देश को राह दिखाता केरल

केरल , त्रिवेंद्रम, बृहस्पतिवार , 28-02-2019


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महेंद्र मिश्र

भारत के बिल्कुल दक्षिण में समुद्र से सटा केरल न केवल कुदरती तौर पर खूबसूरत है बल्कि सरकारों की सुसंगत नीतियों के चलते वह एक दूसरे मुकाम पर पहुंच गया है। वह आर्थिक प्रबंधन का मसला हो या फिर सामाजिक व्यवस्था के ढांचे का या फिर उसके राजनीतिक संचालन का हर मोर्चे पर उसने एक नायाब उदाहरण पेश किया है। 3 करोड़ की आबादी वाला ये सूबा आज उस जगह पर खड़ा है जहां से दूसरे सूबे उससे कुछ सीख सकते हैं। 

गुणात्मकता के हिसाब से आज केरल वहां पहुंच गया है जब उसका हर नागरिक स्किल्ड लेबर की कटेगरी में आ गया है। और उसे शारीरिक श्रम के लिए दूसरे सूबों से मदद लेनी पड़ रही है। इसी का नतीजा है कि देश के दूसरे सूबों के अशिक्षित बेरोजगारों के लिए केरल सबसे बड़ा ठिकाना बन गया है। यहां तकरीबन 24 लाख प्रवासी मजदूर रहते हैं जो दूसरे सूबों से आए हैं। इसमें केरल के बिल्कुल दूसरे छोर पर स्थित असम, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और बिहार की तादाद सबसे ज्यादा है। इसको एक दूसरे नजरिये से भी देखा और समझा जा सकता है। वह यह कि केरल में अब कोई भी नागरिक 500 से 700 रुपये तक की नौकरी नहीं करना चाहता है। जो अपने आप में इसकी गुणात्मक प्रगति का सबसे बड़ा उदाहरण है।

और यही वजह है कि उसका एक बड़ा हिस्सा देश और दुनिया के दूसरे कोनों में चला गया है। और वहां अपने कौशल का प्रयोग कर ज्यादा पैसा कमाने में सक्षम है। इस हिस्से की तादाद भी कम नहीं है। ऐसे तकरीबन 25 लाख लोग हैं जो केरल से बाहर कमाने के मकसद से गए हैं। और एक आंकड़े के मुताबिक सालाना केरल से तकरीबन 14 हजार करोड़ रुपये अगर बाहर जाता है तो बाहर गए केरली प्रवासियों के जरिये 78 हजार करोड़ रुपये आते भी हैं।

दरअसल केरल शिक्षा के क्षेत्र में अव्वल रहा। लिहाजा स्किल्ड लेबर पैदा करने वाले सूबों की कतार में सबसे आगे खड़ा मिला। और इस दौर की जरूरत ने उसे सबसे ज्यादा फायदा दिलाया। हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूंजी के आने से सार्वजनिक शिक्षा की गुणवत्ता और उसकी उत्पादकता को लेकर जो संकट पैदा हुआ उसे केरल ने एक दूसरे ही तरीके से हल करने की कोशिश की है। और इसका जगह-जगह प्रयोग भी शुरू हो  गया है। कोझिकोड में सीपीएम विधायक प्रदीप कुमार द्वारा दिए गए माडल को केरल सरकार ने स्वीकार कर उसे पूरे सूबे के स्तर पर लागू करने का फैसला किया है।

इसके तहत एक से लेकर 12वीं कक्षा तक की शिक्षा के लिए स्कूलों को इस बात की छूट दी गयी है कि वो निजी, ट्रस्ट या फिर दूसरे सरकारी स्रोतों से मदद लेकर अपने स्कूली शिक्षा समेत उसके पूरे ढांचे को दुरुस्त कर सकते हैं। इस कड़ी में कई ट्रस्ट और निजी पूंजीपति आगे आए हैं। विधायकों को मिलने वाले फंड ने इसमें अहम भूमिका निभायी है। यह मॉडल पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप से इसलिए अलग हो जाता है क्योंकि इसमें मदद करने वाले को किसी तरह का मालिकाना हक नहीं मिलता है। हां ये बात जरूर है कि उसको क्रेडिट मिलती है। साथ ही प्रशासनिक संचालन में उसकी भूमिका होती है। 

