आखिर मीडिया के सामने आने से बच क्यों रहे हैं मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा

ख़ास रपट , , मंगलवार , 21-05-2019


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विमल कुमार

17वीं लोकसभा के चुनाव के नतीजे आने में अब केवल 2 दिन का समय रह गया है लेकिन परसों जो एग्जिट पोल आए हैं, उससे यह  स्पष्ट संकेत मिलने लगा है कि केंद्र में अब एनडीए की सरकार ही आएगी। यह सही है कि लोकतंत्र में हमें जनादेश का सम्मान करना चाहिए लेकिन यह भी सच है कि  जनादेश कोई अंतिम सत्य नहीं होता है। वह एक खास राजनीतिक परिस्थितियों में, एक  खास माहौल में एक  खास समय सीमा में जनता की मानसिकता का और उसके दृष्टिकोण का परिचायक होता है और जब स्थितियां बदल जाती हैं तो बाद में वही जनता अपनी दूसरी सोच का भी प्रदर्शन करती है और अलग फैसले देती है।

इसलिए कई बार अलग अलग कॉल काल खंड में जनादेश भी भिन्न होता है इसलिए भाजपा को इस जीत के लिए अधिक दुदुम्भी बजाने की जरुरत नही है। हमारे लिए अत्यधिक  चिंता का विषय यह  नहीं है कि केंद्र में किसकी  सरकार आएगी या नहीं बल्कि उससे अधिक चिंता के विषय यह है कि इस  चुनाव में चुनाव आयोग ने जो अपनी भूमिका निभाई है उससे उसकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह  द्वारा आदर्श आचार संहिता के  उल्लंघन के मामले में। चुनाव आयोग ने श्री मोदी को छह मामलों में क्लीन चिट दी है जबकि कांग्रेस का कहना है किसी मोदी के खिलाफ 11 मामलों की शिकायत की गई थी। यानी 5 और मामलों में क्या हुआ अब तक देश की जनता को पता नहीं चल पाया। क्या देश को यह जानने का हक नहीं? क्या मीडिया को भी यह जानने का अधिकार नहीं?

इस बीच तृणमूल कांग्रेस ने श्री मोदी के खिलाफ कल एक और शिकायत की। उसका कहना था कि श्री  मोदी ने मतदान के दिन  केदारनाथ की यात्रा कर और अपनी  उस यात्रा का देशभर में कवरेज करवा कर आदर्श आचार चुनाव संहिता  का उल्लंघन  किया है क्योंकि वह अभी भी चुनाव में धार्मिक भावनाओं को भड़का कर जनता का मत हासिल करने और उसे प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। चुनाव आयोग के सामने यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि आयोग ने श्री मोदी के मामले में और श्री अमित शाह के मामले में उन्हें न तो कोई नोटिस जारी किया और ना ही उन शिकायतों को अपनी वेबसाइट पर डाउनलोड कर सार्वजनिक किया। 

इतना ही नहीं इन दोनों को क्लीन चिट देते समय उसके आदेश भी जारी नहीं किए और उसकी प्रतियां मीडिया को भी मुहैया नहीं कराई जबकि चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता  के उल्लंघन के अन्य मामलों में न केवल नोटिस जारी किया बल्कि अपनी वेबसाइट पर उन शिकायतों को भी दर्ज किया और इन मामलों में उसने जो भी कार्रवाई की उसे लेकर आदेश भी जारी किए। पहले चरण के मतदान से लेकर अंतिम चरण के मतदान दिन तक पत्रकारों ने चुनाव आयोग से आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के  मामलों के बारे में सवाल किए ।

अन्य मामलों में आयोग ने तो पत्रकारों को संतोषजनक जवाब दिए लेकिन श्री मोदी और श्री अमित शाह के मामले में चुनाव आयोग कई बार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया और इतना ही नहीं वह कई सवालों को जवाब देने से कतराता रहा। कई बार तो उसने यह भी कहा कि वह इन सवालों का जवाब नहीं दे सकता  है क्योंकि यह  मामला अभी भी अदालत में लंबित है तो कई बार यह भी कहा कि  इन सवालों का जवाब वरिष्ठ अधिकारी ही दे सकते हैं क्योंकि वे अधिकृत नही हैं। तो अधिकृत लोग मीडिया के सामने क्यों नही आये? परसों सातवें  चरण की समाप्ति के बाद जब अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस हुआ तो पत्रकारों को यह उम्मीद थी की आयोग  उनके सवालों का जवाब देगा लेकिन आयोग के अधिकारियों ने पत्रकारों के इन सवालों का जवाब नहीं दिया और वे बिना जवाब दिए ही चले गए ।उनका कहना था कि  अब समय अधिक हो गया है और टीवी चैनलों को एग्जिट पोल दिखाना है इसलिए वे प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सवालों का जवाब नहीं ले सकते और इसलिए उन्होंने आनन फानन में अपना प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त  कर दिया। 

