आदिवासियों के जान और जमीन की कीमत पर वन अधिकार अधिनियम की तामील

छत्तीसगढ़ , , शुक्रवार , 22-02-2019


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत 10 लाख से ज्यादा आदिवासियों की बेदखली की खबर इतनी सामान्य खबर नहीं है कि किसी की नजर नहीं पड़ी हो। लेकिन इतनी बड़ी खबर मुख्यधारा की मीडिया से बिल्कुल गायब है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के करीब 16 राज्यों के 10 लाख से अधिक आदिवासियों और जंगल में रहने वाले अन्य लोगों को जंगल की जमीन से बेदखल करने का आदेश दिया है। आदिवासियों और जंगल में रहने वाले अन्य लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने एक कानून का केंद्र सरकार बचाव नहीं कर सकी, जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है।

बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर के अनुसार, अब अन्य राज्यों को भी अदालत का आदेश लागू करने के लिए बाध्य होना होगा। जिसकी वजह से देशभर में अपनी जमीन से जबरदस्ती बेदखल किए जाने वालों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जाएगी। अदालत का यह आदेश एक वन्यजीव समूह द्वारा दायर की गई याचिका के संबंध में आया है जिसमें उसने वन अधिकार अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाया था।

आपको यह जानना चाहिए कि आदिवासियों को जंगल से भगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली वन्य जीव समूह या समितियां कौन हैं ? ये वह समूह है जो कार्पोरेट फंडिंग से चलती है और इनका एक मात्र कार्य यह होता है कि जहां आदिवासी और वन्य जीव एक साथ रह रहे हैं उस जगह को खाली करवाया जाए।

छत्तीसगढ़ के समाजिक कार्यकर्ता विक्रम चौहान ने लिखा है कि ये समूह आदिवासियों के हित के मामलों में रोड़े अटकाती है,सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में याचिकाएं लगा आदिवासियों से जुड़े कानून को डिस्टर्ब करती है।इनकी एक पूरी गैंग है जिनका दखल केंद्र के पर्यावरण विभाग से लेकर राज्य सरकारों में भी है। इनमें कार्पोरेट पोषित बड़े अधिवक्ता है,अफसर हैं।

छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासियों को अचानकमार टाईगर रिज़र्व के नाम पर एक बड़े भूभाग से बेदखल कर दिया गया है। उन आदिवासियों को उनके पर्यावास से दूर सीमेंट के घर बनाकर दूर कर दिया गया है। और उनको एक 5 किलोमीटर की सीमा में कैद कर दिया गया है। उनके जंगल,पहाड़ों पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कमाल की बात तो यह है इस टाइगर रिजर्व में एक टाइगर नहीं है। सारी कवायद इसलिए की गई क्योंकि इसके लिए केंद्र से एक बड़ा फंड मिला जिसे ये समूह के लोग आपस में बांट लिए।बैगा आदिवासी राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र हैं। अब कोई जाकर देखे इन आदिवासियों का क्या हाल है। इसी तरह बारनवापारा और भोरमदेव टाइगर रिजर्व के नाम पर भी आदिवासियों को उनके पर्यावास से दूर कर दिया गया है।

विक्रम ने आगे लिखा है कि साल 2013-14 में मेरे पिताजी ने आदिवासियों के इस अनुचित व्यवस्थापन के खिलाफ और कैम्पा फंड के नाम पर 3000 करोड़ की अनियमितता पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब सुप्रीम कोर्ट में फारेस्ट बेंच था और पर्यावरण से जुड़े मामलों पर तुरंत सुनवाई होती थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मोदी का प्रभाव पड़ा और अब पर्यावरण से जुड़े केसेस केंद्र के हिसाब से मूव हो रही है। कल की याचिका पर कार्पोरेट के फायदे के लिए 6 माह में सुनवाई भी हो गई, फैसला भी आ गया जबकि जनहित के मामलों में तारीख दी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में जो लोग फैसले दे रहे हैं वे जज नहीं बल्कि कार्पोरेट के गुलाम लोग हैं। इन जजों के खिलाफ आदिवासियों को बिगुल फूंकना होगा। एसी लगे बंद कमरे में तीन लोग बैठकर कोई देश के लाखों आदिवासियों का भाग्य तय नहीं कर सकता।

बताते चले कि छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, ओडिशा जैसे अनेक प्रदेश आदिवासी बाहुल्य है। इस आदेश से 10 विभिन्न प्रदेश के 10 लाख से ज्यादा आदिवासी बेदखल होंगे। मामले की अगली सुनवाई की तारीख 27 जुलाई है। इस तारीख तक राज्य सरकारों को अदालत के आदेश से आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने का काम शुरू कर देना होगा।


 








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Samnath Kashyap piplawand :: - 02-22-2019
धन्यवाद सर आप जागरूक करने में आपका महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। धन्यवाद