इसके साथ ही शिक्षा के साथ रोजगार के मोर्चे पर भी केरल में उम्दा काम हुआ है। जब देश के दूसरे सूबों में सरकारी रोजगार दफ्तर खंडहरों में तब्दील हो गए हैं और उनका कोई नामलेवा नहीं है। तब केरल में वो आशा के नये केंद्र के तौर पर उभरे हैं। यहां जगह-जगह न केवल बेरोजगारों को रोजगार के लायक प्रशिक्षण देकर सक्षम बनाया जा रहा है बल्कि जरूरत के मुताबिक उनकी सप्लाई करने की भी व्यवस्था की जा रही है। लिहाजा रोजगार दफ्तर नये प्रशिक्षण केंद्र के तौर पर उभरे हैं।

सामाजिक स्तर पर केरल सौहार्द और भाईचारे की नई मिसाल बन गया है। एक ऐसे मौके पर जब पूरे देश में सांप्रदायिकता फन निकाल कर खड़ी हो गयी है और उसने उसके बड़े हिस्से को अपने आगोश में ले लिया है। तब अल्पसंख्यकों की सबसे ज्यादा आबादी होने के बावजूद केरल इस बीमारी से अछूता है। और राजनीतिक स्तर पर अगर कुछ गलत हरकतें हो रही हैं तो वहां के सेकुलर राजनीतिक दल उसका जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। इस मामले में सबरीमाला एक बड़े मुद्दे के तौर पर सामने आया था लेकिन उसे सरकार ने बेहद धैर्य और समझदारी के साथ हल कर लिया। हालांकि कुन्नूर और पलक्कड़ जैसे कुछ क्षेत्र हैं जहां सांप्रदायिक ताकतें अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन सेकुलर जमात और उससे जुड़ी जनता उसका हर स्तर पर जवाब दे रही है।

हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर इसकी बिल्कुल एक दूसरी तस्वीर पेश की जा रही है। मानो पूरा केरल ही इसी तरह की हिंसा का शिकार है। जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। बल्कि इस हिंसा से एक दूसरा सवाल जरूर खड़ा हो जा रहा है। वह यह कि सूबे में पहले से भी दूसरी विपक्षी पार्टियां मौजूद हैं और उनके बीच राजनीतिक संघर्ष भी तीखे हुए हैं लेकिन ऐसी हिंसा क्यों नहीं हुई। ऐसा बीजेपी और संघ के प्रवेश के साथ ही क्यों हुआ?

केरल की सबसे बड़ी उपलब्धि वहां की महिलाएं हैं। कहा जाता है कि किसी समाज की प्रगति का बैरोमीटर महिलाएं और उनकी जीवन स्थितियां होती हैं। केरल में गली और सड़क से लेकर मंच और संस्थाओं तक में महिलाओं की भरपूर मौजूदगी देखी जा सकती है। यहां तक कि सार्वजनिक वाहनों में भी आधे से ज्यादा संख्या महिलाओं की होती है। ऐसे में अभी जब कि देश के दूसरे हिस्सों में ये जमात घरों के किचेन तक महदूद है तब केरल में ये उत्पादन में सीधी हिस्सेदारी कर रही हैं। केरल इस मोर्चे पर पूरे देश के लिए किसी आदर्श से कम नहीं है।

एक ऐसा मोर्चा अभी बाकी है जिसको हल करना बाकी है। वह है सूबे में निवेश का मसला। हालांकि ये नीतिगत मसला है और एलडीएफ सरकार के लिए उसके सैद्धांतिक पक्ष से भी जुड़ जाता है। बावजूद इसके इन दी गयी परिस्थितियों में उसे हल करना उसकी जिम्मेदारी बन जाती है। क्योंकि उसके बगैर आने वाली बड़ी चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता है। लिहाजा एक बड़े स्तर पर औद्योगीकरण वक्त की जरूरत बन गयी है।

केरल में जाकर इस बात को समझा और महसूस किया जा सकता है कि आखिर बाहर जाकर दूसरे सूबों के लोग अपने घरों की ओर क्यों नहीं लौटते। क्योंकि न तो वहां जीने के लिए न्यूनतम नागरिक सुविधाएं होती हैं और न ही उस तरह का माहौल। लिहाजा उन्हें घरों से हटकर दूसरे शहरों में ही अपना ठिकाना बनाना पड़ता है। लेकिन केरल के नागरिक समाज ने इस बात को सुनिश्चित किया है कि लौटने के बाद अपने नागरिक को उसकी जरूरत के मुताबिक जीवन और माहौल मिले।    








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