यह सच है कि इस बीच उसने  ऐसे सवालों का जवाब दिया जो मतदान से संबंधित थे लेकिन श्री मोदी  और श्रीशाह  के आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन  के मामले को लेकर  किसी सवाल का जवाब  नहीं दिया। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि श्री अशोक लवासा 21 तारीख की बैठक में आयेंगे या नहीं। पत्रकारों ने उसे यह भी कहा कि क्या आयोग इन सवालों का जवाब देने के लिए  आयोग कोई अलग  प्रेस वार्ता करेगा तो आयोग के अधिकारियों ने इस बात का भी जवाब नहीं दिया। पहले चरण से लेकर के अंतिम  चरण तक चुनाव आयोग के जितने भी प्रेस कांफ्रेंस आयोजित हुए उनमें  मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त  अशोक लवासा और शुशील  चंद्र उपस्थित नहीं  थे बल्कि हर  प्रेस कॉन्फ्रेंस में उप चुनाव आयुक्त  स्तर के अधिकारी  ही मौजूद थे  और उन्होंने ही  हर सवाल का  जवाब दिया। इन अधिकारियों  का यह भी कहना  था वे  कई सवालों के जवाब भी नहीं दे सकते  क्योंकि वे इसके लिए अधिकृत नहीं है।

अब सवाल यह उठता है कि अगर यह अधिकारी इन सवालों का जवाब देने के लिए नहीं है तो कोई चुनाव आयुक्त मीडिया के सामने क्यों नहीं आया। यहां यह भी बताना दिलचस्प होगा कि  मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने  सातवें चरण की समाप्ति के बाद मतदाताओं  और राजनीतिक दलों को ही  नहीं  बल्कि मीडिया को भी उसकी भूमिका के  लिए बधाई दी है। उन्होंने इस लोकसभा चुनाव को शांतिपूर्ण पारदर्शी  ढंग से सम्पन्न  कराने में  महत्वपूर्ण निभाई है। अगर श्री अरोड़ा  इस चुनाव को और अधिक  पारदर्शी तथा निष्पक्ष बनाना चाहते हैं तो उन्हें खुद मीडिया के सामने आकर जवाब देना  चाहिए। गौरतलब है कि जब  लोक सभा चुनाव  की घोषणा हुई थी तो  अरोड़ा ने विज्ञान भवन में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी और उन्होंने सवालों के जवाब दिए थे  लेकिन सात चरणों का मतदान होने पर भी  वे  मीडिया के सामने भी नहीं आये..आखिर क्यों? वे मीडिया से क्यों बचते रहे! कहीं चोर की दाढ़ी में तिनका तो नहीं या उनके पास इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं है।

इस बीच चुनाव आयुक्त लवासा कि इस  घोषणा से,  कि अब आयोग की बैठक में भाग नहीं लेंगे,  एक नया विवाद  खड़ा हो गया है और जनता के  मन में यह बात बैठ गई है आयोग के आंतरिक मामलों के पीछे  दाल में  कुछ काला   है। आयोग श्री लवासा की असहमति को अपनी बैठकों में दर्ज  नहीं कर रहा है। आमतौर पर  आयोग सर्वसम्मति से फैसला लेता है लेकिन अतीत में ऐसे कई फैसले आये हैं, जिसमे असहमतियां दर्ज़ की गयी हैं। श्री  लवासा का कहना है कि उन्होंने अब आयोग  बैठकों में भाग नहीं लेना का इसलिए फैसला  किया है कि उनकी बातों की  रिकॉर्डिंग नहीं की जाती  है ऐसे  में भाग लेने का क्या औचित्य है? मीडिया में जब यह विवाद खड़ा हुआ  तो चुनाव आयोग ने  फ़ौरन स्पष्टीकरण जारी किया और कहा कि चुनाव आयोग के सभी सदस्य एक दूसरे के क्लोन नहीं होते और उनके आपस में असहमतियां होती रहती हैं पर आयोग अपने नियमों और निर्देशों के अनुरूप काम करता है। 

जब प्रेस कांफ्रेस में पत्रकारों ने यह जानना चाहा कि क्या अगली बैठक में श्री लवासा भाग लेंगे या नहीं तब  आयोग के अधिकारियों ने जवाब नहीं दिया। सवाल यह है आयोग ने मोदी शाह  के मामले में  नोटिस जारी तक क्यों नहीं किया और इन मामलों  को निपटाने में पूरी पारदर्शिता क्यों नहीं बरती। अगर चुनाव आयोग इतना ही निष्पक्ष था उसे श्री मोदी और श्री शाह के मामले में पारदर्शिता निभानी चाहिए थी।

