छत्तीसगढ़ के एक गांव की कहानी: पारधी आदिवासियों के जमीन का दावा हुआ खारिज

छत्तीसगढ़ , , बुधवार , 27-02-2019


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तामेश्वर सिन्हा

कांकेर।हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से देश के करीब 12 लाख आदिवासियों और वनवासियों को अपने घरों से बेदखल होना पड़ सकता है। दरअसल शीर्ष अदालत ने 16 राज्यों के करीब 11.8 लाख आदिवासियों के जमीन पर कब्जे के दावों को खारिज करते हुए सरकारों को आदेश दिया है कि वे अपने कानूनों के मुताबिक जमीनें खाली कराएं। सुप्रीम कोर्ट ने लाखों हेक्टेयर जमीन को कब्जे से मुक्त कराने का आदेश दिया।लेकिन वनाधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों के किए गए दावों के खारिज होने की ज़मीनी रिपोर्ट कुछ और ही बयां करती है। ऐसे ही एक गांव की कहानी हम बयां कर रहे हैं जहां वनाधिकार अधिनियम के तहत किए गए जमीन के पट्टे के दावे खारिज कर दिए हैं जबकि यह आदिवासी समुदाय पारधी जनजाति में आते हैं और विशेष संरक्षित जनजाति के अन्तर्गत आते हैं। 

उत्तर बस्तर कांकेर जिला का ब्लाक नरहरपुर अन्तर्गत आने वाला ग्राम डोकरानाला जो बहानपानी ग्राम पंचायत अन्तर्गत आता है। 21 घरों के लगभग 150 आदिवासी इस गांव के निवासी हैं, जो पारधी जनजाति (बंसोड़ जनजाति) के हैं। 21 परिवार के पारधी आदिवासियों ने साल 2008 में वन अधिकार अधिनियम के  तहत व्यक्तिगत पट्टे के लिए दावा फॉम भरा था लेकिन उन्हें आज तक वन अधिकार अधिनियम के तहत जमीन का पट्टा नहीं मिल पाया, डोकरानाला के 21 घरों के आदिवासियों को इसी साल 2019 में पता चला की वन अधिकार के तहत किए गए जमीन के पट्टे के दावे निरस्त कर दिए गए हैं। ग्रामीण आदिवासियों के अनुसार वे साल 2001 से वहां निवासरत है। पारधी जनजाति बांस के सामान बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं। बीच जंगल में यह आदिवासी परिवार 2001 से लगातार रह रहे हैं।

वन अधिकार अधिनियम के तहत जमीन के दावे खारिज होने पर जब बहानपानी के सरपंच सियाराम कोमरा से बात-चीत किया गया तो सरपंच ने बताया कि डोकरानाला के ग्रामीणों ने 2008 में दावे किए थे जिसके कारण उनका दावा खारिज हो गया। उन्होंने 2010 में मतदान का प्रयोग किया। 2007 में डोकरानाला गांव में रहने का पंजीकरण हुआ। 

वनाधिकार पर काम करने वाले कार्यकर्ता अनुभव शोरी कहते हैं कि डोकरानाला एक टोला है जिसका विधिवत ग्राम सभा के माध्यम से दावा किया जाना था लेकिन प्रशासनिक अमले ने हस्तक्षेप किया। दावा ग्राम सभा के माध्यम से ही किया जाता और ग्राम सभा ही दावा खारिज करती है। वन अधिकार कानून के तहत 13 दिसंबर, 2005 के पूर्व कब्जाधारी अधिकार पत्रक के पात्र होंगे, ग्राम सभा को अधिकार है कि वह निवासरत के हिसाब से हितग्राहियों को पात्र घोषित करे, किन्तु ग्राम सभा की अज्ञानता के कारण सरपंच सचिव जैसे लोग ही ज्यादातर फैसले लिए हैं।

ये एक गांव डोकरानाला की कहानी है। बस्तर में ऐसे सैकड़ों परिवारों के दावा को खारिज किया जा चुका है। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सवाल उठता है कि आखिर ये जंगल के रहवासी कहा जाएंगे? ऐसे बेदखली के फरमान के बाद आदिवसियों की जिंदगी क्या होगी जिनका जीवन की जंगल पर निर्भर है ? 








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