यामीन अंसारी

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अपने चरम पर है। दोनों देशों के बीच भले ही बाक़ायदा जंग न हुई हो, लेकिन युद्ध के बादल अब भी मंडरा रहे हैं। यानी ख़तरा अभी टला नहीं है। इस बीच युद्ध से भी बड़ा ख़तरा हमारे सामने है। यह ख़तरा है मीडिया और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का। अफसोस कि यह ख़तरा सीमा के इधर भी है और उधर भी है। यही कारण है कि सीमा के दोनों ओर सरकारों और फौज से ज़्यादा हमारे टीवी स्टूडियोज़ युद्ध के मैदान बन गए हैं। यहां की चीख़ पुकार, एक दूसरे पर लानत मलामत, गाली गलौच, बड़े बड़े और झूठे दावे, भ्रामक रिपोर्टिंग और विश्लेषण करते इन टीवी चैनलों ने अजीब सी जुनूनी स्थिति पैदा कर दी है। वैसे अपने ही पेशे के बारे में और वह भी आलोचनात्मक दृष्टिकोण से लिखना एक मुश्किल काम है,

लेकिन पत्रकारिता का पहला नियम कहता है कि अपनी भावनाओं और विचारों से परे होकर अपने काम को अंजाम दिया जाए। वैसे मैंने इस पेशे में आने के बाद सभी प्रकार की अनुकूल और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हर संभव प्रयास किया है कि किसी भी कीमत पर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जाए। क्योंकि हक़ीक़त में तो पत्रकारिता आदर्शवाद और सिद्धांतों पर क़ुर्बान हो जाने का ही नाम है। भले ही आज इस पेशे में शामिल एक वर्ग ने न केवल सिद्धांतों को ताक़ पर रख दिया है, बल्कि अपने ज़मीर के साथ अपने क़लम का भी सौदा कर लिया है। 

यह हमारे दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है कि आज टीवी पत्रकारिता, पत्रकारिता कम चापलूसी और अदाकारी अधिक दिखती है। यहां समाचार बिकने लगे हैं, बल्कि चीख़-चीख़कर बेचे जा रहे हैं। अन्यथा पत्रकारिता का नियम तो कहता है कि किसी डर और लालच के बिना सरकारों से सवाल किया जाए, उनके कार्यों का हिसाब लिया जाए, जनता के मुद्दों को उठाया जाए, सरकारों की कमियों और लापरवाहियों को सामने लाया जाए, चाहे हुक्मरां कितना ही ताक़तवर व्यक्ति क्यों न हो। इतिहास गवाह है कि इसी देश में मौलवी मुहम्मद बाक़र जैसे पत्रकार भी पैदा हुए हैं। मौलवी मुहम्मद बाक़र की गिनती ऐसे मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों में होती है जो पत्रकार तो थे ही, देशभक्ति को अपने ईमान का हिस्सा समझते थे। उन्होंने अपनी बेबाक पत्रकारिता से अंग्रेज़ हुकूमत की नींव हिला कर रख दी थी। हर प्रकार के ज़ुल्म और अत्याचारों के बावजूद उनकी क़लम ख़ामोश नहीं हुयी, उस अत्याचारी सरकार के सामने उन्होंने हथियार नहीं डाले। 

आख़िरकार हुकूमत के सामने न झुकने और पत्रकारिता के सिद्धांतों से समझौता न करने के कारण 16 सितम्बर 1857 को मौलवी बाक़र को तोप के मुंह पर बांधकर शहीद कर दिया गया। जब हमारी पत्रकारिता के इतिहास में ऐसे जांबाज़ और बेबाक पत्रकार मौजूद रहे हों तो हमें उन्हें अपना आदर्श मानने में क्या बुराई है? आज अगर पत्रकारों को सवाल करने से रोका जा रहा है, उनके क़लम और ज़बान पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया जा रहा है, उन्हें ख़रीदने और धमकी देने की कोशिश की जा रही है और यह सब संभव भी हो रहा है तो समझ लें कि क़लम और ज़बान अपना अस्तित्व खो चुके हैं।

पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादियों के हमले के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जो भूमिका निभाई है, वह किसी फिल्म के खलनायक के रूप में हमारे सामने आती है। दंगा-फसाद, युद्ध और अनुकूल परिस्तिथियों में तो मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाने की और कोशिश करेगा कि लोग और अधिक उग्र न हों और धैर्य से काम लें। परंतु आज इसके बिल्कुल विपरीत हो रहा है। पुलवामा हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच जैसे-जैसे तनाव बढ़ा, मीडिया ने आग में घी डालने का काम किया। 

चैनलों पर चीख़ते चिल्लाते, बदला लेने, जनता को उत्तेजित करने और सरकार से पाकिस्तान के खिलाफ त्वरित कार्रवाई का दबाव बनाते टीवी एंकर लगता है जैसे खून के प्यासे हो गए हैं। उन्हें इंसानी जान की न परवाह है और न ही कोई उसका मूल्य है। वह समझते हैं कि टीवी स्टूडियो में बैठकर ही सारे मुद्दे हल हो जाएंगे। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि आज की पत्रकारिता ने अपने सिद्धांतों से पूरी तरह से समझौता कर लिया है। उन्हें लगता है कि दंगा, फसाद और युद्ध की स्थिति से बेहतर उनके लिए कुछ नहीं है। जैसा कि ऊपर कहा गया कि अब समाचार और पत्रकारिता बेची जा रही है तो ऐसे में यह स्थिति उनके लिए एक समान है, जिसे वह अधिक मिर्च मसाला लगाकर बेच रहे हैं।