आयोग को देश को बताना चाहिए था कि उनके खिलाफ  शिकायतों का स्वरूप क्या है ?चुनाव आयोग के इस रवैये को देखते हहुए लोगों के मन में शक गहरा हुआ कि चुनाव आयोग  किसी न किसी रूप से बाहरी  दबाव से  काम कर रहा है  या कोई रिमोट कंट्रोल है जो उसे संचालित कर रहा है। इस तरह देखा जाये तो आयोग को कौन मजबूर कर रहा है? अगर बाहरी दबाव की बात सच है तो यह लोकतंत्र  के लिए अत्यंत घातक है और अगर यह सच नहीं है तो मुख्य चुनाव आयुक्त को   मीडिया के सामने आकर खुद स्पष्टीकरण देना चाहिए  और सवालों का जवाब देना चाहिए लेकिन जिस तरह मोदी ने अपने कार्यकाल में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस  नहीं किया  ठीक उसी तरह मुख्य चुनाव आयुक्त ने पहले चरण से लेकर 7 दौरान मीडिया के  सामने प्रेस आयोजित नहीं किया। उन्हें चाहिए था कि वह कम से कम हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो नहीं पर  मतदान के अंतिम चरण कॉन्फ्रेंस में मीडिया से मुखातिब होते सवालों का जवाब देते हैं।

एक आध पत्रकारों ने सातवें चरण के पहले ही से अनुरोध किया था 19 तारीख को जब प्रेस कॉन्फ्रेंस हो तो श्री अरोड़ा खुद उसमें उपस्थित हो और मीडिया के सवालों का जवाब दें, लेकिन  ऐसा हुआ नहीं। चुनाव आयोग की इन संदिग्ध कारगुजारियों  को लेकर  लोगों के मन में यह शक और सन्देश उठना और स्वाभाविक है कि चुनाव आयोग श्री मोदी और श्रीशाह को बचाता रहा। इसकी पुष्टि इस बात से  और हो गई जब पश्चिम बंगाल में 9 लोकसभा सीटों मतदान के दो दिन पहले चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी गयी लेकिन कायदे से चुनाव आयोग को बुधवार की आधी रात से ही रोक लगानी चाहिए थी लेकिन आयोग  ने ऐसा  नहीं किया क्योंकि अगले दिन मोदी मपश्चिम बंगाल में दो रैलियों को संबोधित करने वाले थे। अगर बंगाल की  घटना इतनी विस्फोटक और नाजुक थी  तो बुधवार की रात  की जगह गुरूवार की रात से क्यों रोक से ही रोक लगाई गयी? आयोग ने जो कुछ किया  किया उससे  इस बात पर  लोगों का शक और गहरा हो गया। लोग यह मानने लगे कि चुनाव आयोग वाकई सरकार की पक्षधर है।

क्योंकि  जब श्री अरोड़ा की नियुक्ति मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर हुई थी तो यह कहा गया था  लगा था  श्री अरोड़ा राजस्थान में लम्बे समय तक मुख्य सचिव पद पर रहे और वहाँ की तत्कालीन मुख्यमंत्री के वे खास माने जाते थे। अगर यह सच है तो श्री अरोड़ा ने वही किया जो उनसे अपेक्षित था। उस समय तक पद पर श्री सुशील चन्द्र को जब चुनाव आयुक्त बनाया गया था तब यह कहा गया कि भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी को क्यों नियुक्त किया गया क्योंकि आम तौर पर भारतीय प्रसाशनिक सेवा के वरिष्ठ  अधिकारियों को ही चुनाव  आयुक्त बनाया जाता है, जाहिर है इसके पीछे  जो आशंका व्यक्त की जा रही थी उसकी पुष्टि  अब चुनाव

आयोग की घटनाओं से होने लगी है मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त की नियुक्तियों के पीछे सरकार की कुछ और ही मंशा थी। क्या थी इस चुनाव से जाहिर हो गई है। 23 मई को चुनाव के नतीजे जो भी आयें  जिसकी भी सरकार बने यह सवाल हमेशा के लिए जिंदा रहेगा लोकसभा चुनाव में क्या चुनाव आयोग   पूरी तरह स्वतंत्र था, क्या वह  वह पूरी तरह निष्पक्ष था क्या उसने श्री मोदी और श्री शाह का बचाव नहीं किया? मोदी  सरकार भले ही केंद्र में दोबारा आ जाए लेकिन उसके सामने यह सवाल तो बना ही रहेगा कि उसने अपने कार्यकाल में किस तरह संवैधानिक  संस्थाओं को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की चाहे वह सीबीआई हो या कोई अन्य संस्था ?लोकतंत्र में जनता जनादेश देकर सर्कार का विश्वास ग्रहण करती है लेकिन सर्कार अपने क्रियाकलापों से आयोग जैसी संस्थावों की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दी तो यह लोकत्रंत के लिए बहुत खरनाक है।

(विमल कुमार कवि और पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 








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