हर तंत्र पर हावी होती गन

उत्तर प्रदेश , , शनिवार , 26-01-2019


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अमित मौर्या

आज हम सत्तरवां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। गणतंत्र का मतलब जहां का शासक राजा नहीं होता है और उसका चुनाव न केवल जनता के जरिये होता है बल्कि संविधान और शासन में भी जनता का स्थान सर्वोच्च होता है। हमारा देश कहने को तो गणतांत्रिक व्यवस्था से चलता है, मगर यहां समाज से लेकर सीमा तक गनतंत्र यानी बंदूक का ही राज चलता है। जैसे बॉर्डर पर सैनिक गन लेकर ही सीमा रेखा की सुरक्षा करता है, देश के भीतर भी जनता की सुरक्षा के नाम पर पुलिस की बंदूक ही होती है। धार्मिक परिसर तक उसके साये से दूर नहीं हैं। सबसे पवित्र और सबसे महफूज जगह को भी सुरक्षा की दरकार होती है। रेलवे स्टेशन से लेकर हवाई अड्डों की सुरक्षा भी गनों के साये में रहती है।

माननीयों से लेकर नेताओं और अभिनेताओं का तो इसके बगैर दो कदम चलना भी दूभर है। नजदीकी में सुरक्षाकर्मी इनके साये को भी मात देते दिखते हैं। 

प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और मंत्री से लेकर संतरी तक की सुरक्षा की गारंटी गन (बंदूक) से है। चोर, लुटेरे और डकैतों का आतंक भी गन के बल पर ही चलता है। 

हद तो तब हो जाती है जब इन्हीं गनों की बदौलत डकैत, गुंडे और माफिया बने लोग अवैध तरीके से कमाई गयी दौलत के बल पर माननीय बन जाते हैं ।

 इन गुंडों माफियाओं ने भले ही संसद में गणतंत्र को कायम रखने की संविधान की शपथ ली हो लेकिन संसद के बाहर ये गनतंत्र की ही रक्षा कर रहे होते हैं। और उसके बल पर समाज में खौफ पैदा करने का काम करते हैं। ये काम कभी पर्दे के पीछे से होता है कभी बिल्कुल खुलेआम। 

लेकिन इस मामले में दो मिनट के लिए ही सही उस जनता को भी सोचने की जरूरत है जिसे नागरिक कहा जाता है। जो इन सब चीजों को देखते हुए भी ऐसे लोगों को चुनने का काम करता है।

यह बात सही है कि एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते भारत में कोई भी चुनाव लड़ सकता है। ऐसे में आखिरी जिम्मेदारी उस मतदाता की हो जाती है जो उन्हें चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजने का काम करता है।

वैसे भी जीत और हार की कुंजी जनता के पास रहती है और समाज जानता है कि यह अपराधी है, यह जनता का भला करने नहीं बल्कि उसे लूटने और खुद को सुरक्षित करने आया है। ऐसे में सवाल यही बनता है कि ऐसे लोगों को जनता भला क्यों वोट देती है। 

दरअसल दसियों गनरों के काफिले के साथ चल रहे सफेदपोशों के ग्लैमर में जब तक लोग फंसे रहेंगे या फिर देश में जाति और धर्म का कुचक्र चलता रहेगा तब तक गणतंत्र पर गनतंत्र को हावी रहने से कोई नहीं रोक सकता है। और समय के साथ गन वाले तंत्र के जरिये माफिया से माननीय बने नेता देश को लूटेंगे जरूर मगर खद्दर पहन कर और खाकी उसी गन से इनकी सुरक्षा कर रही होगी जिस गन की नाल ने कभी इनको हैंड्सप कराया रहा होगा।

(लेखक अमित मौर्या गूंज उठी रणभेरी पेपर के संपादक हैं।)








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