वर्तमान में मीडिया ने अपने प्रदर्शन से जो बदनामी हासिल की है, वह उनकी कमाई ही कही जा सकती है। हालांकि अब पाठक और दर्शक भी बखूबी उनके अभिनय और चापलूसी को समझने लगे हैं। यही कारण है कि कुछ टीवी एंकर तो अपनी उग्रता के कारण समाज में खलनायक बन गए हैं। उन्हें अब असामाजिक तत्वों में गिना जाने लगा। यहां तक कि वैश्विक स्तर पर भी हमारे मीडिया ने अपनी जो तस्वीर बनाई है वह सबके सामने है। कई मौकों पर भारतीय मीडिया का उपहास उड़ाया गया है। और यह सब पिछले कुछ समय के दौरान ही हुआ है, मतलब कहा जा सकता है कि इस समय पत्रकारिता अपने सबसे ख़राब दौर से गुजर रही है। वर्ना आज भी पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलने वाले और देश में उत्तेजना और घृणा के खिलाफ खुल कर बोलने वाले टीवी पत्रकार रवीश कुमार को दर्शकों से अपील नहीं करनी पड़ती कि आप लोग केवल दो ढाई महीने टीवी देखना बंद कर दें। 

कुछ समाचार चैनल तो जैसे सुनियोजित तरीके से न केवल सरकार और संघ परिवार के प्रोपगंडे का हिस्सा बन गए हैं, बल्कि देश और समाज में नफरत को हवा देने में लगे हैं। इनमें पत्रकारिता के सिद्धांतों को धता बता कर केवल ज़हर उगलने और उत्तेजना फैलाने वाला 'रिपब्लिक' चैनल सबसे आगे है। अभी तक अंग्रेजी में ही अपने भड़काऊ पन और चीख-पुकार के लिए प्रसिद्ध रहा यह चैनल अब हिंदी में भी विशेष उद्देश्य के तहत काम कर रहा है। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि रिपब्लिक भारत चैनल ने लांचिंग के दिन ही एक झूठी और गुमराकुन ख़बर चलाई।

इस चैनल ने पहले ही दिन अयोध्या से संबंधित 28 वर्ष के बाद फर्जी और ग़लत ख़बर चलाई। जिसका उद्देश्य हिंदुओं की भावनाओं को भड़काना और यूपी में समाजवादी पार्टी के खिलाफ माहौल बनाना था। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसके कुछ दिन बाद ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक झूठे मामले को बड़े हंगामे में बदलने में चैनल का बड़ा रोल रहा। हिंदू संगठनों की राह अपनाते हुए पाकिस्तान का सहारा लेकर भारतीय मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलना इस चैनल ने अपना सिद्धांत बना लिया है। हाल ही में जमाते इस्लामी हिंद और उसके अध्यक्ष को रिपब्लिक चैनल ने अपने झूठे और भ्रामक प्रचार का शिकार बनाया। पत्रकारिता के सिद्धांतों को रौंदते हुए चैनल ने जमाते इस्लामी हिंद के अध्यक्ष मौलाना जलालुद्दीन उमरी के बारे में झूठी, भ्रामक और आपत्तिजनक ख़बर चला दी। 

रोज़नामा इंक़लाब ने इसके खिलाफ अभियान चलाया और आख़िरकार चैनल और उसके संपादक अर्नब गोस्वामी को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। इसी प्रकार कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले में भी भ्रामक और असत्य कवरेज के कारण उसे एक अदालत के नोटिस का सामना करना पड़ा। केवल यही नहीं, इसके अलावा भी कई अन्य चैनल संघ परिवार की मुस्लिम विरोधी और सरकार समर्थक नीतियों पर चल रहे हैं। जंगी जुनून में डूबे हुए ऐसे ही एक अंग्रेजी चैनल 'सीएनएन न्यूज़ 18' ने मक्का, मदीना और मस्जिदे अक्सा की तस्वीरें दिखाकर उसे जैश के आतंकवादी कारखाना बता दिया। 

इंक़लाब ने इस मामले को भी उठाया, आखिरकार इस स्टोरी पर न्यूज़ 18 नेटवर्क को Explanation जारी करना पड़ा। चैनल ने अपने Explanation में कहा कि एक मार्च को फर्स्टपोस्ट, सीएनएन और नेटवर्क 18 व अन्य ने एक खोजी रिपोर्ट चलाई थी, जिसमें प्रोपगंडा वीडियो का उपयोग किया गया था, जिसे जैश ने अपने मदरसे के विस्तार को दिखाने के लिए तैयार किया था। अब यह कौन सा पत्रकारिता का नियम है कि एक आतंकवादी संगठन की प्रोपगंडा सामग्री चैनल पर चलाई जाए? ख़ुदा जाने ये चैनल भारत को किस ओर ले जाना चाहते हैं। अगर यह सिलसिला नहीं रुका तो इसके परिणाम बहुत विस्फोटक हो सकते हैं। 

(डॉ. यामीन अंसारी दिल्ली से प्रकाशित अखबार इंकलाब के रेजिडेंट एडिटर हैं।)

